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पाक की आर्थिक कूटनीति

पाकिस्तान की नई सुरक्षा नीति में क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ाने की बात की गई है।

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ब्रह्मदीप अलूने

पाकिस्तान की नई सुरक्षा नीति में क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ाने की बात की गई है। लेकिन उसका रास्ता आसान नहीं है। भारत से रिश्ते खराब होने से वहां रोजमर्रा की जरूरतों का सामान काफी महंगा हो गया है और इसका सीधा असर जनता पर पड़ रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार 2019 से बंद है।

आठवें दशक में प्रवेश कर चुका पाकिस्तान का निर्देशित जनतंत्र अब भारत के समतावादी लोकतंत्र की उपयोगिता और परिणामों को समझने को मजबूर हुआ है। पाकिस्तान की नई सुरक्षा नीति में पहली बार भू-राजनीतिक और सामरिक नीति पर भू-आर्थिक नीति को तरजीह देने की बात कही गई है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान इस समय देश को दिवालिया होने से बचाने की कड़ी चुनौती से जूझ रहे हैं।

हाल में घोषित नई सुरक्षा नीति में उनकी चिंता साफ तौर पर झलक रही है। इस नई सुरक्षा नीति में कहा गया है कि सैन्य रूप से पाकिस्तान जितना भी मजबूत हो, लेकिन अगर अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं होगी तो यह अपनी आजादी और संप्रभुता की हिफाजत नहीं कर पाएगा। नई सुरक्षा नीति में देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने पर सबसे ज्यादा जोर है और अब से विदेश नीति में भी आर्थिक कूटनीति को आगे बढ़ाने पर ध्यान दिया जाएगा।

दरअसल पाकिस्तान ने नई सुरक्षा नीति के जरिए देश की जनता और वैश्विक समुदाय को यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह एक ऐसे राष्ट्र के रूप में उभरने को तैयार है जहां व्यापार और व्यवसाय के लिए बेहतर माहौल हो और प्रशासन भी इसी के अनुरूप हो। गौरतलब है कि पाकिस्तान इस समय गहरे आर्थिक संकट में फंसा पड़ा है, उस पर लगातार कर्ज बढ़ रहा है, पड़ोसी देशों से रिश्ते तनावपूर्ण हैं, उसे वैश्विक आर्थिक प्रतिबंधों का वह सामना करना पड़ रहा है और 2023 में होने वाले आम चुनाव में इमरान खान के सामने सत्ता बचाए रखने की चुनौती भी है।

भारत से विभाजित होकर अस्तित्व में आए पाकिस्तान ने लगातार राजनीतिक अस्थिरता का सामना किया है। तानाशाहों से अभिशिप्त इस देश के लोग लगातार अपने सैन्य शासकों की सामरिक असुरक्षा की नीति के बहकावे में आते रहे। यही कारण है कि पाकिस्तान खस्ताहाल और कंगाल राष्ट्र बन कर अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है। आजादी के बाद भारत की नीति शांति और समावेशी विकास पर आधारित रही, जबकि पाकिस्तान 1950 के दशक में ही शीतकालीन सैन्य गुटों का सदस्य बन कर वैश्विक शक्तियों के सामरिक हितों का संवर्धन करने वाला माध्यम बन गया था।

तब पाकिस्तान का भारत विरोध का यह तात्कालिक तरीका वहां की जनता को खूब रास आया और इससे सैन्य शासकों की तख्तापलट की नीतियों को बढ़ावा मिला। इन सबमें विकास, आधुनिक शिक्षा, महिलाओं और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को दरकिनार किया जाता रहा, जिसके दुष्परिणाम अब सामने आ रहे हैं। पाकिस्तान पर विदेशी कर्ज अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है। पाकिस्तान फेडरल बोर्ड आफ रेवेन्यू (एफबीआर) के पूर्व चेयरमैन शब्बर जैदी तो कह भी चुके हैं कि पाकिस्तान दिवालिया हो चुका है। देश पर घरेलू और विदेशी कर्ज पचास हजार अरब रुपए से भी अधिक हो गया है।

संकट यहीं खत्म नहीं होता। माली हालत से भी बड़ा संकट पाकिस्तान की जमीन पर पल रहे धार्मिक और अतिवादी संगठन हैं जो कानून के शासन को खुली चुनौती दे रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण विभिन्न सरकारों की धार्मिक अतिवादी नीतियां रही हैं। मदरसों को आधुनिक शिक्षा से ज्यादा धार्मिक शिक्षा की ओर मोड़ दिया गया, जिसके बेहद खतरनाक नतीजे देखने को मिल रहे हैं। दुनिया भर में होने वाले आतंकी हमलों के तार पाकिस्तान से जुड़ते रहे हैं। पाकिस्तान की सरकार और सेना पर आतंकियों को मदद देने के आरोपों के कारण वैश्विक वित्तीय संस्थाओं ने पाकिस्तान को आर्थिक मदद देने से इंकार कर दिया है।

