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तीन तलाक को उलझाती राजनीति

खुद मुसलिम समाज का एक बड़ा वर्ग तीन तलाक के खिलाफ है, मुसलिम उलेमाओं में भी इसे लेकर भारी मतभेद है। बहुत कम उलेमा इस व्यवस्था के पक्षधर हैं। गोया यह विषय मुसलिम समाज के आंतरिक वाद-विवाद का विषय बन चुका है। ऐसे में क्या यह जरूरी है कि कोई राजनीतिक दल मुसलिम महिलाओं के लिए अपने घड़ियाली आंसू बहाता फिरे?

Author December 9, 2016 2:13 AM
बहुत कम उलेमा इस व्यवस्था के पक्षधर हैं। गोया यह विषय मुसलिम समाज के आंतरिक वाद-विवाद का विषय बन चुका है। ऐसे में क्या यह जरूरी है कि कोई राजनीतिक दल मुसलिम महिलाओं के लिए अपने घड़ियाली आंसू बहाता फिरे?

हमारे देश में राजनेताओं ने लोकलुभावन होने के चक्कर में राजनीति का स्तर इतना गिरा दिया है कि अब प्राय: अधिकतर राजनीतिक दल ऐसे मुद््दों की तलाश में रहते हैं जिनसे देश को कोई फायदा हो या न हो मगर लोगों को ऐसा प्रतीत होना चाहिए कि अमुक राजनीतिक दल या अमुक नेता समाज-विशेष के हितों की बात कर रहा है। हद तो यह है कि अब राजनीति की यही शैली सामाजिक समस्याओं के अतिरिक्त धार्मिक मामलों में भी प्रवेश कर चुकी है। उदाहरण के तौर पर इन दिनों देश में मुसलमानों के एक सीमित वर्ग से जुड़ा तीन तलाक का मामला सुर्खियों में है। इस विषय को लेकर भारतीय जनता पार्टी मुसलिम महिलाओं के प्रति अपनी हमदर्दी जताती नजर आ रही है जो कि हमेशा दूसरे दलों द्वारा मुसलिम हितों से संबंधित कोई भी बात किए जाने पर ‘तुष्टिकरण’ का ठप्पा लगाती रही है।

सवाल यह है कि क्या भाजपा या किसी दूसरे राजनीतिक दल को इस प्रकार के संवेदनशील धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करना चाहिए? और दूसरा सवाल यह भी कि क्या ऐसे गंभीर विषयों को अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना नैतिकतापूर्ण राजनीति का तकाजा है?
दरअसल, तीन बार तलाक बोल कर किसी मुसलिम पुरुष द्वारा अपनी पत्नी को तलाक दिए जाने की मान्यता मुसलिम जगत के एक अत्यंत सीमित वर्ग में पाई जाती है। वास्तव में दुनिया का अधिकांश मुसलिम समाज न तो तीन तलाक की इस व्यवस्था को मानता है न ही इस पर अमल करता है। यहां तक कि मुसलिम महिलाओं द्वारा ही इस व्यवस्था को बड़े पैमाने पर नकारा जा रहा है तथा इसे समाप्त करने की लड़ाई लड़ी जा रही है। हमारे देश की अनेक शिक्षित मुसलिम महिलाएं इस मुद््दे को अत्यंत मुखर रूप में उठा रही हैं। पर जब भाजपा तीन तलाक का विरोध करने वाली मुसलिम महिलाओं के पक्ष में उतरती दिखाई देती है, तो भाजपा की मूल मान्यताओं से आशंकित मुसलिम समाज इस निष्कर्ष पर पहुंचने में देर नहीं लगाता कि हो न हो भाजपा द्वारा तीन तलाक के विरोध में व मुसलिम महिलाओं के समर्थन में खड़ा होना शरीआ में दखलंदाजी करने तथा इसी बहाने समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में उठाया जाने वाला एक कदम है। और भाजपा की दखलंदाजी व मुसलिम नेतृत्व की यही सोच इस मामले का हल निकालने के बजाय इसे और अधिक पेचीदा बना रही है। मुसलिम समाज के बहुत सारे लोग इसे ध्रुवीकरण की भाजपा की जानी-पहचानी रणनीति से भी जोड़ कर देखते हैं।

हमारे देश में मुसलमानों में ही नहीं बल्कि हिंदू धर्म में भी अनेक बातें ऐसी हैं जिनकी रीतियों व परंपराओं के नाम पर अनदेखी की जाती रही है। उदाहरण के तौर पर, हिमाचल प्रदेश के लाहौल स्पीति में एक इलाका ऐसा है जहां हिंदू धर्मावलंबी चार व पांच भाइयों के बीच एक ही स्त्री से विवाह होता है। दुनिया में कहीं और शायद ऐसी व्यवस्था नहीं होगी। ये लोग धार्मिक परंपरा के नाम पर पांडवों का अनुसरण करने की दुहाई देते हैं तो दूसरी ओर इसका सामाजिक पहलू यह बताते हैं कि ऐसा करने से उनकी संपत्ति का बंटवारा नहीं होता। इसी प्रकार हिंदू समाज में बहुविवाह प्रथा न होने के बावजूद आज भी देश के लाखों हिंदू एक से अधिक पत्नियां रखे हुए हैं। इनमें देश के कई जाने-माने शख्स भी हैं। लेकिन कानून का डंडा ऐसी जगहों पर नहीं चलता, क्योंकि यह सबकुछ परस्पर सहमति के आधार पर होता है। जाहिर है, जब कोई आपत्ति करने वाला ही न हो तो कानून भी आखिर किसकी शिकायत पर संज्ञान ले?

