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राजनीतिः बट्टे खाते का मर्ज

भारतीय बैंकों के लिए वित्तवर्ष 2016-17 बहुत अभागा रहा। मार्च 2016 से शुरू हुआ ‘बैड लोन’ का सिलसिला अब तक जारी है।

संसद में मसविदा पारित होने के बाद यह होल्डिंग कंपनी अस्तित्व में आएगी।

चंद बड़े कर्जों के कारण आज अधिकतर सार्वजनिक बैंक लहूलुहान हैं। पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक बैंक लगभग चार लाख करोड़ रुपए के बड़े कर्ज बट्टे-खाते में डाल चुके हैं। संसद की लोक लेखा समिति के अनुसार, सार्वजनिक बैंकों के एनपीए में सत्तर प्रतिशत हिस्सा कॉरपोरेट का है, जबकि किसानों की हिस्सेदारी केवल एक फीसद है। खतरे की
घंटी बज चुकी है।

भारतीय बैंकों के लिए वित्तवर्ष 2016-17 बहुत अभागा रहा। मार्च 2016 से शुरू हुआ ‘बैड लोन’ का सिलसिला अब तक जारी है। चिंता की बात यह है कि विगत चौबीस माह में नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) बढ़ कर दो गुना से भी ज्यादा हो चुका है। बीते दिसंबर माह की समाप्ति पर देश के तैंतालीस बैंकों का एनपीए 7.33 लाख करोड़ रुपए था, जिसमें निजी बैंकों के मुकाबले सार्वजनिक बैंकों की हिस्सेदारी कई गुना ज्यादा थी। अगर इसमें ‘रिस्ट्रक्चर्ड लोन’ (पुनर्गठित ऋण) भी जोड़ दिए जाएं तो कुल रकम दस लाख करोड़ के आसपास बैठती है। इस दुर्गति के परिणामस्वरूप सार्वजनिक क्षेत्र के सत्ताईस बैंकों ने लगातार पांचवीं तिमाही में घाटा उठाया। मतलब यह कि अक्टूबर 2015 से दिसंबर 2016 के बीच इन सभी बैंकों का हिसाब जोड़ने पर खाते में मुनाफा नहीं, नुकसान निकलता है। वित्तवर्ष 2016-17 की अंतिम तिमाही में भी यह सिलसिला जारी रहने की आशंका है।

एनपीए में इजाफे का असर अब नए कर्जों पर पड़ने लगा है। पैसे की दिक्कत के चलते वे हाथ रोक कर ऋण दे रहे हैं। वैसे भी बाजार में निजी निवेश काफी समय से कमजोर चल रहा है। हालत यह है कि आज बैंकों की ऋण विकास दर पिछले तीस साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में प्राण फूंकने के लिए वित्तमंत्री अरुण जेटली 2016-19 के बीच सत्तर हजार करोड़ रुपए देने का एलान कर चुके हैं, पर इन बैंकों की पतली हालत को देखते हुए यह रकम ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। बैंकों को पटरी पर आने या लाने के लिए कम से कम चालीस खरब रुपए की दरकार है और सरकार किसी भी सूरत में इतनी मोटी रकम जुटाने की स्थिति में नहीं है।

चंद बड़े कर्जों के कारण आज अधिकतर सार्वजनिक बैंक लहूलुहान हैं। बैंकों का करीब 5.5 लाख करोड़ रुपया अकेले पौन सैकड़ा उद्योगों के पास फंसा पड़ा है। पिछले कुछ वर्षों में सार्वजनिक बैंक लगभग चार लाख करोड़ रुपए के बड़े कर्ज बट्टे-खाते में डाल चुके हैं। संसद की लोक लेखा समिति के अनुसार, सार्वजनिक बैंकों के एनपीए में सत्तर प्रतिशत हिस्सा कॉरपोरेट का है, जबकि किसानों की हिस्सेदारी केवल एक फीसद है। खतरे की घंटी बज चुकी है, इसीलिए वित्तमंत्री जेटली बैंकों की बीमारी का इलाज जल्द से जल्द खोजना चाहते हैं।  वित्तमंत्री के अनुसार एनपीए की समस्या मुख्यत: बड़ी पचास कंपनियों और उनसे जुड़े चालीस-पचास खातों तक सीमित है, जिससे निपटने के लिए केंद्रीय बैंक (आरबीआइ) कई विकल्पों पर विचार कर रहा है। इनमें ‘बैड लोन’ किसी निजी संस्था (प्राइवेट एसेट मैनेजमेंट कंपनी) को सौंपे जाने का विचार भी है।

लेकिन सरकार के लिए कॉरपोरेट जगत को किसी भी तरह की छूट देना आसान नहीं है। लंबे समय से कांग्रेस सहित सभी प्रमुख विपक्षी दल कर्ज में डूबे किसानों को राहत देने की मांग कर रहे हैं। हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के किसानों से कर्ज-माफी का वायदा किया था। दोनों सूबों में मिली भारी सफलता के बाद भाजपा के नेता पसोपेश में हैं कि अपना वचन कैसे निभाएं। उत्तर प्रदेश में 92 फीसद किसानों के पास ढाई एकड़ से कम जमीन है। इन छोटे और सीमांत किसानों पर 27,429 करोड़ रुपए का कर्ज है, जिसे माफ करने का वायदा किया गया है। उधर कर्ज वसूली की समस्या से जूझ रहे बैंक इस प्रस्ताव से सहमे हुए हैं। उनका ‘बैड लोन’ (खराब या फंसा हुआ कर्ज) 16.6 प्रतिशत की खतरनाक सीमा तक पहुंच चुका है। भारतीय स्टेट बैंक की चेयरमैन अरुंधती राय ने साफ-साफ कह दिया कि ऐसे किसी भी कदम से कर्ज अनुशासन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

