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राजनीतिः ओआइसी में पाक का घटता कद

पाकिस्तान भलिभांति जानता है कि मध्य-पूर्व के मुसलिम देश अपने आर्थिक, नस्ली और सांप्रदायिक हितों के कारण आपस में बंटे हुए हैं। बेशक ओआइसी के नाम पर सत्तावन इस्लामिक देशों का एक मंच लंबे समय से बना हुआ है, लेकिन इसके सदस्य देशों के बीच ही लंबे समय से टकराव है। इस्लामिक देश खुद अलग-अलग गुटों में बंटे हैं।

पाकिस्तान अब इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआइसी) को लेकर हमलावर मुद्रा में है।

संजीव पांडेय

पाकिस्तान अब इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआइसी) को लेकर हमलावर मुद्रा में है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कश्मीर मुद्दे पर ओआइसी के सदस्य देशों के विदेश मंत्रियों की विशेष बैठक बुलाए जाने में देरी को लेकर नाराजगी जताई है। सऊदी अरब के नियंत्रण वाले इस संगठन की आलोचना करते हुए कुरैशी ने यहां तक कह दिया कि अगर ओआइसी कश्मीर पर बैठक नहीं बुलाएगा, तो पाकिस्तान खुद कश्मीर मसले पर उन इस्लामिक देशों की बैठक बुला सकता है जो पाकिस्तान के साथ हैं। कुरैशी के इस ब्यान में सऊदी अरब के प्रति गहरी नाराजगी झलकती है। यह बयान कुछ तथ्यों को भी स्पष्ट करता है। एक यह है कि कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को उम्मीद के मुताबिक इस्लामिक देशों का समर्थन नहीं मिला है। दूसरा यह कि पाकिस्तान एशिया की बदलती भू-राजनीति को अच्छी तरह से समझने के बावजूद स्थिति को तनावपूर्ण बनाए रखने की दिशा में ही बढ़ रहा है। दरअसल, एशिया की भू राजनीति में इस समय धार्मिक गठजोड़ पर आर्थिक गठजोड़ हावी है। इसे पाकिस्तान से बेहतर कोई नहीं समझ सकता है, क्योंकि चीन में उइगर मुसलमानों के दमन पर पाकिस्तान की चुप्पी यह सच्चाई बताती है।

पिछले साल अगस्त में भारत ने संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्क्रिय करते हुए जम्मू-कश्मीर राज्य को मिले विशेषाधिकारों को खत्म कर दिया था। पाकिस्तान ने भारत के इस कदम का अंतराष्ट्रीय मंचों पर खासा विरोध किया। लेकिन पाकिस्तान की विफलता यह थी कि इस मामले में उसे गिने-चुने मुसलिम देशों का ही समर्थन मिल पाया। लंबे समय से नजदीकी दोस्त रहे सऊदी अरब और इसके सहयोगी देशों तक ने कश्मीर मसले पर दूरी बना ली। लेकिन पाकिस्तान को तुर्की, मलेशिया जैसे देशों का सक्रिय समर्थन मिला। तुर्की और मलेशिया पाकिस्तान के साथ खुल कर सामने आए। पाकिस्तान ने कश्मीर मसले पर ओआइसी की बैठक बुलाने की मांग की, लेकिन सऊदी अरब ने अपने को अलग कर लिया। ऐसे में पाकिस्तान ने सऊदी अरब पर दबाव बनाने के लिए मलेशिया, तुर्की और ईरान के साथ मिल कर नया इस्लामिक गुट बनाने की कोशिश की। पाकिस्तान की पहल पर ही इस नए गुट की बैठक पिछले साल दिसंबर में क्वालालंपुर में आयोजित की गई। लेकिन पाकिस्तान ने चालाकी यह की कि बैठक से खुद ही गायब हो गया। इसका कारण पाकिस्तान पर सऊदी अरब का दबाव था। ऐसे में अगर अब कुरैशी का ओआइसी की बैठक को लेकर सऊदी अरब पर निशाना साध रहे हैं, तो यह आश्चर्यजनक है।

ओआइसी से पाकिस्तान इसलिए नाराज है क्योंकि मुसलिम देशों के इस वैश्विक मंच से कश्मीर मसले पर उसे कोई समर्थन नहीं मिल रहा। लेकिन पाकिस्तानी सता प्रतिष्ठान को इस बात का भी जवाब देना चाहिए कि ओआइसी के मंच पर उइगर मुसलमानों के दमन के मसले पर चुप्पी क्यों है? पाकिस्तान और दूसरे इस्लामिक देश चीन में उइगरों पर हो रहे दमन के मामले को इस मंच से क्यों नहीं उठा रहे हैं? साल 2006 में अजरबैजान में हुई ओआइसी की बैठक में उइगरों के दमन पर चर्चा हुई थी। लेकिन यह सिर्फ औपचारिकता भर थी। ओआइसी सदस्य देशों ने इस मसले पर चीन से बातचीत का सुझाव दिया था। इसके बाद अगले साल यानी 2007 में इस्लामाबाद में हुई ओआइसी की बैठक में फिर से उइगरों का मामला आया और पहले की तरह ही चीन से बात कर समस्या हल करने की राय बनी।

