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बेबाक बोलः लब-ओ-लुआब- लबों पर लगाम

लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स में वित्त मंत्री अरुण जेटली से स्मृति ईरानी के पूर्व महकमे से जुड़ा सवाल पूछा गया, यानी दिल्ली के रामजस कॉलेज में हुई हिंसा।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की यह रिपोर्ट जब सामने आई कि पिछले एक दशक में वेतनभोगी महिलाओं की संख्या में चार फीसद की गिरावट आई, उसी समय कोच्चि में रामजस प्रकरण के संदर्भ में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आगाह करते हुए कहा, ‘किसी भी समाज की कसौटी महिलाओं और बच्चों के प्रति उसका रुख होती है’। जब देश के प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों को निहायत गैरजिम्मेदाराना तरीके से अय्याशी, देशद्रोह और हिंसा का अड्डा साबित करने की कोशिश की जाएगी, लड़कियों की आजाद आवाज के बरक्स बलात्कार जैसे शब्द गूंजने लगेंगे तो ऐसे संस्थानों से सबसे पहले लड़कियों की दूरी बढ़ाई जाएगी। इतिहास गवाह है कि जहां भी लोकतंत्र की जमीन सिकोड़ी गई है महिलाओं के हिस्से का आसमान ही छिना है। विश्वविद्यालय परिसरों में वैध आलोचना, असहमति पर कुठाराघात के खिलाफ और सृजनात्मकता व स्वतंत्र चिंतन की पैरोकारी में इस बार का बेबाक बोल।

लंदन स्कूल आॅफ इकोनॉमिक्स में वित्त मंत्री अरुण जेटली से स्मृति ईरानी के पूर्व महकमे से जुड़ा सवाल पूछा गया, यानी दिल्ली के रामजस कॉलेज में हुई हिंसा। पिछले साल बसंत में जेएनयू और इस साल के बसंत में वह बयार डीयू तक पहुंच गई। बहरहाल, जब जेटली से इस बाबत सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘मैं इसे पूरी तरह से आश्चर्यचकित करने वाला पाता हूं कि मैं तो भारत के टुकड़े करने की वकालत करने की आजादी का इस्तेमाल करूं और जो मेरे इस कदम का विरोध करें, वे अभिव्यक्ति की आजादी की राह में बाधा डालने वाले कहे जाएं, यह कैसी बात, उन्हें भी अभिव्यक्ति की आजादी हासिल है’।

रामजस में साधारण शिक्षकों और छात्रों की बेरहमी से पिटाई, उन पर पत्थरबाजी को विदेशी जमीन पर जेटली जी ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ कह रहे हैं। डीयू के एक प्रतिष्ठित कॉलेज की लड़की जब इस हिंसा के खिलाफ आवाज उठाती है और उसके एवज में उसे बलात्कार तक की धमकी मिलती है तो केंद्रीय गृह राज्यमंत्री को उस लड़की के सम्मान नहीं, उसके दिमागी ‘प्रदूषण’ की ज्यादा चिंता होती है। अब यह समझने के लिए बहुत ज्यादा मेहनत करने की जरूरत नहीं है कि जेटली और रिजीजू के बयान उन्हें किस पक्ष में खड़ा कर कर रहे हैं। इसके पहले हम स्मृति ईरानी का भी हाल देख चुके हैं कि कैसे वे सरकार की भूमिका से अलग हट कर एक खास पक्ष बनकर खड़ी हो गई थीं। सरकार का इकबाल बचा रहे, इसके लिए जरूरी है कि वह सबकी दिखे, खुद एक पक्ष न बन जाए। मगर तब उनके रुख ने बताया कि वे किस तरह सीधे मोर्चा लेने पर उतारू हैं और सरकार में एक जिम्मेदार मंत्रिपद होने के नाते यह अफसोसनाक था।

