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राजनीतिः पुलिस सुधार का इंतजाम

सत्ताधारियों ने पुलिसिया तंत्र को अपने प्रति इस कदर केंद्रित कर रखा है कि पुलिस के लिए हर समय अपनी जवाबदेही का ध्यान रखना मुश्किल होता जा रहा है। दूसरी त्रासदी यह है कि सरकारें अपने इशारे पर काम करने वाले पुलिस अफसरों को पुरस्कृत करती हैं, भले वे काम नियम-विरुद्ध क्यों न हों। इससे कर्तव्यनिष्ठा कमजोर पड़ती है।

प्रतीकात्मक फोटो

यह स्वागतयोग्य है कि उच्चतम न्यायालय ने पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को ताकीद किया है कि वे एफआइआर दर्ज होने के चौबीस घंटों के भीतर उसे आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करें। अदालत ने यह भी कहा है कि जहां इंटरनेट व्यवस्था दुरुस्त नहीं है वहां एफआइआर को बहत्तर घंटों के दरम्यान सार्वजनिक किया जाए। इसके अलावा अदालत ने पुलिस महकमों को निर्देश दिया है कि राजद्रोह या विद्रोह, आतंकवाद और महिलाओं व बच्चों से जुड़े यौन अपराध के मामलों में एफआइआर को इंटरनेट पर अपलोड न किया जाए। निस्संदेह इस निर्देश के पीछे अदालत की मंशा लोगों को राहत पहुंचाना है ताकि वे आसानी से एफआइआर कर उसकी प्रतिलिपि प्राप्त कर सकें। अब देखना यह है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा जारी इस निर्देश का राज्य सरकारें कितना अनुपालन करती हैं। यह आशंका इसलिए है कि सर्वोच्च न्यायालय 1861 के भारतीय पुलिस कानून में बदलाव का सुझाव पहले भी दे चुका है, लेकिन सरकारें उस पर गौर फरमाने को तैयार नहीं हैं। हां, कुछ राज्य सरकारों ने जरूर कदम उठाए हैं लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं।

गौरतलब है कि सितंबर 2006 में न्यायमूर्ति वाईके सब्बरवाल की अध्यक्षता वाले खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पुलिस सुधार के आदेश दिए थे। लेकिन आज तक इस दिशा में राज्य सरकारों ने प्रभाकारी कदम नहीं उठाए हैं। वर्ष 1996 में दाखिल इस याचिका में मांग की गई थी कि उच्चतम न्यायालय केंद्र व राज्य सरकारों को उनके यहां पुलिस के कामकाज की खराब गुणवत्ता और कार्य-प्रदर्शन को सुधारने का निर्देश दे। इस परिप्रेक्ष्य में उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राज्य को सात अहम सुझाव दिए, जिसके तहत स्टेट सिक्योरिटी कमीशन का गठन, डीजीपी का कार्यकाल दो साल सुनिश्चित करने के अलावा आइजी व अन्य पुलिस अधिकारियों का कार्यकाल सुनिश्चित करना था। इससे पहले विधि आयोग, मलिमथ समिति, पद्मनाभैया समिति तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी पुलिस सुधार के सुझाव दिए थे। लेकिन इन सिफारिशों और सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

