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राजनीतिः जहरीली शराब का कहर

साल 2016 के शुरुआती दौर में जब बिहार की नवनिर्वाचित राजद-जद (एकी) सरकार ने पहले आंशिक और फिर पूर्ण शराबबंदी के अपने इरादे जाहिर किए तो बहुतों के मन में सहज ही आशंका पैदा हुई कि सूबे में नकली-जहरीली शराब का कारोबार करने वालों के दिन बहुरने वाले हैं।
Author September 2, 2016 03:05 am

तमाम नियम-कानून व प्रशासन की मौजूदगी के बावजूद अवैध शराब बनाने और बेचने वालों के हौसले बुलंद हैं। विभिन्न राज्यों की सरकारों और स्थानीय प्रशासन की नींद तभी खुलती है, जब जहरीली शराब पीकर लोग मरने लगते हैं। तब भी उनकी भूमिका सिर्फ सख्त कार्रवाई के वादे और मुआवजा वितरण से आगे नहीं बढ़ पाती।

साल 2016 के शुरुआती दौर में जब बिहार की नवनिर्वाचित राजद-जद (एकी) सरकार ने पहले आंशिक और फिर पूर्ण शराबबंदी के अपने इरादे जाहिर किए तो बहुतों के मन में सहज ही आशंका पैदा हुई कि सूबे में नकली-जहरीली शराब का कारोबार करने वालों के दिन बहुरने वाले हैं। राजस्व के भारी नुकसान को नजरअंदाज करते हुए राज्य सरकार के मुखिया नीतीश कुमार ने आखिरकार एक अप्रैल से पूर्ण शराबबंदी लागू कर दी। विरोध के स्वर उठे, लेकिन उन्हें यह कह कर दबा दिया गया कि फैसला जनहितकारी है और इससे गरीबों के घर खुशहाली आएगी।
नीतीश कुमार ने पूर्ण शराबबंदी को अपनी बहुत बड़ी कामयाबी माना और वे देश के जिस हिस्से में गए, वहां उन्होंने इसके लिए खुद को भरपूर शाबाशी दी। राज्य के मुखिया के तेवर देख शासन-प्रशासन भी सख्त हो गया। व्यापारी पुत्र को सरेआम गोली से उड़ा देने वाले जद (एकी) की महिला एमएलसी के पुत्र की गिरफ्तारी के लिए जब छापेमारी हुई, तो चंद बोतल अंग्रेजी शराब पाए जाने पर सख्त कार्रवाई हुई।
अभी हाल में नालंदा जिले के कैलाशपुरी गांव के पचास घरों पर पांच-पांच हजार रुपए का जुर्माना भी लगाया गया। लेकिन पूर्ण शराबबंदी को लेकर राज्य सरकार की नानाविध सख्ती माफियाओं पर कतई असरकारी साबित नहीं हुई। नतीजा गोपालगंज में सत्रह मौतों की शक्ल में सबके सामने है। दो दर्जन से भी ज्यादा पुलिसकर्मियों और अन्य पर विभागीय कार्रवाई हो चुकी है। जहरीली-नकली शराब बनाने-बेचने के मुख्य आरोपी समेत तकरीबन एक दर्जन लोग पुलिस के हत्थे चढ़ चुके हैं। जांच टीम ने खजूरबानी इलाके से जमीन के अंदर दबी एक हजार लीटर देसी शराब बरामद की है। बिहार में जहरीली शराब पीने से लोगों के मरने की यह पहली घटना नहीं है। नवंबर-दिसंबर 2012 में भी पटना के बारह, गया के तेरह और आरा के उनतीस लोग जहरीली शराब के शिकार बने थे, जिनमें अधिकतर दिहाड़ी मजदूर, रिक्शाचालक, फेरी-खोमचे वाले थे। यानी अवैध जहरीली शराब का कारोबार करने वाले तब भी सक्रिय थे, जब जगह-जगह सरकारी ठेके थे।
जाहिर है, बिना शासन-प्रशासन और राजनीतिक संरक्षण के यह संभव नहीं था। गोपालगंज कांड के मुख्य आरोपी नगीना पासी-लाल बाबू पासी पहले ताड़ी उतारते-बेचते थे। पूर्ण शराबबंदी के बाद दोनों शराब बनाने-बेचने लगे। नगीना-लाल बाबू जैसे कई लोग बिहार के विभिन्न इलाकों में सक्रिय हैं, जो अरसे से उत्तर प्रदेश और झारखंड के सीमावर्ती जिलों से अवैध शराब लाते-बेचते रहे हैं। बीती सोलह अगस्त को ही पुलिस ने पटना के हार्डिंग पार्क के समीप सात महिलाओं के कब्जे से देसी शराब के 378 पाउच बरामद किए, जो झारखंड के सीमावर्ती जिले से लाए गए थे।
अवैध अथवा जहरीली शराब के कारोबारी सिर्फ बिहार में नहीं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में इंसानी जान से खेल रहे हैं। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के एटा जिले के अलीगंज कस्बे में जहरीली शराब ने उनतालीस लोगों की जान ली। तीन लोग अपनी आंख की रोशनी गंवा बैठे, जबकि समीपवर्ती जिले फर्रूखाबाद के मेरापुर थाना अंतर्गत गांव देवरा मेहसोना में जहरीली शराब ने दस लोगों को अपना ग्रास बनाया। 2015 के मार्च महीने में सूबे की राजधानी लखनऊ के मलीहाबाद इलाके में पचास से ज्यादा लोग जहरीली शराब पीकर अपनी जान गंवा बैठे। इससे पहले उन्नाव जिले में जहरीली शराब पीने से तकरीबन तीन दर्जन लोग मौत के मुंह में समा गए। राज्य के आजमगढ़, बुलंदशहर, मुरादाबाद, मेरठ, अलीगढ़, कानपुर, इलाहाबाद, सहारनपुर, बहराइच, गाजीपुर, वाराणसी, प्रतापगढ़, भदोही, मिर्जापुर व जालौन में अवैध शराब का कारोबार होली-दिवाली जैसे त्योहारों के समय चरम पर होता है। नतीजतन, कई निर्दोष लोग मारे जाते हैं अथवा आंख की रोशनी गंवा बैठते हैं। कानपुर शहर में कुछ ठेके ऐसे हैं जहां चौबीसों घंटे शराब उपलब्ध रहती है।

