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गुंडागर्दी के बरक्स कश्मीर का सवाल बना दिया

जेएनयू के बाद रामजस मामले के बहाने डीयू में भी राष्ट्रवाद के नाम पर हंगामा छेड़ दिया गया है। पिछले हफ्ते हुई हिंसा के बाद तिरंगा यात्रा और ह्यसेव डीयूह्ण की मुहिमों के बीच दिल्ली विश्वविद्यालय आंदोलनरत है।

DU Protests: दिल्ली पुलिस हेडक्वार्टर के सामने प्रदर्शन करते एबीवीपी कार्यकर्ता। ( Photo Source: PTI)

जेएनयू के बाद रामजस मामले के बहाने डीयू में भी राष्ट्रवाद के नाम पर हंगामा छेड़ दिया गया है। पिछले हफ्ते हुई हिंसा के बाद तिरंगा यात्रा और सेव डीयू की मुहिमों के बीच दिल्ली विश्वविद्यालय आंदोलनरत है। भगवा खेमा आरोप लगा रहा है कि वामपंथी छात्रों के देशद्रोही नारों के कारण ऐसी नौबत आई। इस मामले में भाकपा माले नेता व आॅल इंडिया प्रोगेसिव वीमेंस एसोसिएशन की सचिव कविता कृष्णन का कहना है कि एक खास साजिश के तहत रामजस हिंसा मामले को भाजपा बनाम आइसा की लड़ाई कहा जा रहा है। यह साधारण शिक्षकों और छात्रों पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का एकतरफा हमला था। यह पढ़ने-पढ़ाने, सेमिनार करने जैसे विश्वविद्यालय की पूरी प्रक्रिया पर हमला था। यह बात साजिश की तरह ही फैलाई जा रही है कि आइसा जेएनयू से डीयू की तरफ आई और हिंसा हुई। अगर इस हिंसा की वजह को लेकर आइसा पर सवाल उठा रहे हैं तो माफ कीजिएगा कि यह उसी तरह की मानसिकता है जिसमें बलात्कार की वजह लड़कियों को ही बताया जाता है।

कृष्णन कहती हैं कि यह मत भूलें कि जोधपुर और उदयपुर विश्वविद्यालय में भी अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले हुए हैं। मुंबई, पुणे, हैदराबाद जहां भी सोचने-समझने वाले छात्र दिख रहे हैं वहां उनकी आवाज बंद करने की कोशिश हो रही है। आप जरा एबीवीपी के एक नेता के कुछ दिनों पहले किए ट्वीट पर गौर करें। उन्होंने अपने ट्वीट में कहा था कि अगर जेएनयू जैसी संस्था नहीं होती तो भारत में हिंदू राष्ट्रवाद कब का आ गया होता। तो आप देखिए कि हिंदु राष्ट्रवाद के एजंडे की राह में रोड़ा कौन बन रहा है…विश्वविद्यालय। इसलिए वे इस जगह को ही खत्म करना चाहते हैं। जेएनयू से लेकर डीयू तक सरकार, एबीवीपी और पुलिस का मजबूत रिश्ता दिखता है। यह रिश्ता रोहित वेमुला के मामले में भी दिखा। एबीवीपी को इस बात का भरोसा है कि उसके साथ मोदी सरकार है और उसका बाल भी बांका नहीं होगा। यहां पर हम फासीवाद की आहट सुन सकते हैं।

वामपंथी नेता ने कहा कि मुख्यधारा के मीडिया ने गुंडागर्दी के सवाल को कश्मीर का सवाल बना दिया। जहां तक कश्मीर और बस्तर पर नारेबाजी का सवाल है तो यह घेरेबंदी भी एक खास मानसिकता के साथ की जा रही है। विश्वविद्यालय परिसर में नारेबाजी की बात तो छोड़ दीजिए ये तो सेमिनार करने की भी आजादी छीन रहे हैं। बस्तर और कश्मीर की बात छोड़ें लखनऊ विश्वविद्यालय में आॅनर किलिंग पर सेमिनार में मुझे बोलना था, और वहां बोलने नहीं दिया गया। आॅनर किलिंग पर बोलने को भी देशद्रोह से जोड़ दिया गया। इन्होंने सिद्धार्थ वरदराजन को भी नहीं बोलने दिया था।

शिक्षा के निजीकरण के सवाल पर मोदी सरकार पूरी तरह छात्र विरोधी है। एबीवीपी चाहती है कि डीयू में आंदोलन की जगह नहीं बचे। और जब यहां पूरी तरह सन्नाटा छा जाए तो इसे निजीकरण की राह पर ले जाया जाए। लेकिन हम इनकी मंशा पूरी नहीं होने देंगे। हम विश्वविद्यालयों में हर मुद्दे पर बहस की संस्कृति बनाए रखेंगे। चाहे वो बस्तर का मुद्दा हो या कश्मीर का या औरतों की आजादी का। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को इस बात की इजाजत नहीं देंगे कि वह शिक्षकों के पेट और किडनी पर लात मार कर उन्हें चुप कराने की कोशिश करे।

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