ताज़ा खबर
 

राजनीतिः यह खौफ कहां से आता है

कई मामलों में यह सामने आ चुका है कि महिलाओं को डायन बता कर मारने के पीछे प्रतिशोध की सोच और जायदाद पर कब्जा जमाने की साजिश होती है। चोटी काटने की घटनाओं के बारे में भी माना जा रहा है कि ये किसी सोची-समझी साजिश का हिस्सा हो सकती हैं ताकि भय का ऐसा माहौल बनाया जाए जिसमें महिलाएं घर के बाहर न निकलें।
Author August 4, 2017 02:39 am

मोनिका शर्मा

हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में महिलाओं की चोटी काटने की खबरों को अंधविश्वास, अफवाह या मसखरी से ज्यादा क्या समझा जाए? लेकिन अब ये घटनाएं गंभीर चिंता का विषय बन रही हैं, क्योंकि उत्तर प्रदेश के एक गांव में चोटी काटने की अफवाह में चुड़ैल समझ कर एक विधवा की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई। वह बुजुर्ग महिला शौच के लिए बाहर गई थी। अंधेरा होने के चलते रास्ता भटक कर एक बस्ती में जा पहुंची जहां लोगों ने चुड़ैल समझ कर उसे पीटना शुरू कर दिया और इलाज के लिए अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसकी मौत हो गई। महिलाओं की चोटी काटने की ये वारदातें भले ही अजब-गजब और हैरान करने वाली लगती हों पर असल में ये आधी आबादी के लिए प्रताड़ना और भय का ही कारण बन रही हैं।
इन घटनाओं ने दूरदराज के गांवों में दहशत और तनाव का माहौल बना दिया है। अब इसे शरारत कहें या किसी मनोवैज्ञानिक समस्या का परिणाम, बीते कुछ दिनों से ऐसी घटनाएं चर्चा में बनी हुई हैं। ये आधारहीन अफवाहें आमजन से लेकर समाचार चैनलों तक, विमर्श का विषय बन गई हैं। गौरतलब है कि सात साल पहले दिल्ली और उत्तर प्रदेश में ‘मुंहनोंचवा’ का भी ऐसा ही भय था, जिसके चलते लोगों ने रात के समय घरों से निकलना तक बंद कर दिया था। कइयों के साथ हुई घटनाओं के मुताबिक कोई अचानक लोगों का मुंह नोच लेता था। मुंहनोंचवा की वजह से कई की मौत होने की भी खबरें आई थीं। इसके एक साल बाद, 2001 में अचानक, दिल्ली में ‘मंकी मैन’ की खबरों से दहशत फैल गई थी। यहां तक कि लोगों ने मंकी मैन को देखे जाने का दावा भी किया। मंकी मैन द्वारा लोगों पर हमला किए जाने की खबरें भी मीडिया में खूब सुर्खियां बनीं। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश के एक गांव में ‘जमोगा’ नाम की बुरी शक्ति के भय से मासूम बच्चों के हाथों की अंगुलियां खौलते तेल में डालने के अंधविश्वासी कृत्य के भी समाचार आए थे। इतना ही नहीं, महिलाओं को डायन बता कर मार डालने के मामले तो अक्सर सामने आते रहते हैं।
विज्ञान के क्षेत्र में भारतीय प्रतिभा का लोहा आज सारी दुनिया मानती है। सूचना प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में तो भारत अब विकसित देशों की बराबरी करने लगा है। बुलेट ट्रेन और स्मार्ट सिटी बनाने का सपना देखने वाले देश में ये हालात वाकई चौंकाने वाले हैं। ये घटनाएं सोचने पर मजबूर करती हैं कि कैसे कुछ आधारहीन-सी बातें दहशत का कारण बन जाती हैं। कोई अदृश्य साया महिलाओं की चोटी काट लेता है, यह बात न मनोवैज्ञानिक पचा पा रहे हैं और न ही समाज का शिक्षित वर्ग। लेकिन ऐसी घटनाओं की खबरें आना जारी है।
दरअसल, चोटी काटने की अफवाह की कहानी सबसे पहले राजस्थान के जोधपुर से शुरू हुई। फिर यह पूरे राज्य में फैल गई। राजस्थान पुलिस की जांच में अब तक इस मामले में किसी जादुई शक्ति या भूत-प्रेत की कहानी सामने नहीं आई है। पुलिस ने भी इसे अंधविश्वास ही माना था और लोगों को समझाने की कोशिश की थी। अब हरियाणा और उत्तर प्रदेश से ऐसे समाचार आ रहे हैं। सरकार द्वारा चलाए गए तमाम जन-जागरूकता अभियानों के बावजूद देश के कई हिस्सों में आज भी अंधविश्वास की पैठ कायम है। समाज का बड़ा हिस्सा आज भी न केवल बीमारियों के इलाज के लिए झाड़-फूंक जैसे तमाम तरीकों में विश्वास रखता है बल्कि महिलाओं को डायन-चुड़ैल बता कर मार देने के मामले भी बहुत आम हैं। तमाम तरह के वैज्ञानिक विकास और आधुनिकता के दावों के बावजूद सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वासी कृत्यों का विकृत चेहरा समाज में दिख ही जाता है।
सूचना क्रांति के दौर में भी अंधविश्वास का दानव हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा है। यह बेहद अफसोसनाक है कि विज्ञान के क्षेत्र में आए दिन कामयाबी हासिल करने वाले देश में अफवाह, आडंबर और अंधविश्वास के रूप में इतना कुछ होता रहता है। भय और भ्रम का माहौल बनाने वाली यह नकारात्मकता आज भी जड़ें जमाए हुए है। जादू-टोने की अंधविश्वासी धारणाओं के कारण ग्रामीण जनों को कई विश्वासी फॉर्मूले हर बीमारी, हर परेशानी का हल लगते हैं। अंधविश्वास के चलते कितनी ही औरतें डायन बता कर प्रताड़ित ही नहीं की जातीं बल्कि मार भी दी जाती हैं। पिटाई कर मासूम बच्चों का कभी भूत भगाने के नाम पर शोषण होता है तो कभी बीमारी दूर करने के नाम पर बच्चियां कामुक शोषण तक झेलती हैं।
अफसोस कि चमत्कारी शक्तियों और अदृश्य सायों के नाम पर लोग न केवल ठगे जाते हैं बल्कि डर कर भी रहते हैं। अंधविश्वास के जाल में फंस कर लोग आर्थिक, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक शोषण के शिकार भी बनते हैं। महिलाओं को कई तरह के शोषण का दंश झेलना पड़ता है। ये सीधे-सीधे मानवाधिकारों के हनन के मामले होते हैं। स्वस्थ और प्रगतिशील समाज में इनका कोई स्थान नहीं होना चाहिए। लेकिन अंधविश्वास के फेर में पड़ कर आज भी जीवन से खिलवाड़ जारी है। अफवाहें फैलाने और डर का माहौल बनाने का काम हो रहा है।
यह जानलेवा अंधविश्वास हमारे समाज के लिए अभिशाप है। आज गांवों में अंधविश्वास के कारण डायन का आरोप लगा कर महिलाओं की हत्या तक की जा रही है, जो सभ्य समाज के लिए कलंक ही कहा जा सकता है। जबकि कई मामलों में यह सामने आ चुका है कि महिलाओं को डायन बता कर मारने के पीछे प्रतिशोध की सोच और जायदाद पर कब्जा जमाने की साजिश होती है। चोटी काटने की घटनाओं के बारे में भी माना जा रहा है कि ये किसी सोची-समझी साजिश का हिस्सा हो सकती हैं ताकि भय का ऐसा माहौल बनाया जाए जिसमें महिलाएं घर के बाहर न निकलें। अंधविश्वास फैला कर महिलाओं और लड़कियों को घरों में कैद करने और हमेशा सिर ढंक कर रहने के लिए मजबूर करना भी इन ऊलजलूल घटनाओं की अफवाह का कारण हो सकता है।

