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बेबाक बोलः जन की बात- राहुल राग

अभी राजस्थान से लेकर पंजाब और त्रिपुरा से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालयों के युवा गढ़ों की दीवारों पर लिखी नई इबारत का विश्लेषण हो ही रहा था, तभी कांग्रेसियों से ज्यादा भाजपा नेताओं की जुबान से राहुल-राहुल निकलने लगा।

राहुल गांधी

अमेरिका की धरती पर राहुल की वंशवाद पर की गई टिप्पणी पर भाजपा के बड़े से लेकर छोटे नेता लगातार बयानबाजी कर रहे हैं तो राहुल के बयानों पर बात करने की जरूरत समझी जा सकती है। राजनीति में सपने दिखाने के साथ सच का सामना की भी अहमियत होती है। अहंकार और रोजगार पर राहुल जिस कांग्रेसी नाकामी की स्वीकारोक्ति की भाषा बोल रहे हैं वह उन्हें एक नए अवतार में ला रही है। अमेरिकी शैक्षणिक संस्थान में वे अच्छे वक्ता के साथ अच्छे श्रोता की भी जरूरत बताते हैं। मोदी के न्यू इंडिया के सामने रोजगार विहीन भारत को खड़ा कर रहे हैं। विखंडित विकल्प के इस दौर में राहुल महसूस कर चुके हैं कि उन्हें खुद का ही विकल्प बनना होगा। सीखते, समझते और स्वीकारोक्ति करते राहुल इस बार तो मन की बात के सामने जन की बात को खड़ा करने में कामयाब दिखे। अमेरिकी विश्वविद्यालयों से उठे राहुल राग पर बेबाक बोल।

अभी राजस्थान से लेकर पंजाब और त्रिपुरा से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालयों के युवा गढ़ों की दीवारों पर लिखी नई इबारत का विश्लेषण हो ही रहा था, तभी कांग्रेसियों से ज्यादा भाजपा नेताओं की जुबान से राहुल-राहुल निकलने लगा। आखिर सूचना व प्रसारण मंत्रालय की मुखिया के साथ सरकार के पूरे प्रवक्ताओं की फौज राहुल पर हल्ला क्यों बोल गई? भाजपाई खेमे के हल्लाबोल का हासिल यह रहा कि जिन लोगों ने राहुल गांधी का भाषण नहीं सुना था, वे भी यू-ट्यूब पर राहुल गांधी, बर्कले खोजने लगे।

अभी बर्कले के भाषण को भाजपा और संघ का खेमा ‘युवराज, शहजादा’ की बकबक साबित करने में जुटा ही था कि अमेरिका के ही प्रिंस्टन विश्वविद्यालय में राहुल फिर बोले। और जरा उनके भाषण के विश्लेषण पर गौर फरमाया जाए। अपने भाषण में गांधी ने कुल 44 बार ‘नौकरी, इसका विकास और बेरोजगारी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। महज तीन ही साल में अमेरिका की जमीन और मीडिया के विश्लेषण से यह दूसरा पाठ सामने आ गया। इधर तो सिर्फ प्रधानमंत्री के भाषणों की चीड़फाड़ होती थी कि उन्होंने अपने भाषण में ‘न्यू इंडिया’ और ‘टीम इंडिया’ शब्द का कितनी बार इस्तेमाल किया। मेडिसन स्कवायर वाला इंडिया और प्रिंस्टन में बिना नौकरी वाला इंडिया। इस दो तरह के इंडिया की टकराहट में जरा भारत का भी विश्लेषण हो जाए।

बर्कले के भाषण के बाद इन दिनों भाजपा के नए सहयोगी बने और मोदी सरकार के हर कदम की जमकर तारीफ करनेवाले नेता ने अति उत्साह में कह डाला कि भारत में वंशवाद की संस्कृति नहीं रही है (मतलब कांग्रेस की देन है)। अब इन नए चीयरलीडर्स को कौन समझाए कि चंद्रगुप्त वंश, मौर्य वंश और लोदी वंश किसी अफ्रीकी नहीं बल्कि भारतीय इतिहास का हिस्सा रहे हैं। वंशवाद हमारे प्राचीन से लेकर मध्ययुगीन समाज का मूल रहा रहा है जिसके खिलाफ आधुनिक समय में आवाज उठी है। वह आधुनिक लोकतांत्रिक अवधारणा ही है जो इंसान के वंश नहीं उसकी काबिलियत की बात करती है। राहुल गांधी ने कम से कम ईमानदारी तो दिखाई और उसे विदेशी जमीन पर कबूला। साथ ही वंश के बजाए काबिलियत को आगे बढ़ाने की हिमायत की। लेकिन आप उस ईमानदारी पर चुप रहने के बजाए अपने बनाए नए भ्रम पर शोर मचाने लगे।