पाकिस्तान इस समय चीन के कर्ज जाल में फंसा है। व्यापार और सामरिक दृष्टि से पाकिस्तान के सबसे महत्त्वपूर्ण ग्वादर बंदरगाह पर एक तरह से चीन का ही नियंत्रण हो गया है। ग्वादर में पैसे के निवेश की साझेदारी और उस पर नियंत्रण को लेकर चीन से पाकिस्तान का चालीस सालों का समझौता है। चीन का इसके इनक्यानवे फीसद राजस्व पर अधिकार होगा और ग्वादर पोर्ट अथारिटी को महज नौ फीसद मिलेगा। इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान के पास अगले चालीस साल तक ग्वादर पर नियंत्रण नहीं रहेगा।

पाकिस्तान की नई सुरक्षा नीति में क्षेत्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ाने की बात की गई है। लेकिन उसका रास्ता आसान नहीं है। भारत से रिश्ते खराब होने से वहां रोजमर्रा की जरूरतों का सामान काफी महंगा हो गया है और इसका सीधा असर जनता पर पड़ रहा है। दोनों देशों के बीच व्यापार 2019 से बंद है। पुलवामा हमले के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान से सर्वाधिक तरजीह वाले देश का दर्ज छीन लिया था और वहां से आयात होने वाली चीजों पर सीमा शुल्क दो सौ फीसद तक बढ़ा दिया था। बदले में पाकिस्तान ने भी भारत से आयात पर प्रतिबंध लगा दिए थे।

पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में अशांति और राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा देकर खुद का संकट बढ़ा लिया है। अफगानिस्तान की तालिबान सरकार को पाकिस्तान के अतिवादी संगठनों का समर्थन हासिल है और इससे कट्टरपंथी और मजबूत हुए हैं। अफगानिस्तान से आने वाले लाखों शरणार्थी पाकिस्तान के लिए बड़ा संकट बन गए हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सीमा बेहद जटिल और लंबी है। इसकी लगातार निगरानी मुश्किल काम है, इसलिए इस सीमा पर बाड़ लगाने की कोशिश की जा रही है, वहीं तालिबान इस बाड़ को तोड़ कर पाकिस्तान की समस्याओं को बढ़ा रहा है। एक और अहम पड़ोसी देश ईरान से भी पाकिस्तान के रिश्ते खराब है। ईरान का आरोप है कि पाकिस्तान की धरती का इस्तेमाल ईरानी चरमपंथी करते हैं।

ऐसे हालात में अगर पाकिस्तान आर्थिक कूटनीति पर काम करता है, तो उसे भारत से होकर अफगानिस्तान और ईरान जाने वाले मार्ग को उन्नत करना होगा। पाकिस्तान भारत की अफगानिस्तान में मौजूदगी और ईरान से मजबूत रिश्तों का विरोध करता रहा है। भारत ने तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत के बीच तापी गैस पाइप लाइन परियोजना के जरिए प्राकृतिक गैस की खरीद और बिक्री समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

इसे अमेरिका का भी समर्थन हासिल था। पर एक दशक बीत जाने के बाद भी यह योजना अंजाम तक नहीं पहुंच सकी है और इसका एक बड़ा कारण पाकिस्तान की भारत विरोधी नीतियां रही हैं। यह पाइपलाइन तुर्कमेनिस्तान के दौलताबाद गैस फील्ड से शुरू होकर अफगानिस्तान के हेरात-कंधार से होते हुए पाकिस्तान के क्वेटा और मुल्तान पहुंचेगी तथा गैस पाइपलाइन भारत-पाकिस्तान सीमा के फजिल्का में खत्म होगी। जाहिर है, इसका लाभ भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के करोड़ों लोगों को मिल सकता है। लेकिन पाकिस्तान के अतिवादी संगठन अपने मुल्क के रास्ते भारत को मिलने वाली मदद का विरोध करते रहे हैं और उनके आगे सरकार लाचार है।

पाकिस्तान ने नीतियों में बदलाव की बात तो की है, लेकिन लोकतंत्र की अनिश्चितता और अस्थिरता से आर्थिक प्रगति एवं सामाजिक कल्याण को बढ़ावा मिलना असंभव है। इसके साथ ही समावेशी विकास के लिए प्रतिनिधित्व, उत्तरदायित्व, औचित्य और समता की दृष्टि से भी देश में अभी बहुत कुछ सामाजिक, वैधानिक और राजनीतिक सुधार की जरूरत है। इन सब चुनौतियों के बीच अगर पाकिस्तान आर्थिक सहयोग बढ़ाने की नीति पर आगे बढ़ता है तो यह उसके लिए ही नहीं, भारत के लिए भी लाभकारी हो सकता है। यदि पाकिस्तान अपनी नई सुरक्षा नीति के अनुरूप क्षेत्रीय देशों से अच्छे रिश्ते कायम करने की इच्छाशक्ति दिखाता है तो यह दक्षिण एशिया समेत पूरी दुनिया के लिए शुभ संकेत होंगे।

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