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राजनीतिः कब होंगे हथियार निर्माण में आत्मनिर्भर

कभी हम कहीं ज्यादा शांतिप्रिय देश थे और हथियारों को हिंसा की वजह मानते थे।

Author November 2, 2017 3:05 AM

हथियारों की यह खरीदारी भी हमारी सेना के लिए नाकाफी है। सेना ने हाल ही में चालीस हजार लाइट मशीनगनों का सौदा रद्द किया है, जो सेना की अहम जरूरत थी और वह कमी अभी पूरी नहीं हुई है। इसी तरह, सेना को चार हजार हॉवित्जर तोपों की जरूरत है। सेना को नए हेलिकॉप्टर चाहिए, क्योंकि ‘चीता’ और ‘चेतक’ का मॉडल पुराना हो चुका है और उन्हें बदलने की जरूरत है। इसी तरह, वायुसेना में मिग विमानों की पीढ़ी काफी पुरानी हो चुकी है और उनके हादसों की बढ़ती संख्या के कारण उन्हें चलता-फिरता ताबूत तक कहा जाता है। 

यह विडंबना ही है कि भारत अपने सशस्त्र बलों के लिए अभी तक ढंग की राइफल भी नहीं बना सका। देश अपनी रक्षा जरूरतों का साठ प्रतिशत आयात करता है। हाल ही में रक्षा मंत्रालय ने थल सेना के लिए चालीस हजार करोड़ रुपए के हथियारों का प्रस्ताव तैयार किया है। भारत आज दुनिया के बड़े हथियार आयातक देशों में से एक है। एक तरफ पाकिस्तान कश्मीर में हस्तक्षेप करता रहता है और दूसरी तरफ चीन हमारे बड़े भूभाग पर नजरें गड़ाए बैठा है। इन वजहों से हमें अमेरिका, रूस, फ्रांस जैसे राष्ट्रों से अत्याधुनिक हथियार खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है।

कभी हम कहीं ज्यादा शांतिप्रिय देश थे और हथियारों को हिंसा की वजह मानते थे। लेकिन चीनी हमले के बाद भारत को रणनीति बदलनी पड़ी। चीन और पाकिस्तान सीमा पर बढ़ते खतरे को देखते हुए भारत की चिंता का बढ़ना स्वाभाविक है। असॉल्ट राइफलों की खरीदारी में अनेक कारणों से देरी हुई है। कुछ दिनों पहले नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में यह दावा किया गया था कि सेना के पास सिर्फ बीस दिन की लड़ाई का गोला-बारूद है, जबकि किसी भी हालत में यह तैयारी चालीस दिन के लिए होनी जरूरी है। सीएजी की उस रिपोर्ट पर पूर्व रक्षामंत्री अरुण जेटली ने कहा था कि वह किसी एक समय के आकलन पर आधारित थी और अब स्थितियां बदल चुकी हैं।

निश्चित तौर पर वह रिपोर्ट पुरानी स्थितियों पर आधारित थी और संभव है कि तब से सेना की स्थिति में सुधार हुआ हो। इसके बावजूद, उस रिपोर्ट में जितनी तैयारियों की जरूरत बताई गई थी, वह पूरी नहीं हो पाई है। काफी समय तक तो उस रिपोर्ट को गलत बताने या झुठलाने का ही काम होता रहा। बहरहाल, देश की दूसरी महिला रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण ने बाड़मेर के उत्तरलाई हवाई अड्डे पर यह दावा करके देश को आश्वस्त करने की कोशिश की है कि सेना के पास पर्याप्त हथियार और गोला बारूद हैं। इसके बावजूद देश की रक्षा तैयारियों में किसी प्रकार की ढील दिए जाने की गुंजाइश नहीं है। शायद इसी ढिलाई को खत्म करने के लिए इस हथियार खरीद को अंतिम रूप दिया गया है। अब इसके साथ ही अगले कुछ दिनों में एलएमजी की खरीद के लिए ‘जानकारी का अनुरोध’ (रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉरमेशन) जारी किया जाएगा।

हथियारों की यह खरीदारी भी हमारी सेना के लिए नाकाफी है। सेना ने हाल ही में चालीस हजार लाइट मशीनगनों का सौदा रद्द किया है, जो सेना की अहम जरूरत थी और वह कमी अभी पूरी नहीं हुई है। इसी तरह, सेना को चार हजार हॉवित्जर तोपों की जरूरत है। सेना को नए हेलिकॉप्टर चाहिए, क्योंकि ‘चीता’ और ‘चेतक’ का मॉडल पुराना हो चुका है और उन्हें बदलने की जरूरत है। इसी तरह, वायुसेना में मिग विमानों की पीढ़ी काफी पुरानी हो चुकी है और उनके हादसों की बढ़ती संख्या के कारण उन्हें चलता-फिरता ताबूत तक कहा जाता है। अभी वायुसेना को 126 लड़ाकू विमानों की जरूरत है और इस दिशा में फ्रांस से छत्तीस विमानों का सौदा हुआ है। सेना को 2027 तक दो सौ जहाज चाहिए और अभी उसके पास सिर्फ एक सौ पैंतालीस ही हैं। सवाल यह है कि यह सारी रक्षा तैयारी होगी कैसे? सरकार इसके लिए ‘मेक इन इंडिया’ योजना के माध्यम से अपना लक्ष्य पाना चाहती है। इस क्षेत्र में रिलायंस डिफेंस जैसी कंपनी ने फ्रांस की डसाल्ट एविएशन के साथ सौदा किया है। लेकिन रिलायंस जैसी कंपनी इस क्षेत्र में एकदम नई है और उसे रक्षा उपकरणों के निर्माण का कोई अनुभव नहीं है। इसलिए चुनौती यह है कि किस तरह तेजी से हथियार और गोला बारूद की आवश्यकता पूरी की जाए और साथ ही उनकी उच्च गुणवत्ता कायम की जाए।

