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राजनीतिः कुश्ती पर भारत का दांव

यह भारतीय कुश्ती के इतिहास का पहला ऐसा मौका है जब सबसे अधिक आठ पहलवान ओलंपिक में क्वॉलीफाइ करके पहुंचे हैं।

Author August 5, 2016 02:49 am
(File Photo)

मनोज जोशी

अगर आठ भारतीय पहलवानों का बड़ा दल क्वॉलीफाइ करके रियो ओलंपिक में भाग लेने जा रहा है तो इसके पीछे इन पहलवानों की कड़ी मेहनत और फेडरेशन की दूरदर्शी सोच रही है। फेडरेशन क्षेत्रीय स्तर पर प्रतियोगिताएं आयोजित करने जा रहा है जिससे ओलंपिक जैसे बड़े आयोजन के लिए पहलवानों की संख्या में इजाफा होता रहे।

यह भारतीय कुश्ती के इतिहास का पहला ऐसा मौका है जब सबसे अधिक आठ पहलवान ओलंपिक में क्वॉलीफाइ करके पहुंचे हैं। यह भी पहला मौका है जब फ्रीस्टाइल, ग्रीकोरोमन और महिलाओं के रूप में तीनों शैलियों में भारतीय पहलवान एक साथ शिरकत कर रहे हैं। इनमें ग्रीकोरोमन शैली में बारह साल बाद भारतीय पहलवानों ने क्वॉलीफाइ किया है।

भारतीय कुश्ती को पिछले दिनों आए संकट से फिलहाल निजात मिल गई है। नरसिंह यादव पहले कोर्ट की लड़ाई जीते और अब डोपिंग की लड़ाई। इससे उनकी ओलंपिक की तैयारियां भी प्रभावित हुर्इं। भारतीय कुश्ती संघ जिस तरह उनकी पैरवी के लिए आगे आया और उसके अध्यक्ष व भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह की पहल पर प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप से नाडा जांच की प्रक्रिया को युद्धस्तर पर तेजी मिली, नेशनल एंटी डोपिंग एजेंसी ने भी स्वीकार किया कि नरसिंह के साथ साजिश हुई, यह वाकया भविष्य के लिए कुश्ती ही नहीं, बाकी खेलों के खिलाड़ियों के लिए भी सबक है। इससे यह भी जाहिर होता है कि खिलाड़ी अपनी तैयारियों के साथ-साथ डोपिंग के डंक से बचने या इसकी साजिश से अपनी हिफाजत खुद करें क्योंकि हर मामले में प्रधानमंत्री बीच-बचाव नहीं कर सकते। नरसिंह के भारतीय दल में शामिल होने की स्थिति में एक पदककी उम्मीद बढ़ गई है क्योंकि वे इस दल में अकेले ऐसे पहलवान हैं जो ओलंपिक में भाग ले रहे पहलवानों में से छह को हरा चुके हैं।

रियो ओलंपिक में साठ से ज्यादा देशों के साढ़े तीन सौ से ज्यादा पहलवान होंगे जो या तो पिछली वर्ल्ड चैंपियनशिप में पहले छह स्थान हासिल करके यहां तक पहुंचे हैं या फिर क्वॉलीफाइ करके उन्होंने ओलंपिक में जगह बनाई है। वाइल्ड कार्ड से प्रवेश करने वाले पहलवानों की संख्या हर शैली में इक्का-दुक्का ही दिखाई देती है। हॉकी में महाद्वीपीय प्रतियोगिता जीतने पर ही ओलंपिक में प्रवेश मिल जाता है लेकिन कुश्ती में ऐसा नहीं है। जिस तरह भारतीय हॉकी टीम ने इंचियोन में पिछले एशियाई खेलों में गोल्ड मेडल जीत कर ओलंपिक का टिकट हासिल किया वहीं कुश्ती में योगेश्वर दत्त को यही उपलब्धि हासिल करने के बावजूद कड़े क्वॉलिफाइंग दौर से गुजरना पड़ा।

तीसरे, ओलंपिक में तीनों शैलियों में छह-छह वजन हैं जबकि वर्ल्ड चैंपियनशिप में कुछ ऐसे वजन भी होते हैं जो ओलंपिक वजन नहीं हैं। उन वजनों में वर्ल्ड चैंपियन बनने के बावजूद पहलवान को ओलंपिक वजन में क्वॉलीफाइ करके आना पड़ता है जिससे एक वजन में दो-दो मौजूदा वर्ल्ड चैंपियन और इतने ही रनर्स-अप एक साथ दिखाई देते हैं। महिलाओं के तिरपन किलो वजन में ऐसी ही कड़ी प्रतियोगिता देखने को मिलेगी जहां तेरह बार की वर्ल्ड चैंपियन और तीन बार की ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट जापान की साओरी योशिदा और अमेरिका की दूसरे वजन से आर्इं वर्ल्ड चैंपियन हेलेन मौजूद होंगी। हेलेन, बबीता को एक क्वॉलिफाइंग मुकाबले में तकनीकी फॉल से हरा चुकी हैं। जाहिर है कि वर्ल्ड चैंपियनशिप में पदकजीत चुकी इस खिलाड़ी की राह इस बार सबसे कठिन है।

