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राजनीतिः कोख के कारोबार की कड़ियां

यह स्वागत-योग्य है कि केंद्र सरकार ने किराए की कोख के व्यावसायिक इस्तेमाल पर प्रतिबंध की पहल तेज करते हुए सरोगेसी (नियमन) विधेयक को संसद में पेश करने की मंजूरी दे दी है।

Author August 25, 2016 11:27 PM
केंद्र सरकार ने किराए की कोख के व्यावसायिक इस्तेमाल पर प्रतिबंध की पहल तेज करते हुए सरोगेसी (नियमन) विधेयक को संसद में पेश करने की मंजूरी दे दी है।

देश में कोख खरीदने के बढ़ते व्यापार पर नकेल कसने की अब तक की यह सबसे अहम कोशिश है, जिसकी जरूरत काफी पहले से महसूस की जा रही थी। इस कानून के जरिए सरकार की मंशा देश में सरोगेसी का नियमन करने के लिए एक ऐसा ढांचा तैयार करने की है जिससे कि सरोगेसी किसी तरह का कारोबार न बन सके। 

यह स्वागत-योग्य है कि केंद्र सरकार ने किराए की कोख के व्यावसायिक इस्तेमाल पर प्रतिबंध की पहल तेज करते हुए सरोगेसी (नियमन) विधेयक को संसद में पेश करने की मंजूरी दे दी है। इस पहल से सरोगेसी यानी किराए की कोख का अनैतिक व्यापार बंद होगा और पैसों का लालच देकर गरीब महिलाओं की कोख खरीदने की मौजूदा शोषणकारी प्रवृत्ति पर लगाम लगेगी। इस विधेयक में किराए की कोख वाली मां के अधिकारों की रक्षा के उपाए किए गए हैं और इस तरह के बच्चों के अभिभावकों को कानूनी मान्यता देने का प्रावधान है। इस विधेयक में सरकार ने महिलाओं विशेषकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों की महिलाओं का शोषण रोकने के मकसद से विदेशियों के लिए देश में किराए की कोख की सेवाएं लेने पर प्रतिबंध का प्रावधान किया है। गौरतलब है कि मंत्रियों के एक समूह ने हाल ही में इस विधेयक को मंजूरी दी थी तथा इसे अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के पास भेजा था।

गौर करें तो देश में कोख खरीदने के बढ़ते व्यापार पर नकेल कसने की अब तक की यह सबसे अहम कोशिश है, जिसकी जरूरत काफी पहले से महसूस की जा रही थी। इस कानून के जरिए सरकार की मंशा देश में सरोगेसी का नियमन करने के लिए एक ऐसा ढांचा तैयार करने की है जिससे कि सरोगेसी किसी तरह का कारोबार न बन सके। निस्संदेह ऐसे दंपतियों के लिए सरोगेसी की इजाजत बनी रहेगी जो संतान को जन्म देने में सक्षम न हों। यह तथ्य है कि देश में तकरीबन अठारह फीसद महिलाएं बांझपन की शिकार हैं और संतान को जन्म देने में सक्षम नहीं हैं। लेकिन मौजूदा दौर में जिस तरह सरोगेसी अनैतिक कमाई के धंधे में तब्दील हो रहा है, ऐसे में सरोगेसी का नियमन करने वाला कानून बनाना जरूरी हो गया है। इसके लिए सरकार ने सरोगेसी (नियमन) विधेयक में कुछ प्रावधान किए हैं, जिनके मुताबिक अब गैर-विवाहित जोड़े, एकल अभिभावक, और समलैंगिक को सरोगेसी इस्तेमाल की इजाजत नहीं होगी। फिर, सिर्फ भारतीय दंपति को सरोगेसी के जरिए बच्चा प्राप्त करने का अधिकार होगा। लेकिन इसके साथ शर्त यह भी है कि सरोगेसी का अधिकार विवाह के पांच साल बाद ही हासिल होगा, वह भी तब जब डॉक्टर द्वारा प्रमाणित होगा कि दंपति संतान को जन्म देने में सक्षम नहीं हैं। अगर किसी दंपति के पास पहले से बच्चा है तो वह फिर सरोगेसी के जरिए बच्चा प्राप्त नहीं कर सकेगा।

