ताज़ा खबर
 

राजनीतिः खेलों में यौन उत्पीड़न का दंश

यौन शोषण की तमाम शिकायतों के बीच साई ने यह स्वीकार किया है कि यौन उत्पीड़न के इस तरह के मामलों में दोषियों को कड़ी सजा दिए जाने की जरूरत है। लेकिन यह स्वीकारोक्ति तब तक कोई मायने नहीं रखती, जब तक इस दिशा में कठोर कदम नहीं उठाए जाते।

Author Updated: February 12, 2020 2:20 AM
यौन शोषण की तमाम शिकायतों के बीच साई ने यह स्वीकार किया है कि यौन उत्पीड़न के इस तरह के मामलों में दोषियों को कड़ी सजा दिए जाने की जरूरत है। लेकिन यह स्वीकारोक्ति तब तक कोई मायने नहीं रखती, जब तक इस दिशा में कठोर कदम नहीं उठाए जाते।

ऋतु सारस्वत

बीते एक दशक में भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) की अलग-अलग इकाइयों में यौन उत्पीड़न के कम से कम पैंतालीस मामले सामने आ चुके हैं। यह खुलासा एक आरटीआइ और आधिकारिक रिपोर्ट से हुआ। खेल प्राधिकरण के केंद्रों पर दर्ज मामलों में छेड़छाड़ से लेकर शारीरिक शोषण जैसे मामले तक शामिल हैं। अधिकतर मामलों में आरोपियों को जहां बरी कर दिया गया, तो कई अन्य लोगों के खिलाफ पूछताछ सालों से चली आ रही है। पिछले साल फरवरी में महिला सशक्तिकरण पर एक संसदीय समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि ऐसे मामलों की संख्या ज्यादा भी हो सकती है, क्योंकि कई बार कोचों के खिलाफ मामले दर्ज ही नहीं होते हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘समिति को यह दुर्भाग्यपूर्ण लगता है कि संरक्षक और मार्गदर्शक खुद शिकारी बन जा रहा है।’ संसदीय समिति का यह मानना कि कई बार कोचों के खिलाफ मामले दर्ज ही नहीं होते हैं, बहुत ही गंभीर बात है।

यह सत्य है कि खेल जगत से लेकर कार्यस्थलों तक महिलाएं अपने विरुद्ध हो रहे शारीरिक और मानसिक शोषण को लेकर मुखर नहीं है और इसका कोई एक कारण नहीं है। बात चाहे महिला खिलाड़ी की हो या अन्य कामकाजी महिलाओं की, अपने सपनों को पूरा करने, आर्थिक रूप से सुदृढ़ होने और परिवार की आर्थिक रूप से सहायता करने से कहीं अधिक उनके कंधों पर परिवार के तथाकथित मान का बोझ इस कदर डाल दिया जाता है कि छद्म मान के आगे उन्हें अपनी शारीरिक और मानसिक पीड़ा को तिलांजलि देनी पड़ती है। अलबत्ता तो महिलाएं अपने साथ हो रहे किसी भी प्रकार के दुर्व्यवहार की शिकायत करती ही नहीं हैं और अगर ऐसा करने का साहस वे जुटा लेती हैं, तो उन्हें स्वयं एक ऐसे कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है, जहां उनसे उनका परिवार और समाज यहां तक कि साथ काम करने वाले साथी पूछते हैं कि ‘तुम्हारे साथ ही क्यों और भी तो लड़कियां हैं।’ इस क्यों के साथ चरित्र आकलन के इतने अनसुलझे सवाल जुड़ जाते हैं कि पीड़िताएं अपना आत्मविश्वास खो बैठती हैं।

भारत ही नहीं विश्व भर में पितृसत्तात्मक व्यवस्था की जड़ें बहुत गहरी हैं और यहां मानव होने का वास्तविक अधिकार सिर्फ पुरुषों को ही हासिल है। महिलाएं देह से ऊपर कुछ भी नहीं हैं। और जब बात खेलों की हो, तो यहां स्थितियां और भी गंभीर हैं। इस संदर्भ में मार्च 2013 से जनवरी 2015 तक साई महानिदेशक रहे थॉमसन का कथन उल्लेखनीय है। वे कहते हैं- ‘ज्यादातर लड़कियां गरीब पृष्ठभूमि से आती हैं इसलिए उन्हें अपना बयान बदलने या अपनी शिकायत वापस लेने के लिए राजी किया जाता है या दवाब बनाया जाता है।

लड़कियां देखती हैं कि खेल में उनका भविष्य कोचों के हाथों में है जो कई लोगों के लिए गरीबी से बाहर आने का रास्ता होता है, इसलिए वे अक्सर हार मान लेती है।’ यों तो घर की चारदीवारी से बाहर निकल कर किसी भी क्षेत्र में अपनी जगह बनाना महिलाओं के लिए सहज नहीं है, परंतु खेलों को चूंकि पुरुषों का ‘वर्चस्व क्षेत्र’ समझा जाता रहा है, ऐसे में महिलाओं का खेल के मैदान में अपनी जगह बनाना आज भी पुरुष सत्तात्मक व्यवस्था को खलता है। परिवार और समाज का निरंतर दवाब एक महिला खिलाड़ी को समय-समय पर आघात पहुंचाता है।

