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बेबाक बोलः इतिहास का पहिया, जंतर-मंतर

सोशल मीडिया पर पिछले कुछ सालों से एक खास दिन अमिताभ और रेखा से जुड़े संवादों के बीच सिंहासन खाली करो कि जनता आती है का राजनीतिक संवाद भी गूंजता है।

जय प्रकाश नारायण

इंदिरा के अथाह प्रभाव के खिलाफ निकली जेपी की हुंकार के साथ ही भारतीय राजनीति में विपक्ष, विकल्प यानी जनतंत्र का जन्म होता है। सिंहासन खाली करो कि जनता आती है के गान के साथ एक ऐसा जंतर मंतर खड़ा हो जाता है जो सत्ता की अट्टालिका ढहा देता है। वह जंतर मंतर कहता है कि लोकतंत्र में मिला बहुमत राजा नहीं प्रजा का आख्यान है। सत्ता के गलियारे से खेतों-खलिहानों, फावड़े, कुदालों को दूर करने की अहंकारी प्रवृत्ति के खिलाफ जेपी संपूर्ण क्रांति का नारा देते हैं। जेपी और सन 74 भारतीय राजनीतिक इतिहास का वह बिंदु है जहां प्रतिपक्ष का जंतर मंतर खड़ा होता है। लेकिन हिंदुस्तानी राजनीति के इस मील के पत्थर की विचारधारा आज कहां है? उनके हुंकार के बाद विश्वविद्यालयों से निकले छात्र नेता आज भारतीय राजनीति के ज्येष्ठों में से हैं लेकिन अब वे जेपी के जंतर मंतर के साथ खड़े नहीं दिखते। वे तो केंद्रीय सत्ता को अजेय घोषित कर 2019 में विपक्ष बनने से इनकार कर सत्ता का पक्ष बन जाते हैं। जेपी, उनकी विचारधारा और उनके वारिसों पर इस बार का बेबाक बोल।

सोशल मीडिया पर पिछले कुछ सालों से एक खास दिन अमिताभ और रेखा से जुड़े संवादों के बीच सिंहासन खाली करो कि जनता आती है का राजनीतिक संवाद भी गूंजता है। अक्तूबर के दूसरे हफ्ते में थोड़ा आगे-पीछे कर संपूर्ण क्रांति वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण पर हिंदी पट्टी का कलमनवीस लिख ही बैठता है। जेपी जयंती पर एक मौका मिलता है भारतीय राजनीति के कल, आज और आने वाले कल पर बात करने का।
आखिर जेपी होने के क्या मायने हैं। क्या उनकी संपूर्ण क्रांति मध्य अक्तूबर में बस श्रद्धांजलि क्रांति भर है। इक्कीसवीं सदी को प्लास्टिक का युग भी कहा गया गया है। यह लौहपुरुषों नहीं बल्कि प्लास्टिक की तरह उन लचीले पुरुषों का भी काल भी है जो खास खबर पर प्रतिक्रिया देने से बचने के लिए कह देते हैं कि हमने तो आज का अखबार ही नहीं पढ़ा। जिस बिहार से दूसरी आजादी और संपूर्ण क्रांति का नारा उठा था वहां आज बाल विवाह और दहेज प्रथा (कृपया हमारी समझ से इसे कुप्रथा ही पढ़ें) के खिलाफ अभियान शुरू है। ऐसे अभियान की जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। लेकिन आज भी आपके वारिस इन बुनियादी कदमों से ही जूझ रहे हैं। दूसरी, तीसरी के बाद पता नहीं कितनी आजादी की मांग जरूरी है। आज आजादी गान के कोरस में जेपी का जयकारा तो है। लेकिन सवाल यह है कि भारतीय राजनीति में दशकों पहले विकल्प की मांग करने के बाद हम ठहर क्यों गए? सरदार सरोवर बांध की डूब में आने वाले पूछते हैं कि क्या हम भारतीय गणराज्य का हिस्सा नहीं हैं, हम विकल्प से बेदखल क्यों? आपातकाल के समय जिन विश्वविद्यालयों से निकले छात्रों ने सत्ता का दम निकाला था, आज उन्हीं परिसरों में छात्राओं पर लाठियां बरसाई गर्इं। विश्वविद्यालय के कुलपति सरकार से शैक्षणिक अनुसंधान के लिए अनुदान नहीं बल्कि तोप और मिग विमान मांगने में ज्यादा रुचि रखने लगे हैं और इन सबके साथ दाना मांझी जैसे कई लोग अपने कंधे पर इंसानियत का शव रख हमारे विकास के आईने के सामने खड़े हो जाते हैं। इन सबके बीच हम भारतीय राजनीति में उसी गुमशुदा विकल्प की तलाश करते हैं जिसका नारा सबसे पहले जेपी ने दिया था।