यह किसी से छिपा नहीं है कि सरोगेसी कुछ हस्तियों के लिए एक शौक बन चुका है जो संतान होने के बाद भी सरोगेसी के जरिए संतान प्राप्त करने को इच्छुक हैं। सिर्फ इसलिए कि उनकी पत्नियां गर्भधारण करना नहीं चाहतीं। एक किस्म से इन हस्तियों ने सरोगेसी के जरिए संतान प्राप्त कर समाज में इस प्रवृत्ति को बढ़ावा देने का काम किया है। उदाहरण के तौर पर, अभिनेता आमिर खान और उनकी निर्देशक पत्नी किरण राव को सरोगेसी के जरिए संतान-सुख प्राप्त हुआ है। जबकि इस अभिनेता की पूर्व पत्नी से एक बेटी और एक बेटा पहले से है। मशहूर अभिनेता शाहरुख खान ने भी सरोगेसी के जरिए संतान प्राप्त किया है जबकि उनके पास भी संतान पहले से है। लिहाजा, विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने ठीक ही कहा है कि जो चीज जरूरत के नाम पर शुरू की गई थी वह अब शौक बन गई है।

निस्संदेह ऐसे उदाहरण समाज के लिए अनुकरणीय नहीं हो सकते। ऐसे में यह उचित ही है कि सरकार ने ऐसे शौक और अनैतिक व्यापार को रोकने के लिए विधेयक में कुछ कड़े प्रावधान किए हैं। मसलन, अब परिवार या नजदीक की रिश्तेदार महिला ही सरोगेट मदर बन सकती है। अगर सरोगेट बच्चा नि:शक्त, मंदबुद्धि या लड़की है तो भी उसे स्वीकार करना होगा। इसके अलावा, अगर कोई महिला अपनी कोख सरोगेसी के लिए देना चाहती है तो उसे सिर्फ एक बार इसका अवसर मिलेगा। प्रावधानों के मुताबिक सरोगेट बच्चे को किसी भी जैविक (बॉयोलाजिकल) या गोद लिए हुए बच्चे की तरह संपत्ति पर बराबर का अधिकार होगा।

विधेयक के मुताबिक इन प्रावधानों के उल्लंघन पर दस लाख रुपए का जुर्माना और दस साल की कड़ी सजा मुकर्रर की गई है। यह कानून प्रभावी बन सके इसके लिए सरकार ने एक नेशनल सरोगेसी बोर्ड के गठन का फैसला किया है जिसके जरिए वह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के बीच तालमेल कर सकेगी। गौर करें तो किराए की कोख के अनैतिक कारोबार पर लगाम लगाना इसलिए भी आवश्यक है कि भारत सरोगेसी के अनैतिक केंद्र के रूप में स्थापित होता जा रहा था। पिछले एक दशक में कई विदेशी और कई समृद्ध भारतीय नागरिकों संतान पैदा करने में सक्षम होने के बावजूद सरोगेसी के जरिए बच्चा प्राप्त किया है। यह नैतिक दृष्टि से उचित नहीं है। आज आलम यह है कि भारत में सरोगेसी का बाजार तिरसठ अरब रुपए के पार पहुंच चुका है। हर वर्ष विदेशों से आए दंपतियों के दो हजार बच्चे यहां होते हैं और तकरीबन तीन हजार से अधिक क्लीनिक इस काम में लगे हुए हैं। आज की तारीख में दुग्ध उद्योग की राजधानी के रूप में मशहूर गुजरात का आणंद शहर सरोगेसी का सबसे बड़ा हब बन चुका है। यहां तकरीबन दो सौ फर्टिलिटी सेंटर हैं जो सरोगेसी सेवाएं दे रहे हैं। देश के अन्य हिस्सों में भी फर्टिलिटी सेंटर तेजी से खुल रहे हैं। इसका सीधा मतलब यह निकलता है कि सरोगेसी कमाई का बहुत बड़ा जरिया बन चुका है।

