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मोर्चे पर महिलाओं को मौका

काफी पहले एक पिछड़े जमाने में अगर युद्ध क्षेत्र में कपड़े बदलने या गर्भवती होने या फिर पुरुष सैनिकों द्वारा उनका नेतृत्व स्वीकार करने जैसे सवालों से परे रह कर महिला वीरांगनाएं अपनी वीरता और युद्ध कौशल से हर किसी को हतप्रभ करती रहीं और अपने अदम्य साहस की मिसाल पेश करती रहीं तो क्या आज की महिलाओं में उस साहस या कौशल की कोई कमी है? अगर नहीं, तो फिर क्यों उनका नेतृत्व स्वीकारने या मातृत्व अवकाश जैसी बातों को बेवजह तूल दिया जाता है?

महिला जवानों को सैनिक की तरह प्रशिक्षण तो दिया जाता है, मगर इन्हें युद्ध क्षेत्र में नहीं भेजा जाता।

योगेश कुमार गोयल

भारतीय सेना में महिलाओं की भागीदारी, बहुत कम संख्या और महत्त्वपूर्ण अभियानों में उनकी नगण्य भूमिका को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है। मगर हाल ही में भारतीय सेना में ‘महिला सैनिक भर्ती’ के लिए ऑनलाइन पंजीकरण की शुरुआत के साथ ही सेना में बतौर सैनिक कॅरियर बनाने की इच्छुक महिलाओं के लिए द्वार खोल दिए गए हैं। हालांकि शुरुआती चरण में सिर्फ सौ पदों के लिए भर्ती की जा रही है, लेकिन खबरों के मुताबिक भविष्य के लिए सेना में जवानों के रूप में महिलाओं की श्रेणीबद्ध तरीके से भर्ती की जाएगी, जिनकी भूमिका अपराध के मामलों की जांच करने से लेकर सेना के संचालन में सहायता करने तक होगी। जवानों के रूप में सेना में भर्ती की शुरुआत करने के साथ यह भी स्पष्ट किया गया है कि भारतीय सेना में अब महिलाओं की संख्या बीस फीसद होगी। ये महिलाएं सेना की मदद के साथ ही बलात्कार, छेड़छाड़ जैसे मामलों की जांच करेंगी। सेना पुलिस की भूमिका सैन्य क्षेत्रों के भीतर पुलिस कार्य की होती है। इन जवानों को सैनिक की तरह प्रशिक्षण तो दिया जाता है, मगर इन्हें युद्ध क्षेत्र में नहीं भेजा जाता।

सन 1990 के दशक में महिलाओं ने सेना में जाना शुरू किया था, लेकिन करीब तीन दशक बाद भी अगर सेना में उनकी संख्या देखें तो हैरानी होती है। फिलहाल चौदह लाख सशस्त्र बलों के पैंसठ हजार अधिकारियों की फौज में वायुसेना में 1610, थल सेना में 1561 और नौसेना में 489 महिलाएं ही हैं। दरअसल, अभी तक सेना में महिलाओं को सिर्फ अधिकारियों के रूप में शामिल किया जाता रहा है और उनकी भर्ती चिकित्सा, कानूनी, शैक्षिक, सिग्नल, इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में होती रही है, जिनकी जिम्मेदारी सैनिकों द्वारा नियमों और विनियमों के उल्लंघन को रोकना, सैनिकों के साथ शांति और युद्ध के दौरान रसद को बनाए रखना, युद्धबंदियों को संभालना और आम पुलिस को सहायता पहुंचाना आदि रही है। शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत चुनी जाने वाली महिला अधिकारी सेना में चौदह-पंद्रह साल तक ही अपनी सेवाएं दे पाती हैं। ऐसी महिला अधिकारियों की संख्या नगण्य ही रही है, जो स्थायी कमीशन में जगह बना पाती हैं। जहां तक युद्ध ऑपरेशनों की बात है तो दुनिया के कई समृद्ध देशों में युद्ध ऑपरेशनों में भी महिलाओं की अच्छी-खासी भागीदारी रहती है। अमेरिका में तो न्यूक्लियर मिसाइल सबमरीन्स पर भी महिलाओं की नियुक्ति होती है और मलेशिया, श्रीलंका, बांग्लादेश जैसे देश युद्ध में अपनी महिला सैनिकों को भी भेजते हैं। मगर हमारे यहां युद्ध अभियानों से महिलाओं को दूर रखा जाता रहा है। हमारी वायुसेना की महिला अधिकरियों को हेलिकॉप्टर और भारवाहक हवाई जहाज उड़ाने की ही अनुमति है और प्रायोगिक तौर पर उन्हें लड़ाकू जेट उड़ाने की भी अनुमति मिली है। वायुसेना में इस समय करीब सौ महिला पायलट हैं, लेकिन युद्ध क्षेत्र, सबमरीन और संकटग्रस्ट क्षेत्रों में उनकी नियुक्ति का अभी तक कोई प्रावधान नहीं है।