दरअसल, आज हमारा पूरा सामाजिक और पारिवारिक ढांचा कई तरह से समस्याग्रस्त है। खासकर महिलाओं के लिए सामाजिक रूढ़ियों का जाल मानसिक तनाव की बड़ी वजह है। उनके जीवन से जुड़ी मनोवैज्ञानिक उलझनें भी इतनी हैं कि वे तार्किक सोच से दूर अंधविश्वास की राह पकड़ लेती हैं। ऐसे में गुमराह करने वाले और आमजन के विश्वास को छलने वाले लोग इस मन:स्थिति का लाभ उठाते हैं। जरूरी है कि ऐसी अफवाहों की जड़ तक पहुंचा जाए। इन अफवाहों के पीछे छिपी दुर्भावना से लोगों को अवगत करवाया जाए। साथ ही जन-जागरूकता लाने के लिए भी जरूरी कदम उठाए जाएं क्योंकि वैज्ञानिक विकास की दौड़ में गति पकड़ रहे हमारे देश में आज भी जन-मानस को ज्ञान-विज्ञान की सही समझ न होना हमारी वैश्विक छवि को भी धूमिल करता है।

हालांकि वर्तमान में ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का स्तर भी बढ़ा है और जागरूकता भी आई है, पर अंधविश्वास की जड़ें पूरी तरह नहीं उखड़ पाई हैं। सामाजिक अंधविश्वासों और कुरीतियों के उन्मूलन को लेकर जागरूकता अभियानों को और व्यापक बनाने की दरकार है। मनोवैज्ञानिक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ऐसे अधिकतर मामले मनोवैज्ञानिक बीमारी होते हैं, जिन्हें अंधविश्वास की सोच वर्षों से पोषित करती आ रही है। इसीलिए पंचायतों के स्तर पर लोक-शिक्षण के कार्यक्रमों का आयोजन भी आवश्यक है। निस्संदेह जनमानस को ज्ञान-विज्ञान से जोड़े बिना ऐसी घटनाओं का होना जारी रहेगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.