यों रामजस कॉलेज की घटना के सतह पर जो दिख रहा है, उसके नीचे उसके तार समूची व्यवस्था से जुड़ते हैं। अगर परतें उघाड़ी जाएं तो पिछले तीन दशकों से चल रहे आर्थिक सुधारों पर भी बात करनी जरूरी होगी, जो अब शिक्षा के क्षेत्र को गहरे स्तर तक प्रभावित कर रहा है। अपने बजट भाषण में अरुण जेटली ने कहा था कि जिन कॉलेजों या विश्वविद्यालयों की ग्रेडिंग अच्छी होगी उन्हें स्वायत्त घोषित कर दिया जाएगा। यूजीसी का काम खत्म होगा और राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन (मान्यता) परिषद (नैक) का काम शुरू होगा। डीयू में छह कॉलेजों की स्वायत्तता पर बात चल रही है और सेंट स्टीफंस की गवर्निंग बॉडी ने तो इस पर मुहर भी लगा दी है। यह विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) और गैट की नीतियों को आगे बढ़ाने का ही एक हिस्सा है, जिसमें शिक्षा संस्थानों को भी ‘ट्रेड’ यानी व्यापार के दायरे में लाने की बात की गई थी। यानी जो भी व्यापार और कारोबार का हिस्सा होगा, डब्लूटीओ के तहत उसमें सरकार को निजी और सरकारी दोनों संस्थानों को बराबर की सबसिडी देनी होगी।

यानी अब नैक के तहत जिसे अच्छी रैंकिंग मिलेगी, उसे अपना पाठ्यक्रम और संसाधन खुद तैयार करने की आजादी मिलेगी। और जिनकी रैंकिंग अच्छी नहीं होगी, वे बाहर हो जाएंगे। उधर, वेतन आयोग की रिपोर्ट भी सरकार को मिल चुकी है, जिसकी सिफारिश सरकार पर बहुत बड़ा दबाव है। लब्बोलुआब यह कि उच्च शिक्षा परिसरों के निजीकरण की पूरी तैयारी है। सवाल है कि क्या हम उच्च शिक्षा को पूरी तरह से बाजार के हवाले करने के लिए तैयार हैं? यह देश को किस राह पर ले जाएगा इस पर बहस शुरू हो चुकी थी। स्टीफंस की स्वायत्तता की ओर उठाए कदम पर सवाल उठ रहे थे। जिस दिन स्टीफंस की स्वायत्तता पर मुहर लगने की प्रक्रिया चल रही थी, कॉलेज परिसर के बाहर उसका तेज विरोध हो रहा था। लेकिन इतने बड़े बदलाव के समय में बहस का विषय बन गया एबीवीपी बनाम आइसा का टकराव।

तो आखिर वे कौन-सी शक्तियां हैं जो निजीकरण, स्वायत्तता और शिक्षा बनाम रोजगार जैसे मुद्दों को भटका कर जेएनयू के बाद डीयू को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद बनाम आइसा की लड़ाई में झोंक रही हैं। पहले जेएनयू पर देशद्रोह और सेक्स का खुला अड्डा होने का ठप्पा लगाने की कोशिश, अब डीयू के छात्रों की ऊर्जा प्रदर्शन और जवाबी प्रदर्शन में झोंकी जा रही है। सवाल है कि जब संस्थान अपने जनसरोकारी और कल्याणकारी शक्ल में नहीं बचेंगे तो उसमें भविष्य में विद्यार्थियों की जगह क्या होगी। असहमति के लिए साहस और सहमति के लिए विवेक पैदा करना शिक्षा की बुनियादी और अनिवार्य शर्त है। शिक्षा की बुनियाद ही इसी पर टिकी है। लेकिन जेएनयू से लेकर डीयू तक सिर्फ वाम और दक्षिण की लड़ाई बनाने की साजिश कर उन हजारों विद्यार्थियों को खारिज किया जा रहा है जो विश्वविद्यालय में आधुनिक लोकतांत्रिक दिमाग पाने की इच्छा रखते हैं। क्या यह मुद्दा सिर्फ वाम बनाम दक्षिण का है? मंगलवार को हुई रैली में मीडिया के कैमरों के सामने बहुत-सी लड़कियां कह रही थीं कि हम वामपंथी दल से जुड़े हुए नहीं हैं। हम लोकतांत्रिक और आधुनिक सोच के साथ हैं, और एबीवीपी की हिंसा के खिलाफ हैं।

