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बेबाक बोलः नगदी पर कब्जा- पहरे के पार

जिस फैसले को आपने ऐतिहासिक बताया, उसका असर कितना ऐतिहासिक हुआ, यह आप भी जानते हैं और अब दुनिया भी। सबसे ज्यादा इस देश की वह जनता जानती है, जिसने इसके असर को झेला, लेकिन उसे समझने के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा गया था, सिवा भ्रम का शिकार होने के।

Author February 25, 2017 2:08 AM
नोटबंदी के बाद हांफते बाजार के बरक्स सेहतमंद सरकार के विरोधाभास पर इस बार का बेबाक बोल। (प्रतीकात्मक तस्वीर)

नोटबंदी के मसले पर जब आरबीआइ गवर्नर उर्जित पटेल की संसदीय समिति के सामने पेशी हुई और वे इस बारे में कोई ठोस जवाब देने में नाकाम हो रहे थे तो पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उनके लिए ‘रेनकोट’ बने और असहज सवालों से उनकी रक्षा की। तीन महीने बाद भी मंद पड़े बाजार और लोगों को जारी दिक्कतों के सवालों के बरक्स महाराष्टÑ निगम चुनावों में भाजपा की बंपर जीत इशारा कर रही है कि इस फैसले का बहुत ज्यादा राजनीतिक प्रभाव उस पर नहीं पड़ा है। उद्योगपति राजीव बजाज जब नोटबंदी के फैसले के बाद ‘मैड इन इंडिया’ जैसा जुमला इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हो जाते हैं तो थोड़े समय बाद चुनावों में जनता के समर्थन के लिए प्रधानमंत्री महाराष्टÑ और ओड़ीशा की जनता का आभार जताते हैं। नोटबंदी के बाद हांफते बाजार के बरक्स सेहतमंद सरकार के विरोधाभास पर इस बार का बेबाक बोल।

जिस फैसले को आपने ऐतिहासिक बताया, उसका असर कितना ऐतिहासिक हुआ, यह आप भी जानते हैं और अब दुनिया भी। सबसे ज्यादा इस देश की वह जनता जानती है, जिसने इसके असर को झेला, लेकिन उसे समझने के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा गया था, सिवा भ्रम का शिकार होने के। यानी असर की यह शक्ल भी ऐतिहासिक ही रही। और जाहिर है, ऐतिहासिक कदमों की पड़ताल लंबे समय तक और व्यापक दायरे में होती है। चुनावों के दौरान पंजाब में घूमते वक्त पहली बार पंजाब के साथ पूर्वांचल का रिश्ता शिद्दत से महसूस हुआ और इसका श्रेय जाता है नोटबंदी को। पंजाब की पूंजी पर जब पहरा लगा तो उत्तर प्रदेश और बिहार के श्रम का भुगतान नहीं हुआ। नोटबंदी के कारण श्रम और पूंजी का गठजोड़ टूटा तो हरियाली क्रांति वाली जमीन के मेहनतकश मन ने भी बगावत कर दी। पंजाब से दिल्ली जाने के राजमार्ग पर भी राजसत्ता के ऐतिहासिक दावे बढ़-चढ़ कर अपनी नाकामी की गाथा गा रहे थे। टोल खिड़की पर ‘पवित्र’ गुलाबी दो हजारी नोट देख कर कर्मचारी ने झल्लाते हुए कहा कि छुट्टे दीजिए और आगे बढ़िए। बिना छुट्टे के जल्दी आगे नहीं बढ़ पाने की सजा अपने पीछे खड़े वाहन चालकों को दी। दो हजारी को नकारने की यह झल्लाहट ही बता रही है कि अभी बाजार में पूंजी की तरलता की वापसी नहीं हुई है, अभी ‘क्या हुआ तेरा वादा…’ वाले बहुत से सवाल बाकी हैं।

जरा याद करें दो दशक पहले के उस नारे को, जब उपभोक्ता को शहंशाह बताने वाली, ‘यही है राइट च्वाइस बेबी’ वाली नवउदारवादी संस्कृति हम सबके अंदर रचने-बसने लगी थी। कंपनी के उत्पादों पर कीमत दर्ज होती थी, जिसमें अधिकतम खुदरा मूल्य विक्रेता और क्रेता के बीच संबंध बनने का बड़ा आधार बना था। ‘चलिए सर/मैडम, न आपकी, न मेरी… आप इसे 500 में ले लीजिए…’। ‘न तेरा-न मेरा’ का एक आर्थिक उदार संबंध बना था। देश और दुनिया को चलने के लिए बेचना-खरीदना पहली शर्त-सी लगने लगी थी। उपभोक्ता की क्रयशक्ति बढ़े और बाजार का इंजन चले।