अगर विदेशी सेनाओं के मुकाबले भारतीय सेना में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की बात की जाए तो हम इस मामले में बहुत पीछे हैं। हालांकि अब सेना में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बीस फीसद करने का निर्णय लिया गया है, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। विदेशी सेनाओं में महिलाओं की संख्या पर नजर डालें तो चीनी सेना में करीब ढाई लाख महिला सैनिक हैं, जिनमें से डेढ़ लाख सशस्त्र बलों का हिस्सा हैं। अमेरिका में 1775 से ही महिलाएं सेना में शामिल होती रही हैं और फिलहाल वहां की सेना में करीब दो लाख महिला सैनिक हैं। करीब चार साल पहले वहां सेना में महिलाओं को युद्ध में शामिल होने की अनुमति भी मिल गई। फ्रांस में भी सन 1800 से ही महिलाएं सेना में शामिल हैं। इजराइल की महिला सैनिक दुनिया की सर्वाधिक खतरनाक महिला सैनिक मानी जाती हैं। वहां सेना में पुरुष और महिला सैनिकों की संख्या लगभग बराबर है। रूसी सेना में भी करीब दो लाख महिला सैनिक हैं। इन देशों के अलावा ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, यूनान, यूक्रेन, चेक गणराज्य, पोलैंड, पाकिस्तान, रोमानिया आदि में भी महिलाएं सेना का हिस्सा बन कर लड़ाकू और प्रशासनिक, दोनों प्रकार की भूमिकाएं बखूबी निभा रही हैं। दरअसल, भारतीय सेना में महिलाओं की संख्या बेहद सीमित रहने और बतौर सैनिक तैनाती न किए जाने को लेकर हमारी पुरुष मानसिकता काफी हद तक जिम्मेदार रही है। इसका अनुमान कुछ जिम्मेदार पदों बैठे लोगों के विचार से भी लगाया जा सकता है कि भारतीय सेना के अधिकतर जवान गांवों से आते हैं और वे महिला अधिकारियों का नेतृत्व स्वीकार करने को अभी तैयार नहीं हैं। यह भी कहा गया था कि अगर किसी युद्ध क्षेत्र में महिला को कमांड दी गई और उस दौरान अगर वे मातृत्व अवकाश मांगती हैं, तो क्या होगा? अगर महिला कमांडर के नेतृत्व में एक टुकड़ी लंबे ट्रैक पर जा रही है तो महिला अफसर के सोने का अलग से बंदोबस्त करना होगा और उनके कपड़े बदलने के लिए किसी जगह को घेर कर तैयार करना होगा।

इस प्रकार की मानसिकता के दायरे में भारतीय सेना को बांधते समय हम यह क्यों भूल जाते हैं कि हमारा इतिहास महिला वीरांगनाओं के युद्ध कौशल से भरा पड़ा था। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, चित्तूर की रानी चेनम्मा, चांद बीबी, गोंड की रानी दुर्गावती, झलकारी बाई, उदादेवी पासी आदि अनेक ऐसी ही महिला वीर योद्धाओं ने इसी धरा पर जन्म लेकर युद्ध के मोर्चे पर वीरता की सुनहरी इबारतें लिखी हैं। काफी पहले एक पिछड़े जमाने में अगर युद्ध क्षेत्र में कपड़े बदलने या गर्भवती होने या फिर पुरुष सैनिकों द्वारा उनका नेतृत्व स्वीकार करने जैसे सवालों से परे रह कर महिला वीरांगनाएं अपनी वीरता और युद्ध कौशल से हर किसी को हतप्रभ करती रहीं और अपने अदम्य साहस की मिसाल पेश करती रहीं तो क्या आज की महिलाओं में उस साहस या कौशल की कोई कमी है? अगर नहीं तो फिर क्यों उनका नेतृत्व स्वीकारने या मातृत्व अवकाश जैसी बातों को बेवजह तूल दिया जाता है? एक सवाल यह भी उठाया जाता रहा है कि अगर युद्ध के दौरान महिला सैनिक दुश्मन सेना की गिरफ्त में आ जाएं तो उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार हो सकता है। युद्धबंदियों के संरक्षण के लिए वियना सम्मेलन और कुछ अन्य अंतरराष्ट्रीय कानून अस्तित्व में हैं। इस तरह के सवालों या दलीलों के बीच अगर हम देखें तो दूसरे देशों की सेनाओं में महिला सैनिकों का पर्याप्त संख्या बल है। अमेरिका तो अपनी महिला सैनिकों को युद्ध के मोर्चे पर भी भेजता है, जहां वे शहीद भी होती हैं और कभी-कभार युद्धबंदी भी बनाई जाती हैं। मगर इसे लेकर वहां कभी इस प्रकार की मानसिकता या दलीलें देखने-सुनने को नहीं मिलीं। दरअसल, भारत को एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में विकसित करने के लिए हमें महिलाओं के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलना ही होगा।

यह तर्क भी दिया जाता है कि लड़ाकू भूमिकाओं में भर्ती के लिए महिलाएं सेना में अनिवार्य कठोर शर्तों को स्वीकार नहीं कर पाएंगी, क्योंकि महिलाओं के लिए वही मानक होंगे, जो लड़ाकू भूमिकाओं के लिए किसी आम सैनिक से अपेक्षित होते हैं। ऐसे तर्क देते समय हम यह भूल जाते हैं कि एक ओर जहां भारतीय वायुसेना में महिलाएं लड़ाकू पायलट बन चुकी हैं, वहीं सीमा सुरक्षा बल का महिला दस्ता पूरी जांबाजी के साथ देश की सीमाओं की चौकसी कर रहा है। आज अगर महिलाएं लड़ाकू विमानों से मिसाइलें गिरा सकती हैं तो उनमें बंदूक, तोप और टैंक चलाने की भी पूरी सामर्थ्य है। जरूरत है देश की बहादुर बेटियों को सेना के द्वार खोल कर अवसर प्रदान करने की। अगर देश की बेटियां सेना में भर्ती होने के तमाम जोखिम और परेशानियों को जानते-समझते हुए इसका हिस्सा बनने का जज्बा रखती हैं तो उन्हें इसका अवसर मिलना ही चाहिए।

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