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बेबाक बोलः राज-काज- अगुआ से आस

इंदिरा गांधी के साथ जुड़ा कांग्रेस का सबसे सशक्त चेहरा, कांग्रेस के संकटमोचक, प्रधानमंत्री पद के सबसे योग्य उम्मीदवार।

Pranab Mukherjee, President Pranab Mukherjee, Union Budget 2017राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी। PTI Photo by Vijay Verma

मोदी ने अपने नाम पर वोट मांगा और जनता को योगी दिया। लेकिन राष्ट्रपति चुनाव की बात करें तो अभी भाजपा की राह इतनी आसान नहीं है कि जुलाई के अंत में प्रणब मुखर्जी की सेवानिवृत्ति के बाद वह अपनी मनमर्जी का उम्मीदवार अपनी पोटली से निकाल  कर थोप दे। फिलवक्त भाजपा की इसी कमजोरी पर खिंचाई करते हुए शिवसेना संघ प्रमुख का नाम राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर उछाल कर इसे हिंदू राष्ट्र के निर्माण के लिए आवश्यक बताती है। विपक्ष के लिए यह एक मौका है कि वह एकजुट होकर देश को ऐसा अगुआ सौंप सकता है जो नारायणन की तरह संघवाद में राज्यों के अधिकारों की रक्षा करें। सत्ताधारी भाजपा भी चाहे तो वाजपेयी के नक्शेकदम पर सर्वसम्मति से अब्दुल कलाम जैसा सर्वमान्य चेहरा लाकर अपनी छवि बेहतर कर सकती है। राज-काज में अगुआ से आस को लेकर इस बार का बेबाक बोल।

इंदिरा गांधी के साथ जुड़ा कांग्रेस का सबसे सशक्त चेहरा, कांग्रेस के संकटमोचक, प्रधानमंत्री पद के सबसे योग्य उम्मीदवार। प्रणब मुखर्जी का राजनीतिक कॅरियर शुरू होता है वापमंथ के तत्कालीन गढ़ पश्चिम बंगाल से। प्रणब मुखर्जी लाल-लाल बंगाल से कांग्रेस के एक बड़े रणनीतिकार के तौर पर उभरे और कांग्रेस के साथ केंद्र की सत्ता में बड़ी शक्ति बने। आजादी के बाद पुराने भारत को नए आर्थिक युग का रास्ता दिखाने वालों में प्रणब मुखर्जी अगुआ थे। भारतीय अर्थव्यवस्था को अमेरिका के पक्ष में ले जाकर, अमेरिका के साथ खड़ा करने वालों में इनकी नीतियों का अहम योगदान रहा है। आज हम जिस उदारवादी पूंजीवादी व्यवस्था की सड़क पर खड़े हैं, भारत में इसकी बुनियाद रखने वाले प्रणब मुखर्जी ही रहे जिसे आगे मनमोहन सिंह की अगुआई मिली। भले ही तीन साल पहले भारत में कांग्रेस की सरकार उखाड़ दी गई, लेकिन आज की वित्तीय और विदेश नीति प्रणब दा के बनाए नक्शे-कदम पर ही है। जब वाम दलों के साथ केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनी और अमेरिका से परमाणु करार का वाम दलों ने विरोध किया तो वो संकटमोचक प्रणब मुखर्जी ही थे, जो सहयोगियों की असहमतियों के खिलाफ जाकर कांग्रेस की नीतियों पर अटल रहकर यह करार करवाकर आए। अपने उदारवादी चेहरे के साथ प्रणब दा पार्टी की नीतियों के साथ डटे रहे और उसे लागू करवाते रहे।