सवाल यह भी मौजूं है कि आखिर क्यों हम राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर देश के आम लोगों की खून पसीने की कमाई को विदेशी हथियारों की खरीद के नाम पर यों ही जायां कर देते हैं? क्यों हम स्वदेशी हथियारों के निर्माण के लिए ईमानदारी से प्रयास नहीं करते हैं। अब तो रक्षा क्षेत्र में अनुसंधान की कमी भी हमारी सरकारों की नीयत पर अंगुली उठाती है। मौजूदा सरकार ने भी इस क्षेत्र में दूसरों की नाकामियों को ही सामने लाने का काम किया है। इसके बजाय कुछ नई पहल की होती तो ठीक होता। अब भी इस सरकार दूसरों से हथियार खरीदने को मजबूर है। अब अनुसंधान एवं विकास में इस सरकार की कोशिशें नाकाफी क्यों हैं? देश में विशुद्ध विज्ञान विषयों में शोध करने वालों की संख्या बेहद कम है और भारत तेजी से बदलती दुनिया में पिछड़ रहा है। आखिर अब तक की सरकारों ने इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया? हथियारों की विदेशी खरीद के बजाय अपना तंत्र खड़ा करने में रुचि क्यों नहीं लेती?

भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 0.9 फीसद वैज्ञानिक अनुसंधान पर खर्च करता है, जबकि चीन इस मद में दो, जर्मनी 2.8 और इजरायल 4.6 फीसद व्यय करता है। सबसे ज्यादा जरूरी है देश की स्वदेशी रक्षा तैयारियां। इस दिशा में बातों से अधिक काम करने की जरूरत है। हालांकि, हम स्वदेशी हथियारों की सफलता को लेकर हमेशा सशंकित रहते हैं। शायद इसलिए कि हमारी सरकारें आला दर्जे के वैज्ञानिक नहीं बना पार्इं? हम देश की सुरक्षा के लिए व्यापक स्तर पर विदेशों से हथियारों की खरीद करते हैं तो कहीं उसके पीछे चीन की सामरिक शक्ति तो नहीं है!

यह तथ्य है कि चीन ने 1962 में भारत के साथ धोखा किया। तब के भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चीन को अपना अच्छा मित्र मानते थे, जबकि चीन अंदरूनी तौर पर भारतीय क्षेत्र पर हमले की तैयारी कर रहा था। उसने सीमा के पास न केवल तेजी से सड़कें बनार्इं बल्कि अपनी चौकियां भी स्थापित की थीं। यह एक तरह से लड़ाई की पूर्व तैयारी थी। इधर, स्पष्ट निर्देश के अभाव में भारतीय सेना न तो सीमा पर पर्याप्त चौकियां बना सकी और न ही सरकार की ओर से उन चौकियों तक रसद, हथियार आदि पहुंचाने के लिए सड़कें बनार्इं। ऐसे में अचानक चीन की सेना ने हमारी चौकियों पर हमला किया और वे हमारी सीमा के भीतर तक घुस आए। उत्तर में जम्मू-कश्मीर के लद्दाख क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा और पूर्व में अरुणाचल प्रदेश की ओर तवांग के आगे तक उन्होंने कब्जा कर लिया। ऐसा नहीं था कि चीनी गतिविधियों की सूचना भारतीय सेना को नहीं थी। सेना ने तो बाकायदा नई दिल्ली में बैठे नेताओं को कई बार गोपनीय सूचनाएं तक भेजीं, लेकिन दिल्ली ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

नेहरू का यही अटूट विश्वास चीन के अचानक हमले से खंड-खंड होकर टूटा। युद्ध में अत्याधुनिक हथियारों के अभाव में हमारे सैनिकों को पीछे हटना पड़ा। उस समय हमारा नेतृत्व इस मुगालते में था कि पड़ोसी हमारे भाई हैं। हिंदी-चीनी, भाई-भाई का नारा भी उसी दौर की उपज था। मगर एक हार ने भारतीय नेतृत्व की सोच बदल कर रख दी। बस उस एक लड़ाई के बाद से ही भारत ने तेजी से हथियार खरीदना शुरू किया। इस युद्ध के बाद से ही भारतीय सेना का आधुनिकीकरण शुरू हुआ। भारत ने तभी से अमेरिका, रूस, फ्रांस और अन्य देशों से हथियार खरीदना शुरू किया। वह सिलसिला आज तक जारी है। तब से अब तक हम अरबों-खरबों रुपए हथियारों पर फूंक चुके हैं। चालीस हजार करोड़ के हथियारों का यह सौदा भी उसी का एक हिस्सा है।

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