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एटमी हथियारों से मुक्ति का सपना

न केवल नाभिकीय हथियार निर्माण सक्षम देशों बल्कि समस्त विश्व की सुरक्षा सुनिश्चित करने का बेहतर विकल्प यह होगा कि विश्व में नि:शस्त्रीकरण आंदोलन को बढ़ावा दिया जाए

Author April 4, 2017 5:27 AM
प्रतीकात्मक चित्र

समय सिंह मीना

हाल ही में नाभिकीय हथियारों को प्रतिबंधित करने के लिए बाध्यकारी समझौते के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र महासभा के तत्त्वावधान में आयोजित बहुपक्षीय वार्ता जून-जुलाई 2017 तक समझौते का प्रारूप विकसित कर लेने की उम्मीदों के साथ समाप्त हो गई। यह वार्ता संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति, जो कि नि:शस्त्रीकरण तथा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों को देखती है, के द्वारा पिछले वर्ष अक्तूबर माह में 123-38 के भारी बहुमत से स्वीकृत प्रस्ताव-एल 41 की अगली कड़ी थी। दिसंबर 2016 में महासभा ने भी यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। प्रस्ताव का मुख्य बिंदु यह था कि मार्च 2017 तथा जून-जुलाई 2017 में होने वाली वार्ता में नाभिकीय हथियारों पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक बाध्यकारी समझौते के निर्माण पर चर्चा की जाएगी, ताकि आगे चलकर इन हथियारों की पूर्णत: समाप्ति का मार्ग प्रशस्त हो सके। जहां भारत, पाकिस्तान, चीन सहित कुल सोलह देशों ने इस प्रस्ताव पर मतदान में भाग नहीं लिया, वहीं प्रस्ताव का समर्थन करने वाले देशों में उत्तर कोरिया भी था।

इस पांच दिवसीय वार्ता में सौ से भी अधिक देशों ने भाग लिया और यह संदेश दिया कि आज विश्व के अधिकतर देश नाभिकीय हथियारों से मुक्ति चाहते हैं। पर विडंबना यह है कि वर्तमान में नाभिकीय हथियार निर्माण में सक्षम नौ देशों- एन-5 देशों (नाभिकीय अप्रसार संधि द्वारा नाभिकीय शक्ति संपन्न घोषित पांच देश- संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन) तथा भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया व इजराइल (इजराइल ने अभी तक कोई नाभिकीय परीक्षण नहीं किया है, पर यह माना जाता है कि उसके पास भी नाभिकीय हथियार हैं) में से किसी भी देश ने इस तरह के किसी बाध्यकारी समझौते का स्पष्ट रूप से समर्थन नहीं किया है। हालांकि पिछले वर्ष उत्तर कोरिया ने एल-41 प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था, मगर नाभिकीय नि:शस्त्रीकरण के संबंध में उसकी गंभीरता संदिग्ध है।

संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की प्रतिनिधि निक्की हेली ने तो यहां तक कह दिया कि इस प्रकार के समझौते से उत्तर कोरिया जैसे देशों को लाभ मिलेगा और अमेरिका जैसे देशों की स्थिति इससे कमजोर होगी, जिनकी शांति व सुरक्षा के लिए ये हथियार आवश्यक हैं। यहां तक कि नाभिकीय हथियारों का एकमात्र भुक्तभोगी जापान भी यह कह कर समझौते का विरोध कर रहा है कि अमेरिका के नाभिकीय हथियार उसे सुरक्षा प्रदान करते हैं। अमेरिका का कहना है कि एटमी हथियार उसे अवरोधक क्षमता प्रदान करते हैं और इसलिए किसी भी बड़े आक्रमण या नाभिकीय हमले से बचने के लिए इनका होना आवश्यक है। भारत भी अपने आदर्शवाद को तिलांजलि देते हुए यह स्वीकार कर चुका है कि परमाणु हथियार आज की वास्तविकता हैं और इन पर प्रतिबंध का कोई भी प्रयास अमेरिका व रूस जैसे देशों की सहमति के बिना सफल नहीं हो सकता। इसी क्रम में भारत का नाभिकीय सिद्धांत एक न्यूनतम विश्वसनीय अवरोधक स्तर तक नाभिकीय हथियारों के निर्माण का उल्लेख करता है।

शीतयुद्ध के दौरान अति प्रचलित हुआ नाभिकीय हथियारों का अवरोधक सिद्धांत इस मान्यता पर आधारित है कि यदि किसी देश के पास नाभिकीय हथियार और पर्याप्त प्रत्युत्तर (सेकंड स्ट्राइक) क्षमता विद्यमान हो, तो पारस्परिक सुनिश्चित विध्वंस की संभावना उसके दुश्मन देश को उस पर नाभिकीय आक्रमण करने से रोकेगी। शीतयुद्ध काल में सोवियत संघ तथा अमेरिका के बीच कोई प्रत्यक्ष युद्ध न होना इसी सिद्धांत की सफलता के उदाहरण के रूप में प्रचारित किया जाता है तथा यह सिद्धांत आज भी नाभिकीय हथियारों को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने का एक प्रमुख तर्क है।