एक अध्ययन के मुताबिक सरोगेसी के मामले दुनिया में सर्वाधिक भारत में ही होते हैं। यदि पूरी दुनिया में एक हजार सरोगेसी के मामले होते हैं तो उनमें छह सौ भारत में होते हैं। गौर करें तो विदेशियों में सबसे ज्यादा अमेरिका, ब्रिटेन, कोरिया, जकार्ता मध्य पूर्व और यूरोपीय देशों के दंपति सरोगेसी के लिए भारत आते हैं। उसका प्रमुख कारण यह है कि यूरोप के अधिकतर देशों में सरोगेसी गैर-कानूनी है। उदाहरण के तौर पर, जर्मनी में सख्ती का आलम यह है कि वह अपने नागरिकों को भारत का वीजा लेने से पहले ताकीद करता है कि अगर वे भारत इसलिए जा रहे हैं कि किराए की कोख से बच्चा लाएंगे तो याद रखें कि जर्मनी में सरोगेसी पर रोक है। विदेशियों का भारत की ओर रुझान इसलिए है कि दुनिया के अन्य देशों की अपेक्षा यहां सरोगेसी से बच्चा प्राप्त करना सस्ता व सुरक्षित है। 2007 की आइसीएसआइ की रिपोर्ट बताती है कि ब्रिटेन में सरोगेसी के लिए किसी महिला को चार लाख रुपए देना पड़ता है, वहीं भारत में महज साठ हजार रुपए में महिलाएं किराए पर कोख उपलब्ध करा देती हैं। इसी तरह अमेरिका और आस्ट्रेलिया में सरोगेसी के माध्यम से संतान प्राप्त करने का खर्च तकरीबन पचास से साठ लाख रुपए बैठता है।

दूसरी ओर विदेशी भारत की ओर इसलिए भी आकर्षित होते हैं कि यहां की अधिकतर महिलाएं नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करतीं और शाकाहारी होती हैं, लिहाजा उनके गर्भ में पलने वाला बच्चा स्वस्थ व सुरक्षित होता है। उल्लेखनीय है कि सरोगेसी की प्रक्रिया के तहत बच्चा पैदा करने में असमर्थ महिलाओं के अंडाणु का उनके पति के शुक्राणु से निषेचन कराने के बाद भ्रूण को सरोगेसी के लिए तैयार महिला केगर्भ में प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। अंडाणु और शुक्राणु दाता सरोगेट मदर से पैदा होने वाले बच्चे के जैविक माता-पिता होते हैं, जबकि सरोगेट मदर उस बच्चे की अजैविक मां होती है जिसका उस बच्चे पर कानूनन कोई अधिकार नहीं होता। भारत में गरीबी अधिक है इसलिए कुछ महिलाएं पैसों के लिए अपनी कोख किराए पर देने को तैयार हो जाती हैं।

आमतौर पर फर्टिलिटी सेंटर सरोगेट के लिए अठारह से पैंतीस साल की गरीब महिलाओं को तैयार करते हैं। यह गौरतलब कि फर्टिलिटी सेंटर बच्चा चाहने वाले दंपति से लाखों रुपए ऐंठते हैं लेकिन उस रकम का दसवां हिस्सा भी कोख बेचने वाली मां को नहीं देते हैं। लिहाजा एक किस्म से उनका शोषण होता है। कई बार तो ऐसी विकट स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं कि मामला अदालत तक पहुंच जाता है। मसलन, कभी-कभी सरोगेट मां भावनात्मक लगाव के कारण बच्चे को देने से इनकार कर देती है। कई बार ऐसा भी होता है कि जन्म लेने वाली संतान विकलांग होती है या अन्य किसी बीमारी से ग्रस्त होती है, तब इच्छुक दंपति उसे लेने से इनकार कर देते हैं। ऐसे में बच्चे के पालन-पोषण का बोझ सरोगेट मदर के ऊपर आ जाता है। ऐसी स्थिति पैदा न हो इसके लिए सरकार ने किराए की कोख के व्यावसायिक इस्तेमाल के विरुद्ध कड़ी शर्तें तय कर एक तरह से मानवीय पहल की है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए।

प्रस्तावित विधेयक के मुताबिक दस साल की कैद और दस लाख रुपए जुर्माना लगेगा, अगर सरोगेसी से पैदा बच्चे को कोई दंपति अपनाने से इनकार करेगा या प्रावधानों का उल्लंघन करेगा। गौर करें तो भारत में अभी तक सरोगेसी के अनैतिक दुरुपयोग को रोकने के लिए कोई कड़ा कानून नहीं था। लेकिन यह कानून लागू होने के बाद भारत अब फ्रांस, नीदरलैंड और नार्वे जैसे देशों की कतार में शुमार हो जाएगा जहां पहले से व्यावसायिक सरोगेसी की इजाजत नहीं है।

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