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राजनीतिः टीबी उन्मूलन की नई चुनौती

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया के कुल टीबी रोगियों में से सैंतीस प्रतिशत केवल भारत में हैं। प्रतिवर्ष इससे होने वाली मौतों की संख्या लगभग पांच लाख है। यह बीमारी अब हर वर्ग के लोगों को होने लगी है। टीबी को एक ऐसी बीमारी के रूप में देखा जा रहा था जिस पर काबू पा लिया गया है। लेकिन तथ्यों पर गौर करें तो स्थिति भयावह है। टीबी को रोकने के लिए पल्स पोलियो जैसा अभियान चलाया जाना चाहिए।

Author March 31, 2018 1:45 AM
स्वास्थ्य विभाग के ताजा आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में बीमारियों से मौत के दस शीर्ष कारणों में एक प्रमुख कारण टीबी है।

स्वास्थ्य विभाग के ताजा आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में बीमारियों से मौत के दस शीर्ष कारणों में एक प्रमुख कारण टीबी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की टीबी पर जारी की गई हालिया रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के चौबीस फीसद टीबी के मामले भारत में हैं और इस रोग से हर साल करीब पांच लाख भारतीयों की मौत हो जाती है। इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्थिति कितनी भयावह है। भारत में टीबी की बीमारी दिन प्रतिदिन विकराल रूप लेती जा रही है। रोकने के प्रयास भी काफी हो रहे हैं लेकिन वे बेअसर साबित हो रहे हैं। एक तरफ हम आर्थिक विकास को चंगा करके दुनिया को देश की खुशनुमा शक्ल दिखाने में लगे हैं, दूसरी तरफ देशवासियों की सेहत के प्रति इस कदर बे-ख्याल हैं कि किसी न किसी बीमारी की गिरफ्त में आकर उनके चेहरे की रंगत पीली पड़ती जा रही है।

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टीबी का पूरा नाम है ट्यूबरकुल बेसिलाइ। यह एक संक्रमण से होने वाली बीमारी है और इसे प्रारंभिक अवस्था में ही न रोका गया तो जानलेवा साबित होती है। यह व्यक्तिको धीरे-धीरे मारती है। टीबी रोग को अन्य कई नामों से भी जाना जाता है, जैसे तपेदिक, क्षय रोग तथा यक्ष्मा। तमाम मौसमी, जल-जनित, संक्रामक और बड़ी बीमारियों की तो बात ही छोड़ दीजिए, अकेली ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) ही लाखों-करोड़ों लोगों की सेहत पर इस हद तक असरअंदाज हो रही है कि देश के लिए एक बड़ा खतरा बन गई है। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि देश के सामने बीमारी के रूप में एड्स से भी बड़ा खतरा टीबी है। आंकड़ों की गहराई में जाने पर स्थिति की भयावहता का अंदाजा होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, दुनिया के कुल ट्यूबरक्लोसिस रोगियों में से सैंतीस प्रतिशत केवल भारत में हैं। प्रतिवर्ष इससे होने वाली मौतों की संख्या लगभग पांच लाख है। यह बीमारी अब हर वर्ग के लोगों को होने लगी है। स्कूली बच्चे अब इस बीमारी की चपेट में सबसे ज्यादा आ रहे हैं।

चिकित्सकों की मानें तो टीबी के लक्षणों की जांच करना आसान होता है। लेकिन मरीज ज्यादा गौर नहीं करते। दो हफ्ते से ज्यादा लगातार खांसी, खांसी के साथ बलगम आ रहा हो, कभी-कभार खून भी, भूख कम लगना, लगातार वजन कम होना, शाम या रात के वक्तबुखार आना, सर्दी में भी पसीना आना, सांस उखड़ना या सांस लेते हुए सीने में दर्द होना, इनमें से कोई भी लक्षण हो सकता है। इसके अलावा सांस लेने में दिक्कत होना और सांस लेते हुए सीटी जैसी आवाज आना भी टीबी के लक्षण हो सकते हैं।
सावधानी के तौर पर टीबी के लक्षण दिखने पर तुरंत इलाज शुरू करना चाहिए। इसके अलावा डॉट्स सेंटर से दवाई लेकर और नियमित रूप से छह महीने तक खाने से टीबी से बचा जा सकता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि एचआईवी पीड़ित मरीजों में टीबी होने की आशंका अधिक रहती है। ऐसे मरीजों का प्रतिरोधक तंत्र (इम्यून सिस्टम) कमजोर हो जाता है। सबसे ज्यादा एचआईवी मरीजों की मौत टीबी के कारण होती है। टीबी रोग विशेषज्ञ डॉ केशव शर्मा की मानें तो टीबी के मरीजों की एचआईवी जांच भी होती है। राष्ट्रीय क्षयरोग नियंत्रण कार्यक्रम के अंतर्गत रोगी को डॉट्स पद्धति से दवाएं खिलाई जाती हैं। कुपोषित बच्चों में भी टीबी होने की आशंका रहती है।

भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, हर साल टीबी के लगभग अठारह लाख नए मामले प्रकाश में आते हैं। करीब तीन लाख भारतीय बच्चों को बीच में स्कूल मात्र इसलिए छोड़ देना पड़ता है कि टीबी से संक्रमित अपने माता-पिता का ख्याल रख सकें, नतीजतन बाद में वे भी इससे संक्रमित हो जाते हैं। दक्षिण पूर्व एशिया के कुल टीबी रोगियों में से लगभग 95 प्रतिशत बांग्लादेश, भारत, इंडोनेशिया, म्यांमा तथा थाईलैंड में हैं। पिछली सदी में पूरे विश्व में इससे होने वाली मौतों की संख्या लगभग तीन करोड़ थी और लगभग दस करोड़ लोग इससे संक्रमित थे। विश्व भर में लगभग अस्सी लाख लोग हर साल टीबी से संक्रमित होते हैं। हालात कितने नाजुक हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तमाम संक्रामक बीमारियों की अपेक्षा टीबी से भारत में सबसे ज्यादा मौतें होती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि इसका खतरा हर भारतवासी को है। वैसे भी यह एक संक्रामक रोग है। लेकिन शायद अमीरों पर इसका असर कम होने की वजह से इस ओर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना एड्स और पोलियो की रोकथाम पर दिया जाता है।
एक ‘साइलेंट किलर’ यानी खामोशी से वार करने वाली बीमारी की वजह से इसके अधिकतर मामले समय से प्रकाश में नहीं आ पाते हैं। ग्रामीण व पिछड़े इलाकों में लचर स्वास्थ्य सेवाओं की वजह से भी टीबी से संक्रमित व्यक्ति जान नहीं पाता कि वह इस बीमारी से ग्रसित है और जहां भी जाता है, संक्रमण फैलाता है। मसलन बस में उसके खांसने मात्र से कई यात्री इससे प्रभावित हो सकते हैं।

हालांकि टीबी अब जानलेवा बीमारी नहीं रही और इसका सफल इलाज हो सकता है, लेकिन इसके इलाज में समय और खर्च ज्यादा लगता है। कभी लापरवाही तो कभी निर्धनता की वजह से लोग इसके इलाज का कोर्स पूरा नहीं करते, जिसकी वजह से इसके बैक्टीरिया दोबारा से सक्रिय होने लगते हैं और धीरे-धीरे दवा के विरुद्ध लड़ने की क्षमता भी विकसित कर लेते हैं। इससे दवाएं इन पर निष्प्रभावी होने लगती हैं। ऐसे मरीजों का इलाज काफी मुश्किल और लगभग सौ गुना महंगा हो जाता है।
भारत जैसे विकासशील देशों में ऐसे मरीजों की मौत होने की आशंका अधिक रहती है, फिर भी डब्ल्यूएचओ द्वारा विकसित अधिक प्रभावशाली डॉट्स दवा के कोर्स से इनका इलाज मुमकिन है। हालांकि अभी भारत में इसके उतने उत्साहजनक परिणाम नहीं निकले हैं लेकिन यह माना जा रहा है कि डॉट्स की भारत में सफलता पर ही वैश्विक स्तर पर टीबी की रोकथाम निर्भर है। इस बीमारी के संबंध में भी वही पुरानी उक्ति ‘परहेज इलाज से बेहतर है’ चरितार्थ होती प्रतीत होती है, क्योंकि टीबी के संक्रमण का प्रभाव हर आदमी पर नहीं पड़ता, यानी जिनका इम्यून सिस्टम (रोगों से लड़ने की क्षमता) कमजोर हो वही इनके आसानी से शिकार होते हैं। लिहाजा, कुपोषण तथा पोषक तत्त्वों की कमी की वजह से गरीब इससे अधिक प्रभावित होते हैं।

दिल्ली जैसे बड़े शहरों का प्रदूषण टीबी को बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है। सड़क पर उड़ने वाली धूल-मिट्टी और निर्माण-कार्यों से होने वाला प्रदूषण व्यक्ति को तेजी से टीबी की तरफ धकेल रहा है। निर्माण-कार्य के दौरान अगर सावधानी नहीं बरती जाए तो धूलकण उड़ कर व्यक्ति के पेट में चले जाते हैं। इसी तरह सड़क पर मौजूद धूल-मिट््टी फेफड़ों में जाकर जम जाती है। इसके बाद मरीज को सांस संबंधी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। दरअसल टीबी एक संक्रामक रोग है जो आमतौर पर फेफड़ों को प्रभावित करता है। टीबी की बीमारी दूषित खान-पान, प्रदूषण और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर फैलती है। यह न केवल फेफड़ों, बल्कि शरीर के किसी भी हिस्से जैसे किडनी व दिमाग पर भी हमला कर सकती है।
टीबी को एक ऐसी बीमारी के रूप में देखा जा रहा था जिस पर काबू पा लिया गया है। लेकिन तथ्यों पर गौर करें तो स्थिति भयावह है। टीबी को रोकने के लिए पल्स पोलियो जैसा अभियान चलाया जाना चाहिए।

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