आज जिस अमेरिकी विश्वविद्यालय में खुद को खुद का विकल्प बनाने की बात बोलकर राहुल गांधी ने तालियां बटोरीं जेपी भी बौद्धिक रूप से उसी जमीन की पैदाइश थे। यहां पर यह ध्यान रखें कि हमारे गांधी और नेहरू विदेशों से तैयार होकर आ रहे थे और जेपी भी सात समंदर पार से मार्क्सवादी चेतना लेकर लौटते हैं। यह वह दौर था जब समाजवाद एक वैश्विक अवधारणा बन चुकी थी। उपनिवेशवाद के उस चरम काल में समानता का सवाल पूरी दुनिया को प्रभावित कर रहा था। इसी उपनिवेशवाद से संघर्ष के लिए समाजवाद का औजार पैना हो रहा था और इसके साथ ही वर्गीय अवधारणा वैश्विक बहस-मुसाहिब का हिस्सा थी। साम्राज्यवादियों की सांठगांठ के बरक्स उपनिवेशों की पीड़ा भी साझीदारी कर रही थी। जेपी हिंदुस्तान की जमीन पर वर्गीय मार्क्सवादी चेतना के साथ लौटते हैं। यहां वे गांधी से भी प्रभावित होते हैं। लेकिन जेपी यूरोपीय समाजवाद में भारतीयता के समावेश के साथ एक अन्य की रचना कर रहे थे। समाजवाद और उपनिवेशवाद के बीच यह अन्य कौन था? जब तक आपकी जमीन पर अंग्रेज हैं आप उसे अन्य मान सकते हैं। लेकिन अंग्रेजों के जाने के बाद इस समाजवाद में भारतीयता की अवधारणा को समाहित करना था। इसलिए उनकी क्रांति की अवधारणा में क्रांति के साथ जाति और धर्म भी है।

भारतीयता के मुख्य संदर्भ में आध्यात्मिकता समाहित है। इसके बाद ही इसमें गांधीवाद बनाम समाजवाद का मुलम्मा चढ़ाया जाता है। बराबरी का रास्ता गांधीवाद में दिख जाता है और जेपी खुद को सक्रिय संसदीय राजनीति से दूर कर लेते हैं। अब वे विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के साथ जुड़ते हैं और उनकी वैचारिकी भी ग्रहण करते हैं। तभी इंदिरा गांधी की निरंकुश सत्ता के रूप में तानाशाही सरकार का खतरा सामने दिखता है। जेपी निरंकुश राज्य को सबसे बड़ खतरा मानते हैं। इसी खतरे के खिलाफ जेपी राजनीति की दूसरी पारी खेलते हैं। कांग्रेस के खिलाफ उठे दूसरी पारी वाले जेपी गांधी और विनोबा की वैचारिकी से लैस हैं। मार्क्सवादी मुठभेड़ों की धूल झाड़ भोजपुरी में आंदोलन की भाषा बोलकर लोगों को आंदोलन के लिए गोलबंद कर रहे जेपी अब खालिस भारतीय समाजवादी थे। निरंकुशता के खिलाफ होना प्राथमिकता वाली वैचारिकी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ उनके लिए अछूत नहीं था।

गांधी की हत्या के बाद जो संगठन हाशिए पर चला गया था, आजादी के बाद भारतीय राजनीति में विकल्प की पहली लड़ाई में जेपी उसके साथ खड़े हुए। इस लोकनायक के साथ राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ को विकल्प की वैधानिकता मिली। भारतीयता के नजरिए वाली वैचारिकी के कारण ही कांग्रेस के खिलाफ लड़ाई में वर्ग नहीं विचार देखा गया और मार्क्सवादी इससे दूर रहे। गैर-कांग्रेसवाद के खिलाफ बजरिए संघ सत्तामार्ग की ओर कदमताल कर चुका था। भारतीयता वाले समाजवाद की संपूर्ण क्रांति विरासत की देन कहें कि 2011 में जब जेपी के जयकारे और दूसरी आजादी की मांग के लिए अण्णा हजारे की अगुआई में दिल्ली में मंच सजा तो अखंड भारत के नक्शे के साथ। कांग्रेस के विकल्प की मांग में अण्णा के साथ संघ के ट्रेडमार्क वाले झंडे और नारे ही गूंज रहे थे। कांग्रेस के खिलाफ गांधी और जेपी के उदाहरणों के बीच मई 2014 में भारत में प्रचंड बहुमत से भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनती है और संघ का स्वर्णकाल शुरू होता है।

