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संसद की संप्रभूता का सवाल

संविधान में 99वां संशोधन करके बनाए गए न्यायिक नियुक्ति आयोग या एनजेएसी कानून को रद्द करने के उच्चतम न्यायालय के फैसले पर सरकार...

Author Published on: October 21, 2015 12:14 PM

संविधान में 99वां संशोधन करके बनाए गए न्यायिक नियुक्ति आयोग या एनजेएसी कानून को रद्द करने के उच्चतम न्यायालय के फैसले पर सरकार और अनेक विधिवेत्ताओं की ओर से आई प्रतिक्रियाओं का निष्कर्ष यही है कि इससे संसद के कानून बनाने के सार्वभौम दायित्व को आघात पहुंचा है। सामान्यत: न्यायपालिका के फैसले के विपरीत प्रतिक्रिया देने का चलन हमारी राजनीति में नहीं है। दूसरे, ज्यादातर विरोधी दलों ने भी सरकार की आलोचना करने में कोताही बरती है। अगर कोई दूसरा मामला होता और सरकार का कोई कानून इस प्रकार असंवैधानिक करार दिया गया होता तो विपक्षी पार्टियों का तेवर कैसा होता इसकी कल्पना की जा सकती है। इससे पता चलता है कि उच्चतम न्यायालय के इस फैसले से ज्यादातर राजनीतिक दल और विधिवेत्ताओं का बड़ा वर्ग असंतुष्ट है।

चूंकि उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायाधीश के संविधान पीठ ने यह फैसला दिया है, इसलिए आगे पुनर्विचार याचिका में इसमें संशोधन की संभावना न के बराबर है। अलबत्ता पांच में से एक न्यायाधीश ने संसद के कानून को संविधानसम्मत माना है। बहरहाल, इस फैसले के बाद न्यायाधीशों द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति वाली दो दशक पुरानी कोलेजियम प्रणाली बहाल हो गई है। यह सामान्य स्थिति नहीं है। संसदीय लोकतंत्र में संसद को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। संविधान संशोधन, कानून बनाने या कानून को खत्म करने का अधिकार उसका है। उच्चतम न्यायालय उसकी समीक्षा कर सकता है। संसद द्वारा पारित कानून को रद्द करने का निर्णय संसद बनाम न्यायपालिका की स्थिति की ओर जाता है। ध्यान रखिए इस 99वें संशोधन को संसद के दोनों सदनों के अलावा बीस राज्यों ने भी पारित किया था और इसे सभी राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल था।

हालांकि कुल 1030 पन्नों के फैसले को पढ़ने और समझने में समय लगेगा। लेकिन इसकी कुछ बातें सामने आ गईं हैं। मसलन, एनजेएसी न्यायपालिका की स्वायत्तता में ही नहीं, शक्तियों के विभाजन में भी दखल देती है। दूसरा, न्यायिक आजादी संविधान का बुनियादी ढांचा है, जिसमें सरकार हस्तक्षेप नहीं कर सकती, इसलिए इसे रद््द किया जाता है। तीसरा, एनजेएसी से न सिर्फ मुख्य न्यायाधीश की सर्वोच्चता कम हो रही थी बल्कि राष्ट्रपति की भूमिका भी कमतर हो रही थी। चौथा, न्यायाधीशों के मामले में राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह पर काम नहीं करते बल्कि स्वतंत्र रूप से निर्णय लेते हैं। हालांकि संविधान पीठ ने माना कि कोलेजियम प्रणाली में कुछ खामियां हैं और इसमें सुधार के लिए वह याचिकाकर्ताओं और सरकार से मदद चाहता है। इस पर सुनवाई के लिए पीठ ने तीन नवंबर की तारीख तय की है।

पीठ ने न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी 1993 और 1998 के फैसले को समीक्षा के लिए बड़े पीठ के पास भेजने की केंद्र सरकार की अपील भी खारिज कर दी। इन फैसलों के आधार पर ही कोलेजियम शुरू किया गया था। कोलेजियम में उच्चतम न्यायालय के पांच वरिष्ठतम न्यायाधीश होते हैं जो नियुक्ति, प्रोन्नति तथा स्थानांतरण के लिए उम्मीदवारों की सिफारिश करते हैं। इन सिफारिशों को सरकार मानने के लिए बाध्य होती है और नियुक्ति का आदेश जारी करती है।