कृषि मंत्रालय के अनुसार, देश में 4.68 करोड़ कृषक परिवार कर्ज में डूबे हैं। सरकार द्वारा संसद को दी गई जानकारी के अनुसार, फिलहाल देश भर के किसानों पर 12.6 लाख करोड़ रुपए का कर्ज चढ़ा हुआ है, जिसमें से 9.57 लाख करोड़ वाणिज्यिक बैंकों का, 1.57 लाख करोड़ सहकारी बैंकों का और 1.45 लाख करोड़ क्षेत्रीय बैंकों का है। दिलचस्प तथ्य यह है कि सरकार द्वारा किसानों को दिए जाने वाले कुल कर्ज में छोटे और सीमांत किसानों का हिस्सा केवल पच्चीस प्रतिशत है, शेष पचहत्तर फीसद ऋण बड़े किसानों और कृषि से जुड़े उद्योगों के खाते में जाता है। यह बात भी सब जानते हैं कि अधिकतर छोटे किसान बैंकों से नहीं, साहूकारों से कर्ज लेते हैं, इसलिए सरकारी कर्ज-माफी का उन्हें ज्यादा लाभ नहीं मिल पाता है।
किसान आत्महत्या के आंकड़ों पर नजर डालने से छोटे किसानों के दर्द को बेहतर समझा जा सकता है। देश भर में आत्महत्या करने वाले किसानों में 44.5 प्रतिशत छोटे काश्तकार हैं, जबकि 27.9 फीसद सीमांत व 25.2 फीसद मझोले किसान और मात्र 2.3 फीसद बड़े जमींदार। साफ है कि जान देने वालों में तीन चौथाई किसान छोटे और सीमांत श्रेणी के हैं। उनके लिए खेती घाटे का सौदा है, जिससे वे जल्दी से जल्दी मुक्ति पाना चाहते हैं। बैंकिंग शब्दावली में, जब कोई कर्ज लेने वाला तीन माह से ज्यादा समय तक अपनी किश्त नहीं चुकाता तो उसका ऋण एनपीए घोषित कर दिया जाता है। बैलेंस शीट ठीक दिखाने और एनपीए के दाग से बचने के लिए बैंक अक्सर मोटे कर्जे रिस्ट्रक्चर (पुनर्गठित) कर देते हैं। साफ शब्दों में कहा जाए तो, ऋण न चुकाने वाले को दंडित करने के बजाय छूट दी जाती है। मोटा-मोटी एनपीए और पुनर्गठित कर्ज को जोड़ कर जो रकम बनती है उसे ‘स्ट्रेस लोन’ (ऐसा कर्ज जो संकट में हो) या ‘बैड लोन’ कहा जाता है। जब उधार दी हुई रकम और उसका ब्याज वापस मिलने की कोई संभावना नहीं रहती, तब बैंक ऐसे ऋण को बट्टे-खाते में डाल देते हैं। साफ-साफ कहा जाए तो कर्ज माफ कर दिया जाता है।

राजनीतिक दलों की ‘मेहरबानी’ से कभी अरबों का मुनाफा कमाने वाले हमारे सार्वजनिक बैंक आज फटेहाल हैं। सत्तारूढ़ दल के नेता सरकारी बैंकों पर दबाव डालकर कॉरपोरेट और औद्योगिक घरानों को, शर्तें पूरी न करने पर भी, ऋण दिलवा देते हैं। फंसे कर्जों में वृद्धि और वसूली में विलंब का मुख्य कारण उद्योगों की बदनीयती और शासन का ढीला रवैया है। कमजोर आर्थिक हालात भी ऋण वसूली के आड़े आ रहे हैं। एक कंसल्टेंसी कंपनी के अनुसार, वर्ष 2011 और 2015 के बीच भारत में खराब कर्ज के मर्ज में पांच गुनी वृद्धि हो गई।
लोकसभा में सरकार की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार, दिसंबर 2016 तक देश में जान-बूझ कर कर्ज न लौटाने वाले लोगों की संख्या 9,130 थी और उन पर 91,155 करोड़ रुपए का कर्ज बकाया था। इस साल के आर्थिक सर्वे में भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने ‘बैड बैंक’ का सुझाव उछाला है। सरकार को सलाह दी गई है कि बैंकों को ‘बैड लोन’ से मुक्ति दिलाने के लिए एक ‘बैड बैंक’ खोला जाना चाहिए, जिसे कॉरपोरेट जगत के पास फंसी पड़ी सारी रकम से निपटने की जिम्मेदारी सौंपी जाए। बैंकों की बैलेंस शीट साफ करने और उन्हें बड़े कर्जदारों से मुक्ति दिलाने के लिए नए-नए रास्ते खोजे जा रहे हैं। रास्ता कोई भी हो, सरकार ज्यादा दिन तक किसानों की कर्ज-माफी की मांग की उपेक्षा नहीं कर सकती। अगले आम चुनाव के लिए अब केवल दो साल बचे हैं।

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