2014 के विकल्प की दौड़ में जेपी की विचारधारा के प्रतीक पुरुष अपनी लड़ाइयां हार रहे थे। जयप्रकाश के वारिस कहे गए इन प्रतीक पुरुषों की विशेषता रही कि जब चुनावी जातिगत समीकरण गड़बड़ होते हैं तो सांप्रदायिकता और फासीवाद पर सारा ठीकरा फोड़ रो लेते हैं। इनके लिए तो सप्त क्रांति और संपूर्ण क्रांति एक प्रतीक और ओट भर रह गया है। बिहार से चलनेवाली रेलगाड़ी ‘सप्त क्रांति’ और ‘संपूर्ण क्रांति’ जिन नागरिकों को ढोकर दिल्ली लाती है उसे आपके सहयोगी एम्स के बाहर जुटनेवाली भीड़ करार देते हैं और आप शायद अखबार में उस खबर को पढ़ने से वंचित रह जाते हैं। जिस राजनीतिक जमीन ने विकल्प और क्रांति का नारा दिया आज वहां से आए लोग भीड़ करार दिए जा रहे हैं और जेपी के वारिस मौन क्रांति कर रहे हैं। जिनके खिलाफ जनता से वोट मांग कर सरकार बनाई बाद में उनके साथ सरकार बना ली। जेपी सत्ता के केंद्रीकरण के खिलाफ थे और उनके नामलेवा केंद्र के आगे नतमस्तक। जेपी ने केंद्र की निरंकुशता के खिलाफ संपूर्ण क्रांति का नारा दिया तो उनके वारिसों ने जनादेश को धता बता लोकतंत्र के लिए संपूर्ण भ्रांति रच दी। लोहिया और जेपी के वे वारिस केंद्र की निरंकुशता के खिलाफ क्या संघर्ष करेंगे जो चुनाव आते-आते नेता की पदवी से खिसक कर सिर्फ पिता बनकर रह जाते हैं। जो अपने कुटुंब कलह से बाहर निकल ही नहीं सकते वे विश्व नागरिकता का सपना कैसे पूरा करेंगे।

आज के दौर में लोकनायक की त्रासदी यह है कि संघ से लेकर मार्क्सवादी तक उनके जयकारे लगाते हैं लेकिन वे शुद्ध रूप से किसी को भी स्वीकार्य नहीं हो पाते हैं। दिल्ली में सत्ता के केंद्र वाली सड़क पर एक इमारत पर लिखा मिलता है, ‘लोहिया के लोग’। सोचता हूं कि ‘इतिहास का पहिया’ किस कदर घूमा है कि लोहिया और जेपी की विचारधारा के लोग जहां विखंडित विकल्प के खांचे में ही बिठा दिए गए हैं और उनके सहारे वैधानिकता का जामा पहनी पार्टी फिलहाल विकल्प की विजेता बनी हुई है। लगता है कि 1974 को भारतीय राजनीति का संग्रहालय बना दिया गया है जहां शीशे के पीछे उनकी विचारधारा खुदी हुई है और शीशे के सामने लिखा है, छूना मना है। कहते हैं कि इतिहास अलग रूप में खुद को दोहराता है। लेकिन इतिहास के पहिए को 74 से आगे बढ़ाने के लिए जेपी की विचारधारा को संग्रहालय के शीशे से बाहर निकालना जरूरी है। जेपी के वारिस उन्हें सिर्फ अक्तूबर में नहीं बल्कि चुनावी गठबंधन और चुनावी घोषणापत्रों के वक्त भी याद करें। हम जेपी को जितना जड़ बनाएंगे उतना ही पीछे जाएंगे। जेपी को पढ़ें, जेपी को गढ़ें और 74 के साथ आगे बढ़ें। वह 74 सिर्फ निरंकुश सत्ता के अहंकार नहीं बल्कि विकल्प और प्रतिपक्ष की आवाज का भी प्रतीक है। इंदिरा का अहंकार और जेपी का हुंकार तो भारतीय राजनीति में जंतर मंतर का जन्म है। जेपी वह जंतर मंतर हैं जिन्हें सत्ता प्रतिष्ठान खुद से जितना दूर करेगा वह उतनी ही जल्दी उसकी बुनियाद हिलाएगा।

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