आगे बढ़ने से पहले जरा पीठ के न्यायाधीशों की टिप्पणियों पर एक नजर दौड़ा लें। न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर- मैं स्वतंत्र रूप से इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि अनुच्छेद 124ए (1) की धारा सी असंवैधानिक है क्योंकि कानून और न्याय के प्रभारी कैबिनेट मंत्री को एनजेएसी को पदेन सदस्य शामिल किया गया है। मेरी राय में धारा सी न्यायिक स्वायत्तता ही नहीं, शक्तियों के विभाजन में भी दखल देती है। न्यायमूर्ति मदन लोकुर-99वें संविधान संशोधन तथा एनजेएसी ने सेकेंड और थर्ड जजेज केसों में दी गई सुविचारित प्रक्रिया को पलट दिया है और मुख्य न्यायाधीश की संवैधानिक शक्ति को छीन लिया है तथा उसे शोषण के एनजेएसी की प्लेट में रख दिया है। संसद के लोकप्रिय कानून असंवैधानिक हो सकते हैं और संवैधानिक कानून अलोकप्रिय हो सकते हैं। न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ- इसमें कोई शक नहीं है कि पूरी गलती कोलेजियम की नहीं है। अयोग्य नियुक्तियों को रोकने में सरकार की सक्रिय चुप्पी ही मुख्य समस्या है। दूसरे और तीसरे जज केसों ने ऐसी नियुक्तियों को रोकने के लिए सरकार के हाथ में प्रभावी औजार दिया था लेकिन सरकार ने इस औजार को कभी प्रभावी तरीके से इस्तेमाल नहीं किया। कोलेजियम में सुधार की जरूरत है और इसे खुलापन तथा पारदर्शिता भी चाहिए। यह प्रणाली लाइलाज नहीं हुई है, इसका इलाज संभव है। न्यायमूर्ति एके गोयल- कानूनमंत्री और दो गैर-न्यायाधीश सदस्यों को मुख्य न्यायाधीश के समकक्ष रख दिया गया है। स्पष्ट रूप से उनकी मुख्य न्यायाधीश के साथ तुलना नहीं की जा सकती। कानूनमंत्री और दो अन्य सदस्यों के हाथ में सुप्रीम कोर्ट जज, जो कोलेजियम का सदस्य है, के खिलाफ वीटो-शक्ति न्यायिक आजादी में दखल बन सकती है।

इनके तर्कों में कितना तीखापन और संसद के प्रति कितना गुस्सा है इसका अंदाजा इन वाक्यों से लगा लीजिए। हालांकि पीठ में एक न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे चेल्मेश्वर भी थे, जिन्होंने लिखा है, ‘मेरी राय में संविधान संशोधन में कोई खामी नहीं है लेकिन बहुमत की राय के कारण मुझे एनजेएसी की संवैधानिकता का परीक्षण करने का कोई उद्देश्य नजर नहीं आता। लेकिन चूंकि चार न्यायाधीशोंं की राय एक है इसलिए फैसला बहुमत से हो गया है। सच यह है कि कोेलेजियम प्रणाली की कई खामियां उजागर होने के बाद यह व्यवस्था की गई थी। इस आयोग में छह सदस्य होते, जिसके अध्यक्ष देश के मुख्य न्यायाधीश ही होते। इसके अलावा उच्चतम न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, कानूनमंत्री और समाज की दो जानी-मानी हस्तियां होतीं। हस्तियों के चयन में भी प्रधानमंत्री और लोकसभा में दूसरे सबसे बड़े दल के नेता के साथ मुख्य न्यायाधीश की भूमिका थी। इनके संयोजन का दायित्व न्याय-सचिव को करना था। इससे जरा कोलेजियम प्रणाली की तुलना कीजिए। इसमें मुख्य न्यायाधीश सहित उच्चतम न्यायालय के पांच वरिष्ठ न्यायाधीश होते हैं जो नियुक्ति, स्थानांतरण और प्रोन्नति पर फैसला लेकर सरकार को भेजते हैं। पूरी प्रक्रिया में सरकार की कोई भूमिका नहीं होती। कोलेजियम 1993 और 1998 के सेकेंड और थर्ड जजेज फैसलों के आधार पर बनाए गया था।