वस्तुत: अवरोधक सिद्धांत की आड़ में नाभिकीय हथियार निर्माण क्षमता वाले देश न केवल अपने नाभिकीय हथियारों को बनाए रखते हैं, बल्कि इन हथियारों को समाप्त करने के किसी भी प्रयास को विफल कर देते हैं, जबकि 1968 में हस्ताक्षरित नाभिकीय अप्रसार संधि सभी एन-5 देशों से यह अपेक्षा करती है कि वे नाभिकीय हथियारों की यथाशीघ्र समाप्ति के लिए वार्ता करेंगे। इसके बावजूद आज तक नाभिकीय हथियारों की पूर्णत: समाप्ति के लिए एन-5 की तरफ से कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है और नि:शस्त्रीकरण की जगह परमाणु हथियार नियंत्रण को प्राथमिकता दी गई है। अमेरिका तथा पूर्व सोवियत संघ के बीच हुई सामरिक अस्त्र परिसीमन संधि (साल्ट), सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि (स्टार्ट) जैसी संधियां वस्तुत: अस्त्र नियंत्रण की दिशा में उठाए गए कदम थे। इसके फलस्वरूप हालांकि एन-5 देशों में नाभिकीय हथियारों के भंडार में कुछ कमी अवश्य आई, पर भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया जैसे देशों में नाभिकीय हथियारों का प्रसार नहीं रोका जा सका।

नाभिकीय हथियारों के इस प्रसार का ही परिणाम है कि आज जहां एक ओर भारत- पाकिस्तान के बीच नाभिकीय हथियारों व प्रक्षेपास्त्रों के निर्माण की होड़ ने दक्षिण एशिया क्षेत्र को ‘न्यूक्लियर फ्लैशपॉइंट’ के रूप में स्थापित किया है, वहीं दूसरी ओर 2003 में नाभिकीय अप्रसार संधि से बाहर आने के बाद उत्तर कोरिया नाभिकीय परीक्षण करता रहा है, जिससे न केवल कोरियाई प्रायद्वीप बल्कि जापान की सुरक्षा पर भी निरंतर खतरा बना हुआ है। इतना ही नहीं, एटमी हथियारों की मौजूदगी ने एटमी आतंकवाद जैसे खतरे की आशंका भी उत्पन्न कर दी है। इस सब के बावजूद अमेरिका और अन्य नाभिकीय शक्ति संपन्न देश अवरोधक-सिद्धांत का बखान करते रहते हैं, जबकि तमाम शोध दर्शाते हैं कि नाभिकीय हथियार हमेशा अवरोधक का कार्य नहीं करते।

अवरोधक सिद्धांत के विरोध में कहा जाता है कि यह सिद्धांत किसी देश की सुरक्षा के लिए गारंटी नहीं माना जा सकता। वार्ड एच. विल्सन ने अपनी पुस्तक ‘फाइव मिथ्स अबाउट न्यूक्लियर वेपंस’ में यह दर्शाया है कि इतिहास में कई ऐसे भी उदाहरण रहे हैं, जब नाभिकीय हथियारों की मौजूदगी के बावजूद किसी देश पर आक्रमण हुए हैं या उसे अपने प्रतिद्वंद्वी देश से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा है। विएतनाम युद्ध में नाभिकीय शक्ति संपन्न अमेरिका को विएतनाम से न केवल कड़ी चुनौती मिली, बल्कि इस युद्ध में अमेरिका की रणनीतिक हार भी हुई। इसी प्रकार 1973 के योम किप्पुर युद्ध में इजराइल के पास नाभिकीय हथियारों की मौजूदगी की संभावना के बावजूद अरब देश उस पर आक्रमण करने से नहीं घबराए। इसके अलावा, तमाम शोध दर्शाते हैं कि नाभिकीय हथियारों के निर्माण के बाद भारत-पाकिस्तान सीमा पर होने वाली हिंसक घटनाओं में पहले की तुलना में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। अत: केवल नाभिकीय हथियारों का निर्माण कर लेना किसी देश को बाहरी आक्रमण या प्रतिद्वंद्वी की हिंसक गतिविधियों से नहीं बचा सकता।

जाहिर है, न केवल नाभिकीय हथियार निर्माण सक्षम देशों बल्कि समस्त विश्व की सुरक्षा सुनिश्चित करने का बेहतर विकल्प यह होगा कि विश्व में नि:शस्त्रीकरण आंदोलन को बढ़ावा दिया जाए और नाभिकीय हथियारों को प्रतिबंधित करते हुए उनके पूर्णत: उन्मूलन का प्रयास किया जाए। वस्तुत: नाभिकीय हथियार मुक्त विश्व में ही शांति और स्थायित्व की स्थापना की जा सकती है। और इसीलिए, नाभिकीय हथियारों पर प्रतिबंध के लिए होने वाली कोई भी वार्ता- चाहे नाभिकीय हथियार रखने वाले देश उसका हिस्सा बनें या न बने- एक नैतिक बल रखती है। आशा की जानी चाहिए कि जब जून-जुलाई 2017 में वार्ता का अगला दौर आयोजित हो, तब वैश्विक शांति के उद्देश्य को सर्वोपरि मानते हुए सभी देश नाभिकीय हथियारों पर प्रतिबंध के लिए आपसी सहमति बना सकें।

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