सच्चाई यह है कि ओआइसी के मंच से इस्लामिक देश चीन के खिलाफ सख्त भाषा इस्तेमाल करने से बचते रहे हैं, क्योंकि चीन वैश्विक आर्थिक ताकत है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य है। चीन ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के लिए बड़ा बाजार है, हाइड्रोकार्बन का बड़ा खरीदार है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन ने ईरान से तेल आयात किया। कई इस्लामिक देश चीन से हथियार भी खरीदते हैं। ओआइसी के सदस्य देशों को चीन से आने वाले निवेश का भी लोभ है। खुद पाकिस्तान चीन के निवेश पर निर्भर है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपैक) इसका उदाहरण है, जिसके तहत चीन पाकिस्तान में बासठ अरब डालर का निवेश कर रहा है। कई इस्लामिक देश चीन के निवेश और बाजार को खोना नहीं चाहते। ओआइसी में चीन के पक्षधरों की कमी नहीं है। इसलिए चीन में उइगरों के दमन को लेकर ओआइसी चुप रहता है।

पाकिस्तान भलिभांति जानता है कि मध्य-पूर्व के मुसलिम देश अपने आर्थिक, नस्ली और सांप्रदायिक हितों के कारण आपस में बंटे हुए हैं। बेशक ओआइसी के नाम पर सत्तावन इस्लामिक देशों का एक मंच लंबे समय से बना हुआ है, लेकिन इसके सदस्य देशों के बीच ही लंबे समय से टकराव है। इस्लामिक देश खुद अलग-अलग गुटों में बंटे हैं। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन जैसे देशों का एक कट्टर अमेरिका समर्थक है। तुर्की और कतर का अलग गुट बना हुआ है। इन्होंने ईरान से भी अपने संबंधों को ठीक किया है। वहीं ईरान, सीरिया और लेबनान के हिजबुल्लाह का अलग गुट है। पाकिस्तान यह अच्छी तरह जानता है कि अलग-अलग गुटों में शामिल इस्लामिक देश एक दूसरे पर नस्ल और संप्रदाय के नाम पर भेदभाव का आरोप लगा रहे है। सीरिया में नस्ल, संप्रदाय के नाम पर हिंसा हो रही है। यमन में भी यही स्थिति है। ऐसे में इस्लामिक देशों के अंदर कश्मीर के नाम पर एकजुटता कैसे संभव हो पाएगी?

इसमें दो राय नहीं कि पाकिस्तान अपने पड़ोसी ईरान, जो शिया बहुल देश है, के बजाए सुन्नी बहुल सऊदी अरब के काफी करीब रहा है। सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान के आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य सहयोग के प्रगाढ़ संबंध रहे हैं। लेकिन पाकिस्तान को बदलती हुई भू-राजनीतिक परिस्थितियों को समझना होगा। इस समय भू-राजनीति में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका बाजार और व्यापार की है। सऊदी अरब भारत का बड़ा व्यापारिक साझेदार है। सऊदी अरब की तेल आधारित अर्थव्यवस्था को भारत के साथ होने वाले द्विपक्षीय व्यापार के कारण खासी मजबूती मिली है। दोनों मुल्कों के बीच सालाना व्यापार तैंतीस अरब डालर तक पहुंच गया है।

2019-20 में सऊदी अरब से भारत का कुल आयात 26.84 अरब डालर का था। जबकि भारत से सऊदी अरब को कुल निर्यात 6.24 अरब डालर का था। दोनों मुल्कों के आपसी व्यापार में तेल की अहम भूमिका है। भारत अपनी कुल जरूरत का अठारह प्रतिशत तेल और कुल एलपीजी जरूरत का तीस प्रतिशत सऊदी अरब से ही खरीदता है। इस कारण सऊदी अरब भारतीय तेल बाजार को कभी नहीं खोना चाहेगा। सऊदी अरब की तेल कंपनी एरामको भारत की रिलांयस इंडस्ट्री मे अपनी हिस्सेदारी खरीदने की तैयारी में है। इसके अलावा भारत में ऊर्जा, पर्यटन, कृषि और विनिर्माण क्षेत्र में सऊदी अरब निवेश करने का इच्छुक है। इतना सब कुछ होते हुए सऊदी अरब कश्मीर पर ओआइसी की विशेष बैठक बुलवा कर भारत को क्यों नाराज करना चाहेगा?

शाह महमूद कुरैशी के ब्यान से पाकिस्तान में हंगामा खड़ा हो गया है। पाकिस्तान के विपक्षी राजनीतिक दलों ने कुरैशी के ब्यान की निंदा करते हुए कहा है कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच गहरी दोस्ती है। अगर पाकिस्तान के सऊदी अरब से रिश्ते बिगड़े तो इसका खामियाजा पाकिस्तानी नेताओं और सैन्य अधिकारियों को भुगतना पड़ सकता है। पाकिस्तानी नेताओं और सैन्य अधिकारियों ने अरब देशों में भारी निवेश कर रखा है। इसके अलावा पाकिस्तान में सक्रिय कट्टरपंथी संगठनों ने भी अरब देशों में भारी पैसा लगा रखा है। सऊदी अरब पाकिस्तान का बड़ा मददगार रहा है। इसलिए ओआइसी और कश्मीर को लेकर पाकिस्तान सऊदी अरब को झुका पाने की स्थिति में नहीं है। यह हकीकत उसे समझनी होगी।

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