प्रो रेसलिंग लीग में अपराजित रह कर सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का पुरस्कार जीतने वाली विनेश फोगट ने तुर्की में पिछले दिनों आखिरी क्वॉलिफाइंग टूर्नामेंट में गोल्ड मेडल जीत कर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं जहां उन्होंने पूरी प्रतियोगिता में पचास अंक जुटाए जबकि केवल तीन अंक उनके खिलाफ बने। जाहिर है कि उनका डिफेंस और अटैक दोनों अच्छे हैं, लेकिन इसी खिलाड़ी को मैड्रिड ग्रां प्री में जूझना पड़ा।
साक्षी मलिक और संदीप तोमर की पहचान बेशक भारतीय कुश्ती में योगेश्वर और नरसिंह यादव जैसी न हो लेकिन टीम के यही ऐसे दो पहलवान हैं जिन्होंने साल भर में अपने खेल को जमीन से अर्श तक पहुंचाया है। दोनों ने मैड्रिड में पदकजीते। दोनों की गणना दो साल पहले अपने वजन के शीर्ष पहलवान के रूप में नहीं हो पाती थी, लेकिन साक्षी ने अपने वजन में अब तक की एकमात्र ओलंपियन और वर्ल्ड चैंपियनशिप की पदक विजेता गीता फोगट को दो बार हरा कर उन्हें हाशिये पर धकेल दिया। क्वॉलिफाइंग प्रतियोगिता के ट्रायल में गीता पर जीत हासिल करके उन्होंने साबित कर दिया कि पीडब्ल्यूएल में उनकी गीता पर जीत कोई तुक्का नहीं थी। उन्हें अपने खेल में जुझारूपन दिखाने की जरूरत है। उनके वर्ग में दस बार की वर्ल्ड चैंपियन और तीन बार की ओलंपिक चैंपियन जापान की काओरी इंचो हैं, और साथ ही मौजूदा यूरोपीय चैंपियन पेट्रा ओली हैं जिन्होंने पिछले दिनों एक अन्य वर्ल्ड चैंपियन ओक्साना हरहेल को हराया है।

इसी तरह संदीप तोमर ने इस साल बैंकॉक में एशियाई चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीत कर लगातार सातवीं बार विदेश से खाली हाथ न लौटने के सिलसिले को बरकरार रखा। लेकिन रियो में उनका असली इम्तिहान है क्योंकि विदेशों में अब तक उन्हें न तो एशियाई खेलों में खेलने का मौका मिला है न ही वर्ल्ड चैंपियनशिप में और न ही ओलंपिक में। उनके वजन में वे मंगोलियाई खिलाड़ी एरडेनबायन बेखाबायर भी हैं जिनसे संदीप तोमर हाल में मैड्रिड में ग्रा प्री प्रतियोगिता में हारे हैं। वर्ल्ड चैंपियन जार्जिया के व्लादीमिर खिनचेनशिवली और रूस के विक्टर लेबेदेव का अनुभव उनके लिए बड़ी चुनौती रहेगा।

योगेश्वर दत्त चौथा ओलंपिक खेल कर भारतीय कुश्ती के इतिहास-पुरुष बनने जा रहे हैं। वे इन खेलों में भाग ले रहे अपने वजन के तीन नामी पहलवानों को पहले ही हरा चुके हैं। उनके वजन का सबसे बड़ा आकर्षण क्यूबाई मूल के इटली के फ्रेंक चैमिजो हैं जो विश्व और यूरोपीय चैंपियन हैं। वहीं नरसिंह अपने वजन में छह पहलवानों को कुल सात बार हरा चुके हैं। यह बात अलग है कि पिछले दिनों मैड्रिड में वे इन्हीं में से एक क्यूबा के लेवान लोपेज से पहली बार हार गए थे। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने लगातार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अपने पदक जीतने के सिलसिले को बरकरार रखा। उनके वजन में तीन बार के वर्ल्ड चैंपियन जोर्डन बैरोग्स और मौजूदा यूरोपीय चैंपियन रूस के अनिमर गेंडर हैं जिनकी चुनौती नरसिंह के लिए आसान नहीं है। इन दोनों से ही उनका अब तक पाला नहीं पड़ा है। योगेश्वर जैसे अनुभवी पहलवान का पदककाफी हद तक उनकी फिटनेस पर निर्भर करता है। यह अच्छा ही है कि मैड्रिड में उन्होंने ओलंपिक को ध्यान में रखते हुए क्यूबाई पहलवान के खिलाफ कोई अतिरिक्त जोखिम नहीं उठाया। बाकी ग्रीकोरोमन में रवींद्रखत्री का 86 किलो में और हरदीप का 98 किलो में ओलंपिक प्रवेश ही किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है।

लगता है कि साउथ एशियन गेम्स की रिकॉर्डतोड़ कामयाबी के बाद खेल प्रेमियों को पदकों की बरसात देखने की आदत पड़ गई है। इस बात को खेल प्रेमियों को स्वीकार करना होगा लेकिन साथ ही यह कहना ठीक होगा कि अब भारतीय पहलवानों को अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदकजीतने की आदत पड़ गई है।

अगर आठ भारतीय पहलवानों का बड़ा दल क्वॉलीफाइ करके रियो ओलंपिक में भाग लेने जा रहा है तो इसके पीछे इन पहलवानों की कड़ी मेहनत और फेडरेशन की एक दूरदर्शी सोच रही है। फेडरेशन हर साल कैडेट, जूनियर और सीनियर वर्ग की राष्ट्रीय चैंपियनशिप आयोजित करता है और साल भर तमाम अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं से पहले राष्ट्रीय शिविरों में पहलवानों को मंझे हुए राष्ट्रीय और विदेशी कोचों के मार्गदर्शन में कोचिंग का अवसर दिया जाता है।

इतना ही नहीं, पहलवानों को ओलंपिक जैसे आयