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राजनीतिः नहर विवाद में दांव पर क्या

किसान मतदाता पंजाब की राजनीति में बहुत मायने रखते हैं। अपनी सरकार का लगातार दो कार्यकाल पूरा करने जा रहे बादल जानते हैं कि लोग इस बार उनके कामकाज के आधार पर उन्हें परखेंगे, उनके वादों के आधार पर नहीं। लिहाजा, बादल को एक भावनात्मक मसले की तलाश थी, जो उनकी सरकार के कामकाज से ध्यान बंटा सके।

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पंजाब में शिरोमणि अकाली दल ने आगामी विधानसभा चुनाव को ध्याान में रख जो चाल चली है वह अपना घर फूंकने वाली ही लग रही है। हालांकि इसके सुप्रीमो और राज्य के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल जो राजनीति में कुशल रणनीतिकार माने जाते हैं, उन्होंने राज्य में अपनी सरकार के लगातार दो कार्यकाल को लगभग पूरा करते हुए उन किसान पखिारों को साध लिया है जो कभी उनके खिलाफ थे, राज्य में 214 किलोमीटर लंबी सतलज यमुना मुख्य जोड़ नहर बनाए जाने के कारण। जबकि लगभग चालीस साल पहले राज्यों में आपसी सहयोग बढ़ाने और देश में संघीय ढांचे को और मजबूत बनाने के मकसद से शिरोमणि अकाली दल ने कांग्रेस के साथ मिल कर पंजाब से हरियाणा और राजस्थान को पानी दिए जाने की योजना को सिरमाथे लिया था।
केंद्र में और पड़ोसी हरियाणा में सहयोगी दल भाजपा सरकार के होते हुए भी पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने ऐसा कदम क्यों उठाया जो केंद्र को सांसत में डाल दे और हरियाणा को आमने-सामने खड़ा कर दे? दरअसल, इसका कारण चुनावी राजनीति में छिपा है। पंजाब में बड़े पैमाने पर जन असंतोष दिख रहा है। बेरोजगारी है, महंगाई है, भ्रष्टाचार का बोलबाला है। राज्य की माली हालत खस्ता है, क्योंकि विकास के नाम पर लिये गए ढेरों कर्ज वापस नहीं किए जा सके हैं। राज्य के युवाओं में बढ़ती नशाखोरी से सेना, अर्धसैनिक बलों तथा प्रशासनिक सेवाओं में उनके जाने के मौके खासे घटे हैं। पंजाब मुख्य तौर पर खेती पर निर्भर राज्य है। इस कारण, किसान मतदाता पंजाब की राजनीति में बहुत मायने रखते हैं। अपनी सरकार का लगातार दो कार्यकाल पूरा करने जा रहे बादल जानते हैं कि लोग उनके कामकाज के आधार पर उन्हें परखेंगे, उनके वादों के आधार पर नहीं। लिहाजा, बादल को एक भावनात्मक मसले की तलाश थी, जो उनकी सरकार के कामकाज से ध्यान बंटा सके।
सतलज-यमुना जोड़ नहर को मटियामेट कर 3928 एकड़ जमीन को उसके मूल स्वामियों या उनके वारिसों को बांट देने और नहर बनाने के लिए हरियाणा सरकार से मिले 390 करोड़ रुपए वापस करने का फैसला राज्य विधानसभा में चौदह मार्च को पास करा कर प्रकाश सिंह बादल ने खेती आश्रित पड़ोसी राज्य हरियाणा को भी अचंभित कर दिया। हरियाणा के मुख्यमंत्री ने पंजाब सरकार से मिला 191 करोड़ का चेक वापस कर दिया। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार की अपील पर व्यवस्था दी कि इस मामले में यथास्थिति बहाल रखी जाए। साथ ही पंजाब सरकार को निर्देश दिया कि वह अपनी सीमा में नहर का निर्माण कार्य पूरा कराए।