लेकिन अचानक पुराने भारत से नए भारत की सड़क बनाने वाले चेहरे को कांग्रेस राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित कर देती है। प्रणब मुखर्जी जैसे कद्दावर नेता को कांग्रेस ने आखिर इस पद के लिए क्यों चुना? जानकारों का कहना था कि मुखर्जी उस समय कांग्रेसी खेमे में प्रधानमंत्री पद का सबसे योग्य चेहरा थे और उनकी यह योग्यता कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के लिए खतरा थी। और योग्यता के इस खतरे को राहुल गांधी से दूर भेजने के लिए सुरक्षित जगह चुनी गई राष्ट्रपति भवन। भारत में राष्ट्रपति का पद सर्वोच्च संवैधानिक संस्था के तहत आता है। लेकिन भारतीय राजनीति की यह विडंबना है कि संविधान की अगुआ, देश की अगुआ इस संस्था का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों की धार कुंद करने के लिए किया जाता रहा है। यहां राष्ट्रपति होने का मतलब सक्रिय राजनीति से संन्यास। इसे भारतीय राजनीति का वानप्रस्थ्य करार दिया गया।

हालांकि, एक राष्ट्रपति के रूप में प्रणब मुखर्जी की जो कद्दावर छवि उभरी, देश के अभिभावक के तौर पर उन्होंने जो सक्रियता दिखाई उसके बाद कांग्रेस को अपनी गलती का बखूबी अहसास हो गया। दादरी से लेकर बाबरी और रामजस तक मुखर्जी ने प्रचंड बहुमत वाली सरकार को जिस तरह से बहुमत के बरक्स सर्वमत का सम्मान देने का ठोस संदेश दिया, उससे इस शीर्ष पद की गरिमा की वापसी दिखी। जुलाई महीने के आखिरी में प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल खत्म हो रहा है। एक गरिमामय नजीर छोड़ने के बाद प्रणब मुखर्जी ने एक सवाल यह भी पैदा कर दिया है कि अगला कौन?

पिछली सरकारों ने तो नजीर दी ही है, साथ ही मौजूदा सरकार भी इस पद का इस्तेमाल अपने राजनीतिक लाभ के लिए करना चाहती है। पिछले काफी लंबे समय से अगले के लिए लालकृष्ण आडवाणी का नाम उछाला जा रहा है। आखिर आडवाणी क्यों? क्योंकि सक्रिय राजनीति से हटाकर उन्हें मार्गदर्शक मंडल में डाल दिया गया है। क्योंकि एक समय वे मोदी के चेहरे के उलट थे। क्योंकि उन्हें प्रधानमंत्री पद के इंतजारी की उपाधि मिली हुई है। राष्ट्रपति पद के नाम के लिए आडवाणी का नाम इसलिए नहीं उछाला जा रहा कि वे भारतीय जनता पार्टी के लौहस्तंभ रहे हैं। बल्कि इसलिए उछाला जा रहा है कि प्रधानमंत्री के बरक्स प्रधानमंत्री की उम्मीदवारी टकराने वाले चेहरे की राजनीतिक योग्यता खत्म कर दी जाए। इसके जरिए यह बताया जा रहा है कि उनके वानप्रस्थ्य का समय आ गया है, या मोदी जी गुरुदक्षिणा देना चाहते हैं।

और, आडवाणी के इतर इस दौड़ के नामों की सूची पर नजर डालें तो वही एक खास पत्ता खेलना। पहली महिला, मुसलमान, पहला आदिवासी या कुछ और। यानी एक ऐसा चेहरा जिसके जरिए देश के करोड़ों चेहरों के सामने दावा ठोका जाए कि देखो हमने इन्हें राष्ट्रपति बनाया। इसी संकुचित नजर ने इस शीर्ष संस्था की गरिमा पर हमला किया है। हम सिर्फ अंदाजा लगा सकते हैं कि किन्हें वानप्रस्थ्य दिया जाएगा या किन पर कृपा बरसेगी। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत और अन्य राज्यों में अच्छे प्रदर्शन के बाद भी राष्ट्रपति चुनाव के लिए उसकी राह बहुत आसान नहीं है। और, भाजपा के पास दावेदारों की सूची भी लंबी है। लेकिन मोदी और शाह की शाहकार जोड़ी के लिए यह फैसला लेना बहुत मुश्किल भी नहीं है क्योंकि पार्टी पर इनका ही वर्चस्व है। लेकिन इस मुद्दे पर इन दोनों ने न तो अभी तक कुछ कहा है और न ही ..और यह पद जाता है…के नाम के पहले कुछ बोलने की उम्मीद है। मुख्यमंत्री से लेकर राष्ट्रपति पद तक के नाम के लिए अंत तक साधी गई यह रहस्यमय चुप्पी ही इन शीर्ष संस्थाओं को इनके आगे बौनी साबित करती है।

