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सरकार की नाक के नीचे भी नहीं बनी डिजिटल की साख

कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर। समय पाए तरुवर फले, केतक सींचो नीर। यह दोहा सरकार के नकदीरहित फैसले के साथ भी लागू होती है और हमारे जैसे लोगों के साथ भी, जो नकदीरहित व्यवस्था को तुरंत परखने लगे।

Author February 25, 2017 02:25 am
पीएम मोदी लंबे समय से डिजिटल इंडिया का समर्थन कर रहे हैं।

कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर। समय पाए तरुवर फले, केतक सींचो नीर। यह दोहा सरकार के नकदीरहित फैसले के साथ भी लागू होती है और हमारे जैसे लोगों के साथ भी, जो नकदीरहित व्यवस्था को तुरंत परखने लगे। फिलहाल हमारे परखने का मकसद यह देखना नहीं कि यह व्यवस्था कितनी कारगर है, बल्कि यह देखना है कि सरकार की कोशिशें कितनी ईमानदार हैं, जो चाहती है कि गांव से लेकर शहर तक का हर खासो-आम नकदीरहित लेनदेन करे। पर शायद यह सच ज्यादा भारी है कि दीया तले अंधेरा होता है। पेश है मध्य फरवरी तक की हालत पर एक रिपोर्ट :

दिल्ली के इंडिया गेट के पास है केंद्रीय सचिवालय। यहां शास्त्री भवन, कृषि भवन, रेल भवन जैसे तमाम अहम केंद्रीय भवन हैं, जहां भारत सरकार के मंत्रालयों के कार्यालय हैं। इन मंत्रालयों की अपनी-अपनी कैंटीन है। कोशिश हुई जानने की कि देश को नकदी रहित लेने देन की नसीहत देने वाली सरकार के विभागीय कैंटीन कितने डिजिटल हुए हैं। इस जिज्ञासा ने मानव संसाधन विकास, सूचना एवं प्रसारण, कानून, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता, पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस, खान, कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय के कैंटीनों के चक्कर लगवाए। अंदर जाने पर देखा कि सिर्फ एक मंत्रालय की कैंटीन नकदीरहित लेन-देन के लिए तैयार हो पाई है।

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक मंत्रालय के तहत दो कैंटीन हैं, एक अनुराधा विभागीय कैंटीन और एक निजी कैंटीन (बिकानो) जहां नकदीरहित लेन-देन अपनाया गया है। अनुराधा में सूचना लगी है कि 2 जनवरी से केवल पेटीएम और कार्ड भुगतान स्वीकार्य है। इन दो को छोड़ कर किसी भी मंत्रालय के कैंटीन में नकदीरहित लेनदेन की व्यवस्था शुरू नहीं हुई है। यहां तक कि कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय की कैंटीन भी नकदीरहित नहीं हो पाई है। यह कैंटीन एक निजी एजंसी के हवाले है। हां, यहां नरेंद्र मोदी के कैशलेस संबंधी संदेश का एक बोर्ड जरूर दिखा।
इन विभागीय कैंटीनों में लोगों के साथ बातचीत से यह अहम बात सामने आई कि जिस एक सरकारी कैंटीन ‘अनुराधा’ को नकदीरहित किया गया है, वहां की बिक्री एक चौथाई रह गई है। हालत यह है कि ज्यादातर समय कुर्सियां मेज पर चढ़ा कर रखी होती हैं। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की कैंटीन के एक कर्मचारी ने कहा, ‘2 रुपए की चाय के लिए कौन करेगा पेटीएम? या तो कैंटीन चला लें या नकदीरहित कर लें, क्योंकि सरकार की तरफ से कोई सबसिडी नहीं, कैंटीन का संचालन बिक्री से होने वाली कमाई से होता है’। एक दूसरे कर्मचारी ने कहा, ‘हमारे कैंटीन के लिए फिलहाल कोई ऐसा आदेश नहीं है, अभी तक इस बारे में कैंटीन कमिटी की बैठक भी नहीं हुई है’। हालांकि, उस कर्मचारी ने बताया कि कैंटीन के ज्यादातर सामान चेक के माध्यम से केंद्रीय भंडार से खरीदे जाते हैं। डिजिटल साक्षरता अभियान चला रहे मानव संसाधन विकास मंत्रालय की कैंटीन में कार्ड से भुगतान की पेशकश पर खाना परोसने वाले ने कहा, ‘अभी यहां डिजिटल भुगतान की व्यवस्था नहीं है’। उसने सलाह दी कि 15 रुपए के खाने के लिए कोई 2 रुपए अतिरिक्त क्यों देगा। वहीं, खान मंत्रालय की कैंटीन के कर्मचारी ने बताया, ‘अभी तक नकदीरहित के संबंध में कोई विभागीय आदेश नहीं है, अभी तो खरीद-बिक्री सभी नकद से होती है’।

देश को डिजिटल इंडिया में बदलने की केंद्रीय भूमिका निभा रहे इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव डॉक्टर अजय कुमार ने कहा, ‘विभाग का अंदरूनी कामकाज पहले से ही लगभग डिजिटल मोड में है। आठ नवंबर के बाद जो फैसले लिए गए उनमें कैंटीन को नकदीरहित बनाना और हाल ही में शुरू ई-सर्विस फीडबैक है’। बकौल कुमार, ‘विभाग में सभी भुगतान 100 फीसद इलेक्ट्रॉनिक हैं, वहीं संवाद 80 फीसद, प्राप्तियां 70-80 फीसद, खरीद 100 फीसद, प्रॉपर्टी रिटर्न 100 फीसद कैशलेस है। हालांकि फाइलों का मूवमेंट ई-आॅफिस के जरिए है, लेकिन यूजर फ्रेंडली नहीं होने के कारण अभी यह आधे से भी कम है’।

नकदीरहित बनाई गई इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की कैंटीन का जायजा तो नहीं लिया जा सका, लेकिन नोटबंदी और नकदीरहित भुगतान के फरमान से प्रभावित हुई ‘अनुराधा कैंटीन’ की हालत जानने के बाद गांव से लेकर ढाबेवालों तक का दर्द समझा जा सकता है। इस हालत में ही यह सवाल उभरता है कि अर्थव्यवस्था के हाशिए पर खड़े लोग इस नकदीरहित के सपने में कैसे शामिल हों, खासकर तब जब सपना जबरन दिखाया जा रहा हो?

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