महाराष्ट्र, उत्तराखंड, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, बंगाल, आंध्र प्रदेश और ओड़िशा में हर साल, खासकर त्योहारों के अवसर पर जहरीली-नकली शराब के सेवन से बड़ी संख्या में लोग अकाल मौत के शिकार हो जाते हैं। जून, 2015 में जहरीली शराब ने मुंबई में जमकर कहर बरपाया, जहां मालवणी थाना अंतर्गत लक्ष्मीनगर झोंपड़पट्टी स्थित एक अनधिकृत दुकान से खरीदी गई जहरीली शराब पीने से नब्बे लोगों की मौत हो गई, जबकि सौ से भी ज्यादा लोगों को गंभीर हालत में विभिन्न अस्पतालों में दाखिल कराना पड़ा। इस मामले में पुलिस ने शराब की आपूर्ति करने वाले राजू हनुमंता पास्कर उर्फ राजू लंगड़ा समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया था, जो उधारी पर ग्राहकों के घर जाकर अवैध शराब की सप्लाई करते थे। उक्त हादसे में मरने वालों में ज्यादातर दिहाड़ी मजदूर तथा रिक्शाचालक थे, जो कर्नाटक, मध्यप्रदेश और गुजरात के बताए गए।

इससे पहले 2004 में मुंबई के विक्रोली इलाके में जहरीली शराब पीने से सत्तासी लोगों की मौत हो गई थी। जनवरी 2012 में आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के मइलावरम व पोरत्रागनर इलाकों में जहरीली शराब पीने से अठारह लोग मारे गए। फरवरी 2012 में ओड़िशा के कटक जिले में जहरीली शराब पीने से बत्तीस लोगों की मौत हो गई। 2009 में खुदरा जिले में तैंतीस और 1992 में कटक में दो सौ लोग जहरीली शराब के शिकार बनकर अपनी जान गंवा बैठे थे। दिसंबर 2011 में पश्चिम बंगाल में 171, फरवरी 2010 में तमिलनाडु में 10 और जुलाई 2009 में गुजरात में 107 लोग मिलावटी-जहरीली शराब पीने से मारे गए।