हरियाणा हो या उत्तर प्रदेश। जनता ने जिन विधायकों को चुना अगर उनमें से एक को भी आप मुख्यमंत्री पद के लायक नहीं समझते हैं तो फिर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार किस पोटली से निकलेंगे इसके कयास पर तो ऊर्जा खर्च करना ही व्यर्थ है। अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वेकैंया नायडू, सुमित्रा महाजन, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार, केशुभाई पटेल, यशवंत सिन्हा, द्रौपदी मुर्मू, रतन टाटा के नाम तो हम-आप सामने ला रहे हैं। और इसके पीछे वही उपकृत करने, हाशिए पर का चेहरा सामने लाने या वानप्रस्थ्य देने वाला समीकरण है। और, अगर शिवसेना मोहन भागवत का नाम सामने कर खिंचाई करती है और भागवत उसे मीडिया का मनोरंजन करार देते हैं तो गलत क्या है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार यह चिंता जता चुके हैं कि भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रपति स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि वाले किसी व्यक्ति को राष्ट्रपति बना सकती है। इसलिए विपक्ष की तरफ से एक मजबूत उम्मीदवार को खड़ा करना जरूरी है। उन्होंने विपक्ष के साझा उम्मीदवार के लिए बोलने की पहल की।

वैसे, राज्यों के ताजा चुनावी नतीजों के बाद भाजपा की नजर 2019 पर है। केंद्र की सत्ता जीतने के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनाव लड़ रहे हैं। लोग मोदी के नाम पर वोट देते हैं और मुख्यमंत्री के रूप में योगी को सहर्ष स्वीकार करते हैं। भाजपा दावा कर रही है कि भारत की आजादी के 75वें साल में अखिल भारतीय उसका शासन होगा। उस वक्त नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री रहेंगे या नहीं यह तो अभी नहीं कहा जा सकता, लेकिन फिलहाल हम यह उम्मीद करें कि आजादी के 75वें साल में जो राष्ट्रपति होंगे वो प्रणब मुखर्जी जैसे ही ये आजाद शब्द बोलें, ‘बहुमत के बावजूद सत्ता में बैठे लोगों को पूरे देश को हमेशा एक साथ लेकर चलना चाहिए। सरकारें बहुमत से चलती हैं लेकिन काम सर्वसम्मति से होता है। संसदीय लोकतंत्र में हमें हमेशा बहुमतवाद से सतर्क रहना चाहिए। जो सत्ता में हैं उन्हें पूरे देश को एक साथ लेकर चलना चाहिए’।

उत्तर प्रदेश चुनावों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक ही कहा था कि फल लगते ही वृक्ष झुकने लगता है। तो उनसे नम्र होने की अपील करते हुए कहा जा सकता है कि अब राष्ट्रपति चुनाव के समय में अटल बिहारी वाजपेयी का ‘राजधर्म’ याद करने का वक्त है। अटल जी ने जिस तरह सभी दलों की सर्वसम्मति से डॉक्टर अब्दुल कलाम आजाद को राष्टÑपति पद का उम्मीदवार बनवाया था, आज उसी विरासत को दुहराने की जरूरत है। हमारा संविधान और उसका रक्षक कोई वानप्रस्थ्य का चेहरा नहीं होना चाहिए। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, जाकिर हुसैन, डॉक्टर केआर नारायणन ऐसे राष्ट्रपति रहे हैं जिन्होंने पार्टी विशेष की विचारधारा से हटकर एक अभिभावक के तौर पर सशक्त हस्तक्षेप का उदाहरण दिया है। संविधान के रक्षक के तौर पर केआर नारायणन की टिप्पणियां इतिहास की किताबों में दर्ज हैं। अब देखना है कि राज-काज करने वालों को ‘राजधर्म’ की याद दिलाने वाला अगला चेहरा कौन होता है।

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