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नशे की खेती में आतंक की फसल

भारत के लिए नारको आतंकवाद एक बड़ा खतरा है। अगर भारत में ही अफीम की खेती के मौके सुलभ होंगे तो आने वाले समय में हालात और खराब होंगे। देश का एक बड़ा इलाका पहले ही अशांत क्षेत्र है। इस इलाके में सुरक्षा बलों की पहुंच भी मुश्किल है। अगर ये इलाके नशे के कारोबार का केंद्र बने तो इसका खमियाजा समूचे देश को उठाना पड़ेगा।

अफीम की खेती (File Pic)

हाल ही में कई बड़ी खबरों के बीच एक महत्त्वपूर्ण खबर दब गई थी। पूर्वी भारत के बंगाल और बिहार में अफीम की खेती के मसले पर एक रिपोर्ट आई थी। यों तो नशे के लिए पंजाब बदनाम हो चुका है, लेकिन पूर्वी भारत के हालात चौंकाने वाले हैं। पूर्वी भारत के नक्सल प्रभावित इलाकों के अलावा बांग्लादेश की सीमा पर भी बड़े पैमाने पर अफीम की खेती हो रही है। खतरनाक संकेत यह है कि अफीम की खेती से होने वाली आय का इस्तेमाल आतंकवादी गतिविधियों में हो रहा है। इसके अलावा, नक्सलियों के सहयोग से बिहार और झारखंड के कई जिलों में भी अफीम की खेती का खुलासा हुआ है।

बिहार के गया जिले के बाराचट्टी तहसील में सुरक्षा बलों ने जनवरी-फरवरी 2016 में लगभग पांच सौ एकड़ में होने वाली अफीम की खेती को नष्ट किया। हालांकि सुरक्षा बल उन्हीं खेती को नष्ट करने में सफल हो पाए, जहां तक वे पहुंचने में सफल हुए। इस ब्लॉक के अंदर अभी भी हजारों एकड़ में अफीम की खेती हो रही है। कई इलाके नक्सलियों के प्रभाव वाले हैं, जहां सुरक्षा बल पहुंच नहीं पा रहे हैं। लेकिन बाराचट्टी ब्लॉक तो एक उदाहरण भर है। जिले के इमामगंज और डुमरिया इलाके में भी जम कर अफीम की खेती हो रही है। साथ ही झारखंड के चतरा, हजारीबाग, पलामू जिले के कई इलाकों में भी यही हालत है। बताया जाता है कि खेती की आय का एक बड़ा हिस्सा नक्सलियों को लेवी के तौर पर जा रहा है।
लेकिन पूर्वी सीमा पर भी हालात चिंताजनक है। बंगाल और बांग्लादेश की सीमा पर स्थित कई इलाकों में अफीम की खेती हो रही है। पश्चिम बंगाल के कालीचक में हाल ही में इसी वजह से एक बड़ा हंगामा हुआ था। दरअसल, पूर्वी सीमावर्ती इलाके में अफीम की खेती का सीधा संबंध बांग्लादेश और बंगाल में सक्रिय हो रहे आतंकी संगठनों से है। खतरे की घंटी इसलिए है कि उत्तर-पूर्व के सीमावर्ती इलाके और पड़ोसी बर्मा में यह फसल पहले से ही लहलहा रही है। कुछ संगठन अफीम की आय से अपने संगठन को मजबूत कर रहे हैं। इससे संगठन का विस्तार हो रहा है। हथियार खरीदने में भी अफीम की आय का इस्तेमाल हो रहा है। ठीक उसी तरह से जैसे अफगानिस्तान और पाकिस्तान में कई जिहादी संगठनों ने अफीम की आय का इस्तेमाल हथियारों की खरीद में किया।