दरअसल, समस्या यह है कि हमारे देश में शराब के उत्पादन-विपणन के लिए कोई राष्ट्रीय नीति नहीं है। सब कुछ राज्यों के जिम्मे छोड़ दिया गया है। और, राज्यों में काबिज विभिन्न सरकारें अपने राजनीतिक नफा-नुकसान के मद््देनजर मनमाने फैसले लेती रही हैं। बिहार की पूर्ण शराबबंदी पर अगर जन अधिकार पार्टी के राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव कहते हैं कि यह काला कानून है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं है। राजद के वरिष्ठ नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह भी शराबबंदी कानून के सख्त प्रावधानों का खुलकर विरोध करते हैं। पप्पू यादव व रघुवंश प्रसाद के नजरिये के राजनीतिक निहितार्थ क्या हैं, इस पर गौर किए बिना अगर तटस्थ भाव से देखा जाए, तो वाकई बिहार में सख्ती के नाम पर मजाक हो रहा है।

आबकारी नीति को राज्य सरकारों का मसला बनाने का नतीजा यह है कि जिसे जो समझ में आ रहा है, वह उसे अंजाम दे रहा है। शराब कैसे बिके, कितनी कीमत पर बिके, कब बिके और कब न बिके, इस बाबत हर राज्य में अलग-अलग व्यवस्था है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लाख कमियों के बावजूद दोपहर बारह बजे से रात दस बजे तक शराब बेचने और बंदी के दिन असल बंदी का सख्त प्रावधान है, जबकि उत्तर प्रदेश में न समय का प्रावधान है और न कीमत का। बंदी की असलियत यह है कि आप पंद्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी को भी बेहिचक शराब खरीद सकते हैं। होली-दिवाली और अन्य पर्वों पर तो चर्चा की कोई जरूरत महसूस नहीं होती। उधर, बंगाल से एक चौंकाने वाली खबर यह है कि ममता बनर्जी सरकार ने बंदी यानी ड्राइ डे की संख्या साल में बारह से घटा कर साढ़े चार कर दी है। यही नहीं, होटल स्थित बारों और क्लबों को इस नियम से मुक्त कर दिया गया है। हाल में दिल्ली सरकार ने मोहल्ला सभा के नाम से एक नई व्यवस्था दी है कि अगर स्थानीय लोग नहीं चाहेंगे, तो उस इलाके में शराब ठेका नहीं खुलेगा। लेकिन इस व्यवस्था में भी पेच हैं। सवाल है कि उक्त मोहल्ला सभाओं में असल स्थानीय नागरिकों की भागीदारी और वर्चस्व का पैमाना क्या होगा?

गौरतलब है कि बीती सत्रह अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने देश भर में सड़क दुर्घटनाओं में हताहत लोगों की बढ़ती संख्या के मद््देनजर केंद्र, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से उस याचिका पर जवाब-तलब किया है, जिसमें आबकारी कानूनों में संशोधन का निर्देश देने और राष्ट्रीय राजमार्गों पर शराब बेचने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है। प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर व न्यायमूर्ति एएम खानविल्कर की पीठ ने यह नोटिस ईवी बालकृष्णन की उस जनहित याचिका पर जारी किया, जिसमें कहा गया है कि न्यायमूर्ति केएस राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों पर अमल नहीं हो रहा है। राष्ट्रीय राजमार्गों पर सरकारी ठेकों के समांतर ढाबों और पान के खोखों से शराब बिकने की शिकायतें अक्सर मिलती रही हैं। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में सामूहिक दुष्कर्म की घटना के आरोपियों ने भी ढाबे से खरीदी गई शराब पीने के बाद वारदात को अंजाम दिया था। खैर, यहां मुख्य सवाल जहरीली-नकली शराब का है, जो आए दिन बेकसूर लोगों की जान ले रही है। तमाम नियम-कानून व प्रशासन की मौजूदगी के बावजूद अवैध शराब बनाने एवं बेचने वालों के हौसले बुलंद हैं और गरीब-अल्प आयवर्गीय जनता क्षणिक सुख की खातिर मौत के मुंह में जाने को विवश है।

विभिन्न राज्यों की सरकारों और स्थानीय प्रशासन की नींद तभी खुलती है, जब जहरीली शराब पीकर लोग मरने लगते हैं। तब भी उनकी भूमिका सिर्फ सख्त कार्रवाई के वादे और मुआवजा वितरण से आगे नहीं बढ़ पाती। देश के लगभग हर हिस्से में आबकारी विभाग की इकाइयां हैं और मद्य निषेध विभाग की भी। दोनों ही सक्रिय हैं, उनका लंबा-चौड़ा अमला है, मोटी तनख्वाहें हैं, सुविधा शुल्क तो बहती हुई गंगा है। लेकिन बाहर कौन से नियम-प्रावधान टूट रहे हैं, इससे उन्हें कुछ लेना-देना नहीं है।

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