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राजनीतिः वाजिब हक बनाम खोखली चिंताएं

अकसर गरीबों और दलितों की चिंता में दुबले हुए जाते नेताओं की चिंताएं कितनी व्यर्थ हैं कि शहर भर का कूड़ा उठाने वाले और शहर को गंदगी से मुक्त करने वाले लोगों को समय पर उनके वाजिब हक भी न दिए जाएं। वेतन तक न मिले। कैसे कोई अपना घरबार चलाए! क्या कोई भी शहर इन कर्मियों के बिना साफ-सुथरा रह सकता है?

Author Published on: May 27, 2017 1:16 AM
एक तरफ देश के बहुत-से शहरों में स्वच्छता अभियान चलाए जाने और साफ-सुथरे शहरों, रेलवे स्टेशनों को रेटिंग दी जा रही हैं, उन्हें पुरस्कृत करने की बात हो रही है, दूसरी तरफ दो दिन पहले तक दिल्ली में सफाई कर्मचारियों का आंदोलन महीनों से चल रहा था, पर किसी ने उनकी सुध नहीं ली।

एक तरफ देश के बहुत-से शहरों में स्वच्छता अभियान चलाए जाने और साफ-सुथरे शहरों, रेलवे स्टेशनों को रेटिंग दी जा रही हैं, उन्हें पुरस्कृत करने की बात हो रही है, दूसरी तरफ दो दिन पहले तक दिल्ली में सफाई कर्मचारियों का आंदोलन महीनों से चल रहा था, पर किसी ने उनकी सुध नहीं ली। आंदोलन और हड़ताल के कोई बड़े कारण भी नहीं थे, बस इतने भर कि वे समय पर अपना वेतन दिए जाने की मांग कर रहे थे। अपने लिए पदोन्नति आदि मांग रहे थे। अकसर गरीबों और दलितों की चिंता में दुबले हुए जाते नेताओं की चिंताएं कितनी व्यर्थ हैं कि शहर भर का कूड़ा उठाने वाले और शहर को गंदगी से मुक्त करने वाले लोगों को समय पर उनके वाजिब हक भी न दिए जाएं। वेतन तक न मिले। कैसे कोई अपना घरबार चलाए! क्या कोई भी शहर इन कर्मियों के बिना साफ-सुथरा रह सकता है? जो लोग कैमरे के सामने झाड़ू पकड़ कर, झाड़ू लगाने का अकसर नाटक करते दिखते हैं, उनके जीवन और इनके जीवन में कितना अंतर है! वे फोटो खिंचवाने और खबर बनवाने के लिए अकसर सफाई करते दीखते हैं, और एक बार के बाद प्राय: दिखाई नहीं देते, जबकि सफाईकर्मियों के लिए सफाई इनके जीवनयापन का साधन है। जो लोग दलित हितैषी होने के नाम पर दलितों के घर दूरदराज के गांवों में खाना खाने जाते हैं, उन्हें अपने ही शहर में ये आंदोलनरत कर्मी नहीं दीखते।

एक ओर हालत यह है कि मामूली जरूरतों को पूरा करने के लिए लोगों को सड़कों पर उतरना पड़े और दूसरी तरफ परंपरा से जो लोग सफाईकर्मी नहीं हैं, वे भी सरकारी नौकरी के लालच में इनकी नौकरियां पाना चाहते हैं। एक तरीके से अब भी इनकी रोजी-रोटी के जो मामूली साधन हैं, उन्हें छीनना चाहते हैं। बहुत-से लोग तो इन नौकरियों को पाने के लिए तीन-चार हजार रुपए खर्च करके जाति के नकली सर्टिफिकेट तक बनवा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में जब पिछले दिनों बीस हजार सफाईकर्मियों की पोस्ट निकली थीं, तो बीस लाख लोगों ने आवेदन किया था। इनमें एमए, एमएससी, एमटैक से लेकर पीएचडी तक लोग शामिल थे। यही नहीं, लोगों ने अपनी जाति तक छिपा ली थी। सही जाति न पता चल जाए इसके लिए जाति के जाली सर्टिफिकेट बनवाए थे। यह तो सफाईकर्मियों की नौकरियां पाने के लिए तरह-तरह की तिकड़म करने वालों का हाल है, दूसरी तरफ जिनके पास ये नौकरियां हैं उन्हें वेतन और छोटी-मोटी सुविधाएं पाने के लिए आंदोलन करना पड़ता है।