पंजाब में पहले हरित क्रांति का ऐसा जलवा था कि वह पूरे देश को अनाज देने में अग्रणी था। सिंचाई का अच्छा बंदोबस्त न होने से ज्यादातर किसानों ने ट्यूबवेल का इस्तेमाल किया। इससे भूजल-स्तर गिरता गया। फिर उपज पर भी असर पड़ा। लगभग साढ़े तीन दशक बाद भी इस जोड़ नहर के पूरा न होने से पंजाब में भी खासी निराशा थी। पर हरियाणा राज्य तब अपनी उलझनों में इतना उलझा था कि इस मसले पर ज्यादा चर्चा नहीं हुई। वहां तब कांग्रेस सरकार थी। केंद्र में भी कांग्रेस नेतृत्व की सरकार थी। पंजाब विधानसभा में जैसे ही मुख्यमंत्री ने बिना किसी मुआवजे के नहर भूमि वापसी की घोषणा की, राज्य के उन जिलों में जहां नहर बनी थी वहां फौरन जेसीबी मशीनों से नहर तोड़ी जाने लगी और जमीन को समतल बनाने अभियान छेड़ दिया गया। जितनी तेजी से जमीन कब्जाने का काम हुआ उससे जाहिर है कि स्थानीय अकाली नेताओं के संरक्षण में ही उसे अंजाम दिया गया होगा।
बादल ने अपने सहयोगी दल भाजपा की केंद्र सरकार और उसकी पड़ोसी (हरियाणा की) सरकार को सतर्क करने के साथ ही अपनी रणनीति से मुख्य विपक्षियों को भी अवाक कर दिया है। अलबत्ता अंतररराज्यीय जल समझौते को पलीता लगाने वाले वे पहले मुख्यमंत्री नहीं हैं। कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री रहते हुए ‘पंजाब टर्मिनेशन आॅफ एग्रीमेंट्स एक्ट 2004’ विधानसभा से पारित कराया था। यह मामला अब भी अदालत में है। अदालत को तय करना है कि यह अधिनियम संविधान के अनुरूप है या नहीं। दूसरे, रावी तथा व्यास के पानी के बंटवारे को लेकर हुए तमाम समझौते रद््द करने का अधिकार पंजाब को है या नहीं। बहरहाल, चूंकि यह मामला पंजाब विधानसभा के अधिकार-क्षेत्र में नहीं आता और पंजाब पुनर्गठन कानून 1966 और अंतरदेशीय जल विवाद कानून 1956 की भावना के खिलाफ है, इसलिए पंजाब सरकार अकेले कोई निर्णय नहीं कर सकती।
एक रोचक मामला इस मुद्दे से जुड़ा हुआ यह है कि विधानसभा में विधेयक पास कराने के बाद मुख्यमंत्री बादल के नेतृत्व में तमाम विधायक राज्यपाल कप्तानसिंह सोलंकी से मिल कर उनसे विधेयक को मंजूरी देने का अनुरोध करने पहुंचे। कहा जाता है कि उनमें से किसी के पास उस विधेयक की प्रति नहीं थी। ऐसा क्यों था, इस बारे में अटकलें लगाई जा रही हैं। यह भी माना जा रहा है कि यह कोई सोची-समझी चाल रही होगी। सोलंकी हरियाणा के भी राज्यपाल हैं, इसलिए वे खासे असमंजस की स्थिति में रहे होंगे, क्योंकि हरियाणा लगातार इस विधेयक का विरोध कर रहा है।
राज्यपाल यदि विधेयक को अपनी मंजूरी दे देते तो भी यह कानून नहीं बनता। राज्यपाल की मंजूरी के बाद जब राज्य सरकार इस पंजाब एसवाइएल कैनाल लैंड रिटर्न आफ प्रोप्राइटी राइट्स विधेयक को अधिसूचित करेगी तभी यह कानून बनेगा। भूमि स्वामित्व की प्रक्रिया खासी जटिल होती है। मुख्यमंत्री ने अधिसूचना जारी करने की बात सत्रह मार्च को कही जरूर है पर वे भी तकनीकी कठिनाइयों से भलीभांति परिचित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने नहर को लेकर यथास्थिति बनाए रखने को कहा है। यानी स्वामित्व का मामला और उलझेगा। अदालती आदेश के मुताबिक मुख्यमंत्री और राज्य के पुलिस महानिदेशक इस जमीन के रिसीवर हैं। यानी सारी जिम्म्ोदारी उनकी। पांच हजार किसानों से एसवाइएल (सतलज-यमुना लिंक नहर) के नाम पर मुआवजा देकर ली गई इस 3928 एकड़ जमीन के पैंतीस साल पहले के कई ऐसे मालिक भी हो सकते हैं जो मर-खप चुके हों। गांवों की जमाबंदी में से एक-एक ब्योरा देख कर मूल स्वामी की तलाश करके उसकी तस्दीक के बाद ही भूमि संबंधी कागजात पूरे हो सकेंगे।