प्रिंस्टन में राहुल के भाषण के बाद भाजपा के महासचिव राम माधव ने कहा कि राहुल रणक्षेत्र छोड़ कर भाग गए हैं और कांग्रेस के प्रचार के लिए दुनिया भर की यात्रा कर रहे हैं। माधव ने कहा कि उन्हें विदेशों में कांग्रेस का प्रचार करने दीजिए, हम भारत में राजनीति करेंगे। लेकिन राहुल पर इस हमले के पहले भाजपा गुजरे तीन सालों का वह समय भूल गई जब उनकी पार्टी के नेता और भारत के प्रधानमंत्री विदेशी जमीन पर भारत के उस विपक्ष पर तंज कसते थे, जो चुनाव हार गया। तब शायद भाजपा यह भूल गई थी कि लोकतांत्रिक अवधारणा में महज 31 फीसद वोट पाने के बाद भी वे सौ फीसद भारतीयों के प्रधानमंत्री हैं। लेकिन विदेशी जमीन से लेकर उत्तर प्रदेश में दिए भाषणों तक अक्सर वे महज 31 फीसद लोगों को ही संबोधित करते सुने जाते थे।
वैसे, अमेरिका की धरती पर दिए भाषणों की भारतीय राज और समाज में अपनी अहमियत रही है। स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो में हुए धर्म संसद में जो ‘मेरे अमेरिकी भाइयो और बहनो’ कहा था, उसकी अनुगूंज इतिहास के पन्नों में आज तक है। विवेकानंद ने कहा था, ‘मुझे गर्व है कि मैं उस देश से हूं, जिसने सभी धर्मों और सभी देशों के सताए गए लोगों को अपने यहां शरण दी’। अमेरिकी शहरों में मोदी के भाषण और भीड़ को भाजपा खेमे ने कितना भुनाया – वह इतिहास में दर्ज हो चुका है। और, आज उसी अमेरिका की धरती पर राहुल गांधी मोदी के ‘न्यू इंडिया’ को चुनौती दे रहे हैं।

बर्कले से लेकर प्रिंस्टन। राहुल के भाषण देते ही सोशल मीडिया पर पोगो, पप्पू, नानी घर और अभिनेत्री आलिया भट्ट के साथ गढ़ी गई उनकी बचकानी बातचीत वायरल हो जाती हैं। एक खास खेमा राहुल के बोलने और ज्ञान को लेकर हमलावर हो उठता है। लेकिन पिछले दो बार से सोशल मीडिया पर ही इसका प्रतिरोध भी खड़ा हुआ है। यह विडंबना रही है कि हमारे पिछले प्रधानमंत्री मौन और वर्तमान प्रधानमंत्री मुखर रहने के लिए जाने जाते हैं। पिछले लोकसभा चुनावों के बाद से ही बोलने की कला को नेताओं का सबसे बड़ा गुण बताया जाने लगा, जिसमें मोदी को सबसे आगे तो राहुल गांधी को सबसे पीछे खड़ा कर दिया गया था। लेकिन जनता ने पिछले तीन साल में यह भी समझ लिया कि सरकार बोलने से नहीं, उस पार्टी की विचारधारा और नीतियों से चलती है जो सत्ता में है। पिछले तीन सालों में भारतीय राजनीति को वाद-विवाद का जैसा मंच बना दिया गया था उसके खिलाफ भी यह नया पाठ तैयार होना सुखद ही कहा जा सकता है।