नक्सल इलाकों में चोरी-चुपके अफीम की खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। खबरें यहां तक हैं कि प्रति एकड़ एक किसान को तीन से चार लाख रुपए का भुगतान किश्तों में हो रहा है। इस काम को अंजाम आसपास सक्रिय ड्रग माफिया दे रहे हैं। फसल बोने के लिए एक किश्त पहले किसानों को दी जाती है। फसल जब तैयार होने लगती है तो दूसरी किश्त जारी होती है। फिर फसल तैयार होने के बाद अंतिम किश्त दिया जाता है। ड्रग माफियाओं की नक्सलियों से सांठगांठ है! किसान भी इस खेती में शायद इसलिए रुचि ले रहे हैं कि अनाज की खेती से साल में मुश्किल से प्रति एकड़ दस से पंद्रह हजार रुपए की आय होती है। जबकि जिन-जिन गांवों में अफीम की खेती हो रही है, वहां जीवन-शैली बदलती नजर आ रही है। बहुत सारे लोगों ने इसी से होने वाली आमदनी से पक्के घर बना लिए हैं, उनके घरों के सामने गाड़ियां दिख रही हैं।
बताया जाता है कि नक्सली छोटी उम्र के युवकों को कैडर बनाने के लिए अफीम का इस्तेमाल भी कर रहे हैं। पहले उन्हें मादक पदार्थों की आदत लगाई जाती है, फिर लड़ाई के लिए तैयार किया जाता है। गौरतलब है कि बीते कुछ सालों के दौरान नक्सली आंदोलन कमजोर हुआ है। इसलिए इनसे जुड़े संगठन कई जगहों पर कैडरों की कमी से जूझ रहे हैं। ऐसी खबरें आम रही हैं कि दुनिया के कई इलाकों में युवकों को ‘जिहादी’ बनाने के लिए मादक पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। अकेले पाकिस्तान का उदाहरण इस मसले पर चिंता जाहिर करने के लिए काफी है। गरीब बच्चों को मदरसों में लाकर पहले बढ़िया भोजन का लोभ दिया जाता है। उनके परिवार को मदरसों की तरफ से दो से तीन लाख रुपए की रकम दी जाती है। जबकि किसी युवा के दिमाग को एक तरफ ले जाने के लिए उसे पहले ड्रग्स की आदत लगा दी जाती है। उसके बाद उसे हिंसा और लड़ाई की ट्रेनिंग दी जाती है।

इसी तरीके का इस्तेमाल यूरोप में पैदा हुए एशियाई मूल के जिहादी कहे जाने वाले युवकों के साथ किया गया। लंदन जैसे शहर में पढ़े-लिखे परिवारों के बच्चों को पहले ड्रग्स के डोज पर लाया गया, फिर उनका ब्रेनवॉश किया गया। जांच एजेंसियों के अनुसार मादक पदार्थों की आदत में डाल देने के बाद किसी को अपने विचारों के अनुकूल करना आसान हो जाता है। इससे पता चलता है कि ड्रग्स के जरिए आतंकी संगठन सिर्फ पैसे ही नहीं कमा रहे हैं, बल्कि आतंकी गतिविधियों के लिए लोग तैयार करने में भी इसका पूरा इस्तेमाल किया जा रहा है।
सही है कि पंजाब नशे के लिए बदनाम हो चुका है। लेकिन पंजाब में नशे की खेती नहीं होती है। पिछले कुछ सालों में पंजाब के रास्ते नशे की तस्करी बढ़ी है। इसका कारण मुख्य रूप से अफगानिस्तान से नाटो सैनिकों की वापसी है, जिसके बाद पंजाब में हेरोइन की आवक बढ़ गई। फिर वहां अफीम की खेती का रकबा भी बढ़ने लगा और आइएसआइ के साथ-साथ आतंकी संगठनों की भी आय बढ़ी। पंजाब में 2008 में सौ किलोग्राम, 2009 में एक सौ बीस किलोग्राम, 2010 में एक सौ पंद्रह किलोग्राम हेरोइन पकड़ा गया था। 2011 मे हेरोइन की आमद घटी तो इसका सीधा प्रभाव बरामदगी पर पड़ा। इस साल मात्र 68 किलो ही हेरोइन पकड़ा जा सका।