हिजाब या पर्दा भी एक ऐसी ही व्यवस्था है जिसे सीधे तौर पर मुसलिम समुदाय से जोड़ कर देखा जाता है। जबकि वास्तव में यह हमारी क्षेत्रीय परंपराओं में से एक है। हिंदू समाज में आज भी घूंघट में बहुओं के रहने का रिवाज है, चाहे वे कितनी ही उम्रदराज क्यों न हो जाएं। पर जब भी पर्दे की बात होती है, तुरंत केवल मुसलिम समाज को इस परंपरा का जिम्मेवार मान लिया जाता है। दूसरी ओर, मुसलिम महिलाएं भी स्वयं इस व्यवस्था के विरुद्ध मुखरित हो चुकी हैं। मुसलिम समाज की आधी से अधिक महिलाएं, खासतौर पर शहरी महिलाएं पर्दा परंपरा का त्याग कर चुकी हैं। मुसलिम समाज के अंदर ही इस व्यवस्था को लेकर बड़े पैमाने पर मंथन तथा बहस जारी है। जाहिर है, यदि किसी दूसरे धर्म या समुदाय के लोग इस व्यवस्था पर उंगली उठाने की कोशिश करेंगे तो यहां भी जिद अथवा संदेह की स्थिति पैदा हो सकती है। इस प्रकार की और भी अनेक बातें हैं जो विभिन्न धर्मों में क्षेत्र तथा समुदाय के आधार पर भिन्नता के रूप में पाई जाती हैं। तीन तलाक का मसला भी एक ऐसा ही दुर्भाग्यपूर्ण विषय है जिससे स्वयं मुसलमानों का ही एक बड़ा वर्ग असहमत तथा दुखी है।

खुद मुसलिम समाज का एक बड़ा वर्ग तीन तलाक के खिलाफ है, मुसलिम उलेमाओं में भी इसे लेकर भारी मतभेद है। देश के बहुत कम उलेमा इस व्यवस्था के पक्षधर हैं। अन्यथा अधिकतर उलेमा स्वयं समय-समय पर इस व्यवस्था को गैर-इस्लामी, गैर-शरयी तथा गैर-इंसानी बताते रहते हैं। गोया यह विषय मुसलिम समाज के आंतरिक वाद-विवाद का विषय बन चुका है। ऐसे में क्या यह जरूरी है कि कोई राजनीतिक दल मुसलिम महिलाओं के लिए अपने घड़ियाली आंसू बहाता फिरे? और वह भी ऐसा राजनीतिक दल, जिसने कभी भी मुसलिम हितों की चिंता न की हो, जिसने मुसलिम समाज की समस्याओं को उजागर करने वाली सच्चर आयोग की रिपोर्ट की पूरी तरह अनदेखी की हो। जाहिर है, जब ऐसे लोग मुसलिम महिलाओं के शुभचिंतक के रूप में खड़े दिखाई देंगे तो दूसरी ओर से उनकी इस ‘घड़ियाली’ हमदर्दी पर संदेह किया जाना स्वाभाविक है। यही वजह है कि कुछ मुसलिम संगठन इस विषय के पक्ष में सिर्फ इसलिए खड़े हो गए हैं कि उन्हें यह संदेह होने लगा कि यह उनके धार्मिक मामलों में दखलंदाजी करने की कोशिश है। इसीलिए प्राप्त समाचारों के अनुसार, इन मुसलिम संगठनों ने मुसलिम महिलाओं में तीन तलाक की व्यवस्था के समर्थन में हस्ताक्षर अभियान भी चलाया है।

लिहाजा, जरूरत इस बात की है कि कोई भी राजनीतिक दल या सरकारें किसी धर्म अथवा समुदाय विशेष में पाई जाने वाली कुरीतियों व अप्रासंगिक परंपराओं को समाप्त करने या उन्हें सुधारने का जिम्मा स्वयं लेने के बजाय उन्हीं उसी धर्म व समुदाय विशेष के धर्मगुरुओं या समाज सुधारकों पर ही छोड़ दें। और यदि सामाजिक हितों की बात करनी ही है तो सभी समाज सुधारकों व धर्मगुरुओं को दूसरे धर्म व समाज पर नुक्ताचीनी करने या उंगली उठाने के बजाय अपने ही समाज की कुरीतियों व गलत परंपराओं को उजागर करना चाहिए तथा उनमें सुधार लाने की कोशिश करनी चाहिए। हां यदि महिलाओं के प्रति हमदर्दी जतानी ही है तो उनके धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करने के बजाय उनकी शैक्षिक, आर्थिक तथा उनके स्वास्थ्य से संबंधित विषयों पर उनके सहयोग व आत्मनिर्भरता की बात की जानी चाहिए। उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें रोजगार तथा दूसरे प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए। केवल तीन तलाक जैसे मजहब संबंधी विवादित मसले पर उनके साथ खड़े दिखाई देना उनकी हमदर्दी कम राजनीति अधिक दिखाई देती है। अत: धार्मिक विषयों के राजनीतिकरण से बाज आने की जरूरत है।

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