इन समितियों ने राज्यों में पुलिस की संख्या बढ़ाने और महिला कांस्टेबलों की भर्ती पर जोर दिया। यह किसी से छिपा नहीं है कि पुलिस की कमी से आज राज्यों में कानून-व्यवस्था की हालत खस्ता है। पर पुलिसकर्मियों की तादाद बढ़ाने मात्र से हालात सुधरने वाले नहीं हैं। पुलिस की कार्य-प्रणाली में आमूलचूल सुधार की जरूरत है। पुलिस को संवेदनशील होकर नागरिकों का भरोसा जीतना होगा। आज अगर अपराधियों का हौसला बुलंद है या आतंकी संगठन अपने खतरनाक मंसूबों को अंजाम देने में सफल हो जाते हैं या नौजवानों में कट्टरता का भाव भरने में कामयाब हैं तो इसके पीछे पुलिस की व्यवस्थागत खामियां और असंवेदनशील व्यवहार एक बड़ी वजह है।
यह स्वीकार कर लेने में हर्ज नहीं कि भारतीय पुलिस की छवि लगातार बिगड़ती जा रही है। लोगों में यह धारणा घर कर गई है कि पुलिस प्रशासन सत्ताधारियों के इशारे पर नाचता है। रिश्वत लेकर अपराधियों को बचाता है। सीधे-सादे लोगों और विपक्षी कार्यकर्ताओं को झूठे मुकदमों में फंसाता है। सत्ता के इशारे पर लाठियां बरसाता है। सवाल लाजिमी है कि आखिर भारतीय पुलिस इतनी आक्रामक क्यों है। सवाल यह भी कि पुलिसिया तंत्र को इस हालत में पहुंचाने के लिए जिम्मेदार कौन है।
सरकारें जो भी दलील दें, यह सच्चाई है कि पुलिस के आक्रामक चरित्र को गढ़ने-बुनने में राजनीतिकों का ही हाथ है। सत्ताधारियों ने अपनी छत्रछाया में पुलिसिया तंत्र को अपने प्रति इस कदर केंद्रित कर रखा है कि पुलिस के लिए हर समय अपनी जवाबदेही का ध्यान रखना मुश्किल होता जा रहा है। दूसरी त्रासदी यह है कि सरकारें अपने इशारे पर काम करने वाले पुलिस अफसरों को पुरस्कृत करती हैं, भले वे काम नियम-विरुद्ध क्यों न हों। इससे ईमानदार व कर्तव्यनिष्ठ पुलिसकर्मियों के मनोबल को चोट पहुंचती है, आदर्श व कर्तव्यनिष्ठा की भावना कमजोर पड़ती है।
दरअसल, सरकारें पुलिस को अपने हाथ की कठपुतली बनाए रखना चाहती हैं। उन्हें पता है कि अगर पुलिस प्रणाली में सुधार हुआ तो उनकी मनमर्जी खत्म हो जाएगी। यह सच्चाई भी है कि सरकारें कई बार पुलिस प्रशासन का दुरुपयोग करती हैं। कभी अपने राजनीतिक विरोधियों को निपटाने के लिए तो कभी अपनी नाकामी पर पर्दा डालने के लिए। संभवत: यही मुख्य कारण है कि सरकारें पुलिस सुधार के लिए तैयार नहीं हैं। राज्य सरकारें पुलिस सुधार के लिए कितनी संजीदा हैं यह इसी से समझा जा सकता है कि पिछले वर्ष पहले जब गृह मंत्रालय ने दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की एक सौ तिरपन अति महत्त्वपूर्ण सिफारिशों पर विचार करने के लिए मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन बुलाया जिनमें पुलिस सुधार पर चिंतन-मनन होना था, तो इस सम्मेलन में अधिकतर मुख्यमंत्री अनुपस्थित रहे।

पुलिस सुधार के एजेंडे में जांच व पूछताछ के तौर-तरीके, जांच विभाग को विधि-व्यवस्था विभाग से अलग करने, महिलाओं की तैंतीस फीसद भागीदारी के अलावा पुलिस की निरंकुशता की जांच के लिए विभाग बनाने पर भी चर्चा की जानी थी। जब गृह मंत्रालय द्वारा राज्यों से राय मांगी गई तो सिर्फ आधा दर्जन राज्यों ने पुलिस सुधारों पर अपनी राय से गृह मंत्रालय को अवगत कराया। आज भी ज्यादातर राज्य सरकारें पुलिस सुधार के मसले पर अपना रुख स्पष्ट करने को तैयार नहीं हैं। यह आनाकानी पुलिस सुधार को लेकर उनकी बेरुखी को ही दर्शाती है। ऐसे में इस निष्कर्ष पर पहुंचना कि उच्चतम न्यायालय द्वारा ताकीद किए जाने के बाद पुलिस की प्रणाली में सुधार होगा, संशय भरा है। केंद्र व राज्य सरकारें पुलिस सुधार की तरह प्रशासनिक सुधार को लेकर भी गंभीर नहीं रही हैं। प्रशासनिक सुधार से तात्पर्य प्रशासन में इस प्रकार के सुनियोजित परिवर्तन से है जिससे तंत्र की क्षमता बढ़ाई जा सके तथा सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ा जा सके। आज विश्व के सभी देश, चाहे वे विकसित हों या विकासशील, आर्थिक व सामाजिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहे हैं, सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए प्रशासन की संरचना, प्रक्रिया और उसके दर्शन में अपेक्षित सुधार और बदलाव कर रहे हैं। भारत के लिए भी यह आवश्यक है। इसलिए और भी कि भारत का मौजूदा प्रशासनिक ढांचा काफी-कुछ ब्रिटिश राज की देन है।