राहुल ने प्रिंस्टन में कहा कि जो लोग बाजार में एक दिन में 30 हजार नौकरियां पैदा करने में नाकाम रहने के लिए हमसे नाराज थे, वही लोग अब मोदी से भी नाराज होने वाले हैं। मुख्य प्रश्न इस समस्या को सुलझाना है। नवउदारवाद की नाकामी के दौर में बहस का दो चेहरा बनाया गया। बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार के बरक्स मोदी का चेहरा तैयार किया गया था। और वहीं, मोदी को खारिज करने के चक्कर में उदारवादी विचारकों ने उनके हाथ मजबूत कर दिए। और संघ से जुड़े सभी संगठन इकट्ठा होकर इस बहस को मोदी के पक्ष में ले जाने में कामयाब भी हुए। चाहे वह अखलाक का मामला हो, पहलू खान का या फिर गोरक्षकों का। लगातार कोशिश हो रही थी कि बहस इसी दिशा में जारी रहे। संघ की भी यही कोशिश रही कि कांग्रेस भी उसी उदारवादी एजंडे में ही बंधी रहे। जो विकल्प की बात हुई चाहे लालू यादव, नीतीश कुमार हों या गुजरात का राज्यसभा चुनाव उसमें भ्रष्टाचार के आधार पर ही मुकाबला किया गया। इस उदारवादी बहस में कांग्रेस की छवि नकारात्मक ही बनी और संघ व भाजपा को भी कोई खतरा नहीं महसूस हुआ। सांप्रदायिक बनाम उदारवादी बहस में कांग्रेस का एजंडा फेल हो गया। यहां तक तो सब भाजपा के ही अनुकूल था। बहस की दिशा बदलने में मददगार हुई नोटबंदी, जिसे भाजपा पूरी मोर्चेबंदी के बाद भी खारिज नहीं कर पाई।

नोटबंदी और जीएसटी के बाद के आए नतीजों ने बहस का जो नया केंद्र दिया है राहुल के भाषण को उसी के संदर्भ में समझा जाना चाहिए। महाराष्टÑ से लेकर मध्य प्रदेश तक चले किसानों के आंदोलन ने सवाल उठाए। और जिस सूचना क्रांति के बल पर भारत के युवा बड़े सपने देख रहे थे उसी क्षेत्र में नौकरियों की भारी कटौती से मध्यवर्गीय तबका परेशान हुआ है। जीएसटी के परिणामों का व्यापारियों में असंतोष है। शिक्षा से लेकर रोजगार तक के सवाल बेचैनी से उछल रहे हैं। पेट्रोल की कीमतों से सबसिडी हटाकर उससे मुनाफा कमाने की दिशा हो या शिक्षा के क्षेत्र में जीएसटी लगा उसे भी मुनाफे की राह पर धकेलना। और, इस समय राहुल गांधी उन 30,000 नौकरियों के बारे में सवाल करते हैं जो हर दिन दी ही जानी चाहिए।

विदेशी जमीन से आई राहुल की यह भाषा नवउदारवाद समर्थक कांग्रेस की भाषा से अलग है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इसलिए गई कि रोजगार नहीं दे पा रही थी और मोदी-ट्रंप की सरकार इसलिए बनी कि लोगों को लगा था कि ये रोजगार देंगे। राजनीति की भाषा में स्वीकारोक्ति (रियलाइजेशन) की भी अपनी अहमियत है। फिलहाल राहुल की भाषा का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि वे अतीत की खामियों को स्वीकार कर कांग्रेस को ही कांग्रेस का विकल्प बनाने की बात कर रहे हैं। उनकी भाषा में जमीन से दूर रहे राहुल का विकल्प सीखते और स्वीकारते हुए राहुल को ही बना रहे हैं। रोजगार से लेकर अहंकार तक में कांग्रेस की भूमिका को रेखांकित कर रहे हैं। पिछली सरकारों की गलतियों से सबक लेकर अपने मन की नहीं जनता के मन की बात कही है। वे जनता के मन को खारिज नहीं उसे छूने की कोशिश कर रहे हैं। यह सही है कि एक-दो भाषणों से राजनीति की दशा और दिशा नहीं बदलती। मंच का मजमा जल्दी ही उठ जाता है। देखना है कि रोजगार और अहंकार के इस विमर्श को वे 2019 की जमीन पर ला पाते हैं या नहीं।

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