हिंसा के खिलाफ हुई रैली में भारी संख्या में लड़कियों की मौजूदगी आखिर क्या बताती है? जब आप जेएनयू को अय्याशी का अड्डा बताएंगे और डीयू को हिंसा का मंच बना देंगे तो उसका सबसे ज्यादा खमियाजा लड़कियों को ही उठाना पड़ेगा। महीनों पहले युद्ध के विरोध में आवाज उठाने वाली गुरमेहर कौर जब एबीवीपी की मुखालफत करती है तो सरकार से लेकर सड़क तक मौजूद देशभक्ति के कथित नुमाइंदे उसे ‘प्रदूषित’ दिमाग वाली करार देते हैं। हालत यह बना दी गई कि फिलहाल उसे दिल्ली छोड़ कर जाना पड़ा। ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ के नारे लगाने वाली सरकार अगर विश्वविद्यालयों को अय्याशी और हिंसा की पहचान में रंगने की छूट देगी तो सबसे पहले विश्वविद्यालयों से लड़कियों का ही साथ छुड़ाया जाएगा। कश्मीर, केरल, तमिलनाडु, बिहार और बंगाल के अभिभावक जिस गर्व के साथ अपनी बेटियों को जेएनयू और डीयू के परिसरों में भेजते रहे हैं, क्या उनमें अब पहले की तरह के गर्व और सुकून का भाव रह पाएगा? मीडिया के कैमरे पर लड़कियों की यह चिंता साफ दिख रही थी।

क्या अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को लड़कियों की यह चिंता दिख रही है? एबीवीपी ने पहले कन्हैया कुमार और बाद में गुरमेहर कौर को ‘राष्ट्र का खलनायक बनाने की कोशिश की। लेकिन असर उल्टा हुआ। इन दोनों को आम लोगों का अभूतपूर्व समर्थन मिला और युवाओं के बीच इनकी छवि नायक वाली बनी। वहीं शैक्षणिक परिसरों में सीख और समझ रहे दिमागों के बीच आइसा से जुड़े लोग अफजल गुरु जैसे मुद्दे को लाते हैं तो यह अतिरेक उन्हें ही आपसे दूर करता है जिन्हें आपकी सबसे ज्यादा जरूरत है। सवाल है कि पिछले एक-दो सालों के भीतर कॉलेज परिसरों में राष्ट्रवाद की लड़ाई और बहसों का हासिल क्या रहा? अब जरूरत इस बात की है कि दोनों पक्ष सोचें कि आज देश के सामने किन मुद्दों को लेकर संघर्ष की जरूरत है। शिक्षा का निजीकरण, बेरोजगारी और गैरबराबरी जैसे मुद्दों पर बहस पीछे छूट जाती है, और राष्ट्रवाद और कश्मीर पर आ जाती है। जो मुद्दे खास क्षेत्रीय संदर्भ में अलग तरह की जिम्मेदारी भरे विमर्श की मांग करते हैं, उन्हें सामान्य समझ वाले छात्रों के बीच नारेबाजी की तरह उठाने के कारण वे खारिज ही होते हैं।
भारत जैसे देश में लोकतंत्र के कई स्तर होते हैं और इन्हीं परतों की पहचान और सम्मान सिखाना विश्वविद्यालय परिसरों का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। सिर्फ एक आवाज नहीं, बल्कि ‘आवाजों’ को सुनना और समझना सिखाया जाए। विश्वविद्यालय में इस संस्कृति को बचा कर ही सभी के लिए जगह वाले भारत को बचाया जा सकता है। बेहतर यह है कि भाजपा, कांग्रेस, माकपा, भाकपा, भाकपा-माले इसे संसदीय राजनीति का अड्डा न बनाएं। परेशान गुरमेहर कौर ने कहा था कि उसे अकेला छोड़ दिया जाए और यही अपील राजनीतिक दलों से भी है कि विश्वविद्यालयों में एबीवीपी, एनएसयूआइ, आइसा, एसएफआइ, एआइएसएफ… को छात्र संगठनों के स्तर पर ही राजनीति करने और समझने के लिए छोड़ दिया जाए। ‘देशप्रेम’ के नुमाइंदों को शब्दों और तर्कों से वार करना सिखाइए, पत्थरों से नहीं। दुनिया की हर सभ्यता और संस्कृति में ‘आजादी’ सबसे प्यारा, रुमानी होने के साथ सबसे मुश्किल शब्द भी है। इस शब्द के साथ बहुत बड़ी जिम्मेदारी जुड़ी है। आजाद लबों के साथ इस जिम्मेदारी को भी समझिए। समाज के साथ संवाद बढ़ाने वाली भाषा बोलिए।

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