चूंकि स्वतंत्र भारत की प्राथमिकताएं व्यापक हुई हैं, ऐसे में समझना होगा कि औपनिवेशिक ढांचे में रह कर समुचित लक्ष्यों और उद््देश्यों को हासिल नहीं किया जा सकता। इसी को ध्यान में रखते हुए प्रशासन में सुधार लाने के उद््देश्य से केंद्र सरकार ने 31 अगस्त, 2005 को कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता में दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग का गठन किया था। प्रशासनिक ढांचे को किस तरह सशक्त, कुशल, संवेदनशील और वस्तुनिष्ठ बनाया जाए इसके लिए तेरह सूत्री क्षेत्र निर्धारित किए गए। साथ ही आयोग को जिम्मेदारी सौंपी गई कि वह भ्रष्टाचार से निपटने के उपाय भी सुझाए। आयोग ने गहन विचार-विमर्श के बाद सरकार को पंद्रह शीर्षकों में अपनी रिपोर्ट पेश की। मसलन सूचना का अधिकार, ई-प्रशासन, लोक व्यवस्था, स्थानीय शासन, आपदा प्रबंधन, मानव पूंजी को मुक्त करना, सामाजिक पूंजी, भारत सरकार की संगठनात्मक व वित्तीय प्रबंध व्यवस्था का सुदृढ़ीकरण, राज्य एवं जिला प्रशासन, कार्मिक प्रशासन का पुनर्परिष्कार, शासन में नैतिकता, नागरिक केंद्रित प्रशासन और आतंकवाद प्रतिरोध, आदि। अगर आयोग के सुझावों को लागू किया गया होता तो निस्संदेह आज प्रशासनिक ढांचा बेहतर होता। लेकिन विडंबना यह है कि इसकी सिफारिशें आज भी धूल खा रही हैं। यही नहीं, पहले प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों पर भी अमल नहीं किया गया।

उल्लेखनीय है कि 5 जनवरी 1966 को भारत सरकार ने भारतीय प्रशासनिक सुधार आयोग की नियुक्ति का आदेश दिया था। इस आयोग को देश की प्रशासनिक व्यवस्था का परीक्षण करने का कार्य सौंपा गया। मोरारजी देसाई आयोग के अध्यक्ष नियुक्त किए गए। उनके केंद्रीय मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने के बाद के हनुमंतैया को आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। इस प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग को कुछ अहम बातों पर विचार करने का निर्देश दिया गया, जैसे भारत सरकार का संगठन और उसकी कार्य पद्धति, केंद्र-राज्य संबंध, कार्मिक प्रशासन, वित्तीय प्रशासन, प्रत्येक स्तर पर योजना का संगठन, आर्थिक प्रशासन, आदि। आयोग ने भारत के प्रशासनिक तंत्र व नियोजन तंत्र को मजबूत करने के ढेरों उपाय सुझाए। लेकिन उसके अधिकतर सुझाव दरकिनार कर दिए गए।

प्रशासन में पारदर्शिता लाने और उसकी जवाबदेही बढ़ाने के लिए समय-समय पर अन्य समितियों का भी गठन हुआ। लेकिन उनके सुझावों की अनदेखी कर दी गई। 1947 में वाजपेयी समिति तथा 1948 में गठित मितव्ययिता समिति ने प्रशासन में किफायतशारी लाने और गैर-जरूरी व्ययों को समाप्त करने का सुझाव दिया। इसी तरह 1951 में गोरवाला रिपोर्ट, 1952 में गोपालस्वामी प्रतिवेदन, पाल एच एपिलेबी प्रतिवेदन और 1962 में संथानम समिति प्रतिवेदन ने भी प्रशासन सुधार के उपाय सुझाए। संसद की प्राक्कलन समिति ने भी समय-समय पर मार्गदर्शन किया। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह कि इन सुझावों को सैद्धांतिक तौर पर ही स्वीकारा गया, उन पर कभी अमल नहीं हुआ। नतीजा सामने है। नौकरशाही की उदासीनता बनी हुई है और ब्रिटिशकालीन पुलिसिया रवैए का खौफ बरकरार है। अब उचित होगा कि भारत सरकार उच्चतम न्यायालय की हिदायतों के मुताबिक पुलिस सुधार की पहल करते हुए दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिशों पर भी अमल की शुरुआत करे।

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