सवाल यह है कि इतने शोरगुल के बाद हासिल क्या हुआ। पानी के खेल में खासी आग और धुआं उठा कर बादल ने आजादी और आजादी के बाद के पंजाब और उसके विभाजन के साथ उठे तमाम सवालों के साथ ही कई संवैधानिक सवाल उठाने के भी मौके दे दिए हैं। एक दौर वह था जब आजादी के पहले जब इस राज्य को सात नदियों का पानी मिलता था। आजादी के बाद लियाकत-नेहरू समझौते से पानी बंटा। पूर्वी पंजाब को 152 लाख एकड़ फीट जल मिलना तय पाया गया। उसे यह जल रावी-व्यास और सतलज से तथा पश्चिम पंजाब को चिनाब झेलम और सिंधु से तीन करोड़ एकड़ फीट जल मिलना शुरू हुआ।
आगे पंजाब के इस पानी का बंटवारा फिर हुआ। अब पंजाब को राजस्थान को भी 15.2 मिलियन एकड़ फीट जल देना पड़ा। पंजाब के पास अब केवल 7.2 मिलियन एकड़ फीट जल बचा। लेकिन इसके बाद पंजाब फिर बंटा। हिमाचल और बड़ा बना, जबकि हरियाणा नया राज्य बना। पंजाब को दो नए ‘विकास मंदिर’ मिले। एक तो भाखड़ा नांगल बांध, और दूसरा, चंडीगढ़। लेकिन केंद्र ने इन्हें अपने ही अधिकार में रखा। साथ ही रोपड़ और फीरोजपुर हेडवर्क्स पर अपनी निगाह गड़ाए रखी। जब राजीव-लोंगोवाल समझौता 1985 में हुआ तो उस समझौते के तहत जल के बंटवारे की नई जुगत बनी कि पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के इलाकों को जल मिलेगा। इसे सतलज यमुना लिंक नहर कहा गया।
आज पानी का मुद््दा इतना संवेदनशील है कि अगर इसी पर गोलबंदी होती रहे, तो यह गुजरात और हरियाणा में छिडेÞ आरक्षण के रण से भी ज्यादा जोर पकड़ सकता है। पंजाब की आपत्ति राजस्थान को जल देने पर ज्यादा है। गैर-पड़ोसी राज्यों को जल देना और कठिन हो रहा है जब राज्य में ही संकट हो। और अब तो दिल्ली की आप सरकार भी जल संकट से राहत के बतौर हरियाणा से जल की गुजारिश कर रही है। पंजाब में बादल ने लिंक नहर के मामले को उठा कर अपने विरोधी कैप्टन अमरिंदर सिंह को पटखनी दे दी है, जो खुद को पंजाब के किसानों का मसीहा समझ रहे थे क्योंकि उन्होंने ही मुख्यमंत्री होते हुए 2004 का विधेयक (पंजाब टर्मिनेशन आॅफ एग्रीमेंट्स एक्ट) विधानसभा में पास कराया था।
पंजाब के हितों के लिए लंबी लड़ाई लड़ने की बात बादल ने कही है। बदली हुई परिस्थितियों में पंजाब कांग्रेस बदहवास-सी है। हरियाणा कांग्रेस ने तो दोनों राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है। पंजाब कांगे्रस को लगता है जैसे बरसों से उसका अपना एक अहम मुद््दा अचानक छिन गया है। उधर पंजाब की राजनीति में नई प्रतिद्वंद्वी बन कर उभरी आम आदमी पार्टी के नेता भगवंत सिंह मान का कहना है कि अकाली और कांग्रेसी पंजाब की जनता को बेवकूफ बना रहे हैं। बहरहाल, इस विवाद में संघीय ढांचे से लेकर अंतरराज्यीय जल बंटवारे के फार्मूलों और सिद्धांतों तक बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है।

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