जनवरी, 2014 में हरियाणा के हिसार स्थित साई के प्रशिक्षण केंद्र में पांच लड़कियों ने अपने कोच पर छेड़छाड़ के आरोप लगाने और मुकदमा दायर करने के बाद पंचायत के दवाब के चलते मामला वापस ले लिया था। मामला वापस लेने की घटना इस तथ्य की पुष्टि करती है कि बच्च्यिों के आत्मसम्मान की रक्षा का समाज का सिर्फ ढोंग भर है। यह सिर्फ हिसार में ही हुआ हो, ऐसा नहीं है। पूरी सामाजिक व्यवस्था, जिसका अभिन्न हिस्सा भाग ‘खेल की दुनिया’ भी है, ऐसी है जहां महिलाओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वे छेड़छाड़, भद्दे मजाक और अमर्यादित व्यवहार को कार्य-संस्कृति का हिस्सा मान कर स्वीकार करें।

यौन शोषण की तमाम शिकायतों के बीच साई ने यह स्वीकार किया है कि यौन उत्पीड़न के इस तरह के मामलों में दोषियों को कड़ी सजा दिए जाने की जरूरत है। लेकिन यह स्वीकारोक्ति तब तक कोई मायने नहीं रखती, जब तक इस दिशा में कठोर कदम नहीं उठाए जाते। यौन उत्पीड़न मामलों को देखने वाली समिति ने एक मामले में तीस साल बाद कोच को दोषी पाया था, तब तक वह सेवानिवृत्त हो चुका था। केंद्रीय प्रशासनिक पंचाट की चंडीगढ़ बेंच द्वारा पारित एक आदेश के अनुसार कोच पर 1981 से दुर्व्यवहार के कई आरोप लग चुके थे। जबकि, सजा के रूप में उसकी एक साल की पेंशन से दस फीसद हिस्सा काटा गया था। इस तरह की मामूली सजा से अपराधियों का मनोबल ही बढ़ता है।

यह चिंताजनक ही है कि यौन शोषण की शिकार महिला खिलाड़ी न केवल अपना आत्मविश्वास खो देती है, अपितु अवसाद और पीड़ा के चलते खेल का मैदान भी छोड़ देती है। कोच और अधिकारियों के दुर्व्यवहार के प्रति बरती जाने वाली लापरवाही, महिलाओं को खामोशी से अत्याचार सहने के लिए विवश करती है, जो किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं होनी चाहिए। महिला खिलाड़ियों के प्रति बरती जाने वाली निष्ठुरता सिर्फ भारत में ही नहीं, विश्वभर में कायम है।

समस्या खेल के मैदान के भीतर तक ही नहीं है। यह इससे भी ज्यादा बड़ी और डरावनी है। खेल के मैदान का संघर्ष जितना पीड़ादायक है, उतना ही वह सामाजिक दृष्टिकोण भी कष्टदायक जो महिला खिलाड़ियों के खेल से ज्यादा उनके व्यक्तिगत जीवन, पहनावे और जीवनचर्या में दिलचस्पी लेता है। तीन दिसंबर, 2018 को नार्वे की व्यावसायिक फुटबॉलर एडा हेगरबर्ग को तेईस साल की उम्र में फुटबॉल का सबसे प्रतिष्ठित ‘बेलन डिओर’ पुरस्कार मिला। इस ऐतिहासिक क्षण में जब हेगरबर्ग ने अपना प्रेरक भाषण खत्म किया तो इस समारोह का संचालन कर रहे मार्टिन सॉलवेज ने अपने कैरियर में तीन सौ गोल दागने वाली खिलाड़ी से पूछा कि क्या आप ट्वर्क (एक तरह का भड़काऊ नृत्य) करना जानती है? हेगरबर्ग ‘ना’ कह कर मंच से उतर गईं।

परंतु यह सवाल हमेशा बना रहेगा कि क्यों पुरुष स्त्री को एक देह से अधिक कुछ नहीं समझते? फुटबॉल के मैदान में जब एक पुरुष खिलाड़ी पूरी ताकत लगाकर किक लगाता है, तो लोग उस पर तालियां बजाते हैं, लेकिन वही जोश एक महिला खेल में दिखाती है तो लोग उसमें खेल नहीं अश्लीलता खोजते हैं। हैरिस टायला आस्ट्रेलिया फुटबॉल लीग की खिलाड़ी हैं। खेल के दौरान हैरिस ने पूरी जान लगा कर अपना पहला गोल किया। इस प्रभावशाली गोल के समय टायला का एक पांव हवा में था। इसी तस्वीर को एक न्यूज चैनल ने सोशल मीडिया पर डाल दिया। लेकिन बजाय खिलाड़ी के खेल के प्रति जुनून देखने के, लोगों ने अश्लील टिप्पणियों की ऐसी झड़ी लगा दी कि इस खिलाड़ी के हौसले टूट गए।

यह स्वीकार्य है कि समाज के दृष्टिकोण को एकदम से नहीं बदला जा सकता। परंतु यह जरूरी है कि भारतीय खेल प्राधिकरण २अपनी खिलाड़ियों की सुरक्षा के लिए त्वरित रूप से कठोर कदम उठाए। कोच और अधिकारियों को शक्तिशाली बनाने के बजाय एक ऐसी पारदर्शी व्यवस्था की स्थापना हो, जहां महिला खिलाड़ी अपने भविष्य के डर से, किसी भी प्रकार के शोषण का शिकार न हो। देश को सम्मान दिलाने वाली महिला खिलाड़ियों के सम्मान की रक्षा करने का प्रथम दायित्व सरकार और प्रशासन का है।

Next Stories
1 राजनीतिः बजट और गांव की जेब
2 राजनीति: राममंदिर ट्रस्ट की स्वीकार्यता और अंदेशे
3 राजनीति: मौत के वायरस और सवाल
ये पढ़ा क्या?
X