दुनिया की ओर भी नजर दौड़ा लें तो अमेरिका में उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है और सीनेट इसकी अनुमति देती है। जापान में मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति कैबिनेट द्वारा मनोनीत होने के बाद राजा करते हैं। अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति कैबिनेट करती है। ब्रिटेन में न्यायपालिका के उच्च पदों यानी जजेस आॅफ द हाउस आॅफ लॉर्ड्स की सभी नियुक्तियां संबंधित मंत्री की सलाह पर कार्यकारी राजा करते हैं। प्रधानमंत्री इनमें से लॉ लॉर्ड्स, द लॉर्ड्स जस्टिस आॅफ अपील, द लॉर्ड्स चीफ जस्टिस, द मास्टर आॅफ द रोल्स एंड द प्रेसिडेंट आॅफ द फैमिली डिवीजन को प्रधानमंत्री मनोनीत करते हैं। आॅस्ट्रेलिया में उच्च न्यायालय और अन्य न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्तियां गवर्नर जनरल इन काउंसिल द्वारा की जाती हैं। कहने का तात्पर्य यह कि दुनिया के ज्यादातर लोकतांत्रिक देशों में न्यायाधीशों की नियुक्तियों में कार्यपालिका की भूमिका है तो फिर भारत में इस पर एतराज क्यों?

साफ है कि जितनी पारदर्शिता और नियुक्तियों में सदस्यों का संतुलन न्यायिक नियुक्ति आयोग में होता उतना कोलेजियम में नहीं है। सच यह है कि संविधान में नियुक्ति के लिए कोलेजियम का कहीं जिक्र नहीं है। उच्चतम न्यायालय को कानून बनाने का अधिकार नहीं, लेकिन कोलेजियम में उसने ऐसा कर दिया और यह बाईस वर्षों से चल रहा है। संसद अपनी संप्रभुता के लिए खड़ी होती है तो टकराव सुनिश्चित है, नहीं खड़ी होती है तो इससे उसके संविधान संशोधन और कानून बनाने की शक्ति पर प्रश्न खड़ा होता है।

दो करोड़ से ज्यादा मुकदमे लंबित पड़े हैं। करीब चार सौ न्यायाधीशों के पद खाली हैं। अगर टकराव की नौबत आई तो नियुक्तियां नहीं होंगी। संसद के पास एक विकल्प फिर से विधेयक लाकर कानून बनाने का है, लेकिन इसकी लंबी प्रक्रिया है। संसद के बाद आधे से अधिक राज्यों की विधानसभाओं में इसे पारित कराना होगा। वैसे 1950 के दशक में न्यायपालिका का नेहरूसरकार से टकराव हुआ था। जमींदारी उन्मूलन, भूमि सुधार आदि के कानून को उच्चतम न्यायालय ने रद्द कर दिया था। तब नेहरूजी ने कहा था कि न्यायपालिका ने न्याय का अपहरण कर लिया है। दोबारा इन कानूनों को पारित करके इन्हें नौवीं अनुसूची में डाल दिया गया। इस अनुसूची में डालने पर कानून पूरी तरह रक्षित या न्यायिक समीक्षा के दायरे से परे हो जाता है। वर्तमान सरकार भी चाहती तो एनजेएसी कानून को नौवीं अनूसूची में डाल सकती थी। पर बड़ा प्रश्न यह है कि न्यायिक सुधार का क्या होगा?

कोलेजियम में अपेक्षित पारदर्शिता नहीं है। अगर न्यायालय स्वयं इसमें सुधार की जरूरत मानता है तो फिर यह सही नहीं है। इसमें दोष है। कहा जा सकता है कि कोलेजियम के तहत पर्याप्त पारदर्शिता से रहित प्रणाली में नियुक्तियां होती रहेंगी जहां सभी हितधारकों की आवाज नहीं होगी। कोलेजियम प्रणाली में बदलाव होगा या नहीं, यह भी न्यायालय के विवेक पर निर्भर करता है! यह समझ से परे है कि दो जानकार व्यक्तियों को आयोग में शामिल किए जाने पर उच्चतम न्यायालय को आपत्ति क्यों है? आखिर उनके चयन में भी तो मुख्य न्यायाधीश की भूमिका होती। पीठ ने कहा कि नियुक्ति में आम लोगों को शामिल करने से काम नहीं बनेगा। हालांकि आयोग का विरोध कुछ विधिवेत्ताओं ने भी किया था। पर इनकी संख्या कम थी।
अवधेश कुमार

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