नोटबंदी के बाद इसी ‘तेरी न मेरी’ के उदार संबंध पर पहला वार हुआ। कनॉट प्लेस के एक हस्तकरघा मंडप से जब अपनी पसंद का एक बैग लिया तो विक्रेता के साथ 400 रुपए कम करने की सहमति पर पहुंचे। लेकिन जैसे ही कहा कि क्रेडिट कार्ड से भुगतान करूंगा तो हमारे बीच का रिश्ता तल्खी से टूटा और उसने कहा कि तब आपको उतने ही पैसे देने होंगे, जितना इस बैग पर लिखा है। अब क्रेता और विक्रेता के बीच राजसत्ता का इंस्पेक्टर आ चुका था और हम एक-दूसरे पर झल्ला रहे थे। नोटबंदी के तीन महीने बाद हर तरफ महंगाई का असर दिख रहा है। कनॉट प्लेस के एक बेकरी से अपनी पसंदीदा पेस्ट्री खरीदी तो वह तीन महीने पहले से ज्यादा महंगी थी। जिन बेकरी उत्पादों के मूल्य नहीं बढ़े थे, उनकी मात्रा में कमी कर दी गई थी। नोटबंदी का सबसे बुरा असर अंतिम खुदरा विक्रेता पर ही पड़ रहा है। जो एक दिन में 80 साड़ी बेच रहा था, अब वह 30 ही बेच रहा है। इसके साथ ही मुनाफे के जुगाड़ का तिकड़म ही है। चिप्स का जो पैकेट पहले 20 रुपए में बिक रहा था, उसकी कीमत अब भी वही है, लेकिन पैकेट में 70 ग्राम की जगह अब 35 ग्राम चिप्स है। बाकी की जगह भर रही है नोटबंदी की हवा।

फिलहाल एक ‘रिवर्स इकोनॉमी’ का दौर दिख रहा है। पहले कंपनियां खुदरा दुकानों से कहती थीं कि ज्यादा से ज्यादा माल बेचो और बाद में मुनाफा साझेदारी को लेकर करार होता था। लेकिन अब उल्टा हो रहा है। दुकानदार या तो माल महंगा बेच रहे हैं या गुणवत्ता और मात्रा के साथ समझौता कर रहे हैं। इसके साथ ही सरकार नोटबंदी का सबसे ज्यादा फायदा रियल एस्टेट में बता रही है। लेकिन अभी जो मकानों की खरीद-बिक्री में मंदी आई है, वह क्षणिक है। फिलहाल क्रेता और विक्रेता दोनों चुप बैठा हुआ है, जिसे आप सस्ता होने का नाम दे रहे हैं। लेकिन बैंकों के लोन सस्ते होने और पुरानी संपत्तियों की बिक्री के बाद जो नए मकान बनेंगे, वे और ज्यादा महंगे होंगे। दो साल बाद इस क्षेत्र में जो हालात बिगड़ेंगे, उसे संभालना आसान नहीं होगा।

आठ नवंबर को अपने भाषण में नोटबंदी को कालेधन के खिलाफ ‘महायज्ञ’ करार देते ही प्रधानमंत्री ने इसे ‘पवित्रता’ की श्रेणी में रख दिया। सामाजिक लोकाचार पर आपने पवित्रता का जो बोझ लादा, उसका असर आज बाजार के सबसे अहम निर्माण क्षेत्र में भी दिख रहा है। नौकरीपेशा आदमी एक बीएचके का घर 25 लाख में खरीद रहा है तो उसे चार से पांच लाख रुपए कालेधन के रूप में देने ही पड़ रहे हैं। विक्रेता के बीच बिचौलिया बने कारोबारी की सेहत पर असर नहीं पड़ा है, लेकिन उस ग्राहक की परेशानी बढ़ गई, जिसे पांच लाख रुपए को सफेद रंग देना है। राज्य की ‘पवित्रता’ की महत्त्वाकांक्षा का बोझ बाजार का लोकाचार नहीं उठा पा रहा है और इन सबमें आम आदमी ही पिस रहा है। हर दिन आते नए फरमान की तीन लाख से ज्यादा नकद पर जुर्माना या उतने से ज्यादा पर सजा से क्रेता और विक्रेता खौफजदा हैं। लोग कुछ भी निवेश करने के पहले इस बात से डर रहे हैं कि पता नहीं सरकार कब और कौन-सा फरमान जारी कर दे। खरीद और बिक्री में इतनी भयानक गिरावट देश की अर्थव्यवस्था पर कैसा असर डाल रही होगी…।