खुफिया एजेंसियों के मुताबिक 2010 में अफगानिस्तान में अफीम के उत्पादन में भारी गिरावट आई थी। पूरे देश में कुल 3600 टन अफीम का उत्पादन हुआ था। भारत में 2011 में हेरोइन की खेप घटने की यही वजह थी। दरअसल, अफीम से हेरोइन बना कर बाजार में लाने की प्रक्रिया में कुछ महीने लग जाते हैं। उसके अगले साल अफगानिस्तान में अफीम की खेती में अचानक बढ़ोतरी हो गई और उत्पादन 3600 टन से बढ़ कर 5800 टन तक पहुंच गया। इसका प्रभाव भारत के पंजाब में 2012 में दिखा। उसी साल राज्य में पाकिस्तानी सीमा से भेजा गया 290 किलोग्राम हेरोइन पकड़ा गया। फिर 2014 में पंजाब सीमा में 636 किलोग्राम, जबकि 2015 में 423 किलो हेरोइन बरामद हुआ। जांच एजेंसियों के अनुसार जितना हेरोइन बरामद हुआ, उसका कई गुणा पंजाब के रास्ते दुनिया के दूसरे मुल्कों में जा चुका है।

भारत के पंजाब में ड्रग भेजने के दो रास्ते हैं। ड्रग तस्कर अटारी तक आने वाले रेल रास्ते का इस्तेमाल भी हेरोइन भेजने में करते हैं। मालगाड़ी के अंदर इन मादक पदार्थों के पैकेट छिपा दिए जाते हैं। 2012 में मालगाड़ी से भेजे गए कुल एक सौ पैंतीस किलो हेरोइन के पैकेट बीएसएफ ने बरामद किया था। दूसरा रास्ता गुरदासपुर से लेकर फिरोजपुर जिले तक के सीमावर्ती खेत है। पाकिस्तान के तस्कर भारतीय क्षेत्र में बाड़ के बाहर खेतों में हेरोइन के पैकेट छुपा देते है। फिर मोबाइल के जरिए भारतीय तस्करों को उस जगह का संदेश भेज दिया जाता है। दिन में जब बाड़ की दूसरी तरफ के खेतों में किसानों के ट्रैक्टर जाते हैं, तो उसमें पैकेट डाल कर बाड़ के भीतर ले आया जाता है। इस पूरे खेल में भारतीय तस्कर पाकिस्तानी मोबाइल सिम का इस्तेमाल करते हैं।

खुफिया एजेंसियों की मानें तो देश में कुल तीन सौ बड़े तस्करों का नेटवर्क है जो भारत से नशीले पदार्थों को दुनिया के अलग-अलग भागों में भेजता है। इसकी पूरी सूची जांच एजेंसियों के पास है। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि पंजाब से कनाडा और यूरोप में भी आसानी से ड्रग भिजवाया जाता है। जबकि पंजाब में पाकिस्तान से आने वाले हेरोइन को दुबई भी मुंबई के रास्ते भेजा जाता है। दुबई तक हेरोइन भेजने के लिए मुंबई के बंदरगाहों का इस्तेमाल किया जाता है। भारत के पंजाब में हेरोइन गोल्डन क्रिसेंट रूट (अफगानिस्तान-पाकिस्तान) से आता है। जबकि भारत में ड्रग तस्करी का एक और मार्ग म्यांमा, थाईलैंड, लाओस और वियतनाम भी है। इस रास्ते से होने वाली तस्करी की आय एक हिस्सा उतर-पूर्व में सक्रिय आतंकी संगठनों को मिलता है।

भारत के लिए नारको आतंकवाद एक बड़ा खतरा है। अगर भारत में ही अफीम की खेती के मौके सुलभ होंगे तो आने वाले समय में हालात और खराब होंगे। देश का एक बड़ा इलाका पहले ही अशांत क्षेत्र है। इस इलाके में सुरक्षा बलों की पहुंच भी मुश्किल है। अगर ये इलाके नशे के कारोबार का केंद्र बने तो इसका खमियाजा समूचे देश को उठाना पड़ेगा। इसलिए सरकारों को ग्रामीण इलाकों में किसानों की सामान्य खेती को लाभदायक बनाना होगा, क्योंकि कई इलाकों में किसान पैसे के लोभ में भी नशे की खेती कर रहे हैं। दूरदराज के जिन इलाकों में जंगल ज्यादा है, वहां नशे की खेती आसान है, क्योंकि जांच एजेंसियों की नजर भी उधर नहीं जाती है। जबकि उड़ीसा, बंगाल, बिहार, झारखंड और छतीसगढ़ का बड़ा इलाका नक्सल प्रभावित है। बंगाल में कई जगह स्थानीय प्रशासन की मदद से ही अफीम की खेती के आरोप लगते रहे हैं।

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