दिल्ली में पूर्वी नगर निगम के सोलह हजार कर्मी हड़ताल पर थे। लगभग पांच माह से आंदोलन करने वाले इन कर्मियों का कहना था कि उन्हें किसी दल, किसी पार्टी, किसी सरकार से मतलब नहीं, मगर वे समय पर अपना वेतन पाना चाहते हैं। उनका कहना था कि अन्य कर्मचारियों को जो सुविधाएं मिलती हैं वे उन्हें भी मिलनी चाहिए। चुनाव और चुनाव के बाद दलितों को लुभाने के लिए दलों में होड़ लगी रहती है। बाबा साहब आंबेडकर का नाम ले-लेकर लोग दलितों को लुभाने की कोशिश करते हैं। लेकिन क्या बाबा साहब का नाम लेने भर से इनकी समस्याएं दूर हो सकती हैं, या कि सचमुच इनके बारे में सोचने और इनकी स्थिति को सुधारने के लिए ठोस रणनीति बनाने की जरूरत है? इस देश की यह कड़वी सचाई है कि सफाईकर्मियों के रूप में जिस वर्ग के लोग काम करते हैं, अकसर उनकी समस्याओं के बारे में आंखें मूंद ली जाती हैं। दलितों में भी वे जातियां जो थोड़ी समर्थ हो गई हैं, वे भी अकसर इनके मुद््दे नहीं उठातीं। आरक्षण का लाभ भी इनकी झोली में प्राय: नहीं पहुंचता। इसके लिए समाज में फैली ऊंच-नीच की संकीर्ण सोच तो जिम्मेवार है ही, दलितों के बीच में फैली जाति-उपजाति व्यवस्था और ऊंच-नीच का भाव भी काफी जिम्मेवार है। प्रमाण के तौर पर वैवाहिक विज्ञापनों में दलितों के बीच फैली हुई जाति-उपजाति व्यवस्था का भरपूर उल्लेख देखा जा सकता है।

सफाईकर्मी अकसर मीडिया की तमाम बहसों से दूर रहते हैं। यही नहीं, किसी फिल्म का नायक शायद ही कोई सफाईकर्मी कभी बना हो। या कि किसी धारावाहिक में उसे कोई प्रमुख भूमिका दी गई हो। उसे नायक बनाया गया हो। क्योंकि सोच यही है कि जो हमारे कूड़े की सफाई करता है, वह नायक कैसे हो सकता है! शायद संसद में भी इस वर्ग के इक्का-दुक्का लोग ही पहुंचते होंगे। यहां तक कि साहित्य में भी इस वर्ग को ध्यान में रख कर शायद ही कोई रचना, कहानी, उपन्यास दिखाई देता है। अमृतलाल नागर ने जरूर कलम चलाई थी। हो सकता है कुछ रचनाएं और भी हों, जिन पर इस लेखिका की नजर न पड़ी हो। वरना तो इन्हें अपनी व्यथा-कथा खुद ही कहनी पड़ती है। हमारे नायक वे ही हो सकते हैं जो चिकने-चुपड़े हों, आकर्षक हों, जिनके घर साफ-सुथरे, महंगी चीजों से भरे हों। क्योंकि दर्शकों के बारे में समझा जाता है कि वे ऐसी ही चीजें देखना चाहते हैं। यही नहीं, पाकिस्तान तक में इन कर्मियों की कोई सुध नहीं ली जाती, बल्कि धर्मांतरण के लिए भी अन्य हिंदुओं के मुकाबले, इन्हें नहीं चुना जाता।

इनके बारे में माना ही यह जाता है कि अगर इन्होंने अपना काम छोड़ दिया, ये भी कुलीन काम करने लगे, तो बेचारे सफाईपसंद लोगों के घरों का कूड़ा कौन उठाएगा! उनका घर गंदा दिखेगा तो प्रदूषण और बीमारियां फैलेंगी न! देश खतरे में आ जाएगा! इसलिए हर हाल में इन्हें बनाए रखना है और गरीब रखना है। कम साधन होंगे तो ये कभी मुंह नहीं खोल पाएंगे। मामूली रोटी की चिंता में ही जीवन बीत जाएगा। और वैसे भी इनका जीवन कितना सस्ता है। मेनहोल में उतर कर सफाई करते हैं और जीवन चला जाता है। जबकि मेनहोल में किसी आदमी को उतारना कानूनन अपराध है। इसी प्रकार तमाम प्रतिज्ञाओं के बावजूद कि कोई सिर पर मैला नहीं ढोएगा, आज भी एक अनुमान के अनुसार देश में छब्बीस लाख लोग सिर पर मैला ढोते हैं। और इनकी सबसे अधिक संख्या उत्तर प्रदेश में है। आखिर ऐसा क्यों, जबकि सिर पर मैला ढोना भी कानूनन अपराध है।

सफाईकर्मी खबरों में तभी आते हैं, जब वे कूड़ा उठाने से मना कर देते हैं। और यह मना भी कैसी कि वे अपने लिए कोई आसमान नहीं मांगते। वे सिर्फ समय पर अपनी पगार और समय से पदोन्नति मांगते हैं। इसी के लिए वे विरोध-प्रदर्शन का तरीका अपनाते हैं कि अपना काम बंद कर दें। अब समाज ने उन्हें कूड़ा उठाने का काम सौंपा है तो उनके काम छोड़ते ही चारों ओर कूड़ा बिखरा दिखाई देगा ही। चैनल उसे दिखा कर हाय-हाय करते रहें तो भी क्या! सोचिए कि किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाले और लाखों कमाने वाले का काम अगर बिना पगार के नहीं चलता तो वे जो अस्थायी कर्मचारी हैं और महीने के कुछ हजार कमाते हैं, उनका काम कैसे चले? इस पर कई सरकारों का यह हास्यास्पद तर्क कि इनकी पगार देने के लिए पैसा नहीं है, बहुत शर्मनाक लगता है। बाकी संसार के हर खर्च, और बहुत-से ऐसे खर्च जिनके बिना भी काम चल सकता है उनके लिए पैसा है, इनकी पगार देने के लिए क्यों नहीं? समाज का यह वंचित तबका अपने जायज हक मांगने उठ खड़ा होता है, तो इसमें आखिर गलत क्या है!

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