दूरदराज के इलाकों की तो बात ही छोड़ दें, दिल्ली के कई अहम इलाकों में भी एटीएम मशीनों के ‘अच्छे दिन’ अभी नहीं लौटे हैं। सरकार के आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास सौ से ज्यादा दिन बीत जाने के बाद भी लोगों को सलाह देते हैं कि एटीएम से उतने ही पैसे निकालें जितनी जरूरत हो। विमुद्रीकरण के आंकड़ों और फायदों के बारे में एक ओर संसदीय समिति के सामने आरबीआइ के गर्वनर उर्जित पटेल कुछ बोल नहीं पाए, वहीं 2017 के आम बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली यह बताने में नाकाम रहे कि देश की 85 फीसद मुद्रा को अचानक से चलन से बाहर कर देने के फैसले का हासिल क्या रहा।
हां, नोटबंदी का फायदा जिसने सबसे अहंकारी तरीके से गिनाया, वे हैं भारत में एक मोबाइल भुगतान कंपनी के मालिक। 2010 में बनी इस कंपनी ने आठ नवंबर को मोदी के नोटबंदी के एलान के तुरंत बाद नौ नवंबर को कई अखबारों में विज्ञापन दिया और इसमें प्रधानमंत्री की तस्वीर भी इस्तेमाल की गई। दावा किया गया है कि नोटबंदी के बाद कंपनी का मुनाफा 300 फीसद बढ़ गया। पिछले कुछ समय से इसके जरिए रोजाना लगभग 120 करोड़ रुपए की लेनदेन हो रही है। फिलहाल, प्रधानमंत्री की तस्वीर का इस्तेमाल करने के लिए यह कंपनी सरकार की ओर से नोटिसशुदा है, जिसका कोई भी विपरीत असर उसके बंपर मुनाफे पर नहीं पड़ने वाला है।

चांदनी चौक से लेकर मुरादाबाद तक के छोटे और मंझोले कारोबारी अब तक प्रभावित हैं, किसान और कामगार बेहाल हैं, कितने ही लोगों की नौकरियां चली गर्इं। हमारे इन तर्कों पर सरकार सवाल पूछती है कि अगर जनता इतनी ही त्रस्त है तो कोई बड़ा विरोध प्रदर्शन क्यों नहीं हुआ? महाराष्टÑ और ओड़ीशा के निकाय चुनावों में जनता ने नकारा क्यों नहीं?
इस सवाल का जवाब भी उसी उदारवादी व्यवस्था में है, जो लगभग तीन दशकों से हमें एक नागरिक से उपभोक्ता बना चुकी है। जब बाजार शहंशाह बनाता है तो वह अकेला भी करता है। बाजार के पटखनी खाते ही ‘उपभोक्ता’ अकेला महसूस करता है और उसके मन में ‘कुछ नहीं हो सकता’ जैसा भाव घर कर जाता है। और ‘यह कुछ नहीं हो सकता’ वाला भाव उस विचारधारा की परिणति है जब उपभोक्ता बना नागरिक इठलाते हुए कहने लगा था कि ‘कोई नृप होए हमें का हानि’। लेकिन जब नृप के फैसलों से हानि होने लगती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। अब वह अकेला है और उसके पास सत्ता से मोल-भाव की संगठित शक्ति खत्म हो चुकी है।

इसके साथ ही देश को अगर सबसे बड़ा नुकसान हुआ है तो यह कि पिछले सालों में जनतंत्र को लेकर लोगों का भरोसा कम हुआ। राजनीतिक दलों की भेड़चाल वाली नीति उसे दल से हटा कर निज में समेट देती है और अक्सर व्यक्तिवादी बना देती है। इसलिए वह मोदी, केजरीवाल, अम्मा या चिनम्मा का व्यक्तिपूजक बन बैठता है। उसके लिए पार्टी की विचारधारा नहीं, मोदी या अम्मा का चेहरा अहम हो जाता है और जब आप नोटबंदी का विरोध करते हैं तो इसे सीधे मोदी और राष्टÑ के विरोध से जोड़ दिया जाता है। इसलिए नोटबंदी का विरोध निजी विरोध मान लिया गया और यह व्यक्ति का विरोध बन गया, संगठित विरोध बन कर नहीं उभर पाया। नवउदारवादी व्यवस्था में अकेला पड़ा इंसान मुक्ति के लिए संघर्ष की राह नहीं बना पाने की सूरत में मुक्ति का एक मसीही चेहरा खोजता है। फिलहाल तो नोटबंदी का दर्द झेल चुका हर नागरिक अकेला ही खड़ा है। इसलिए सरकार इसे लेकर बेफिक्री दिखा रही है। मगर देखते हैं कि नागरिक का अकेलापन और राज की तानाशाही प्रवृत्ति की बेफिक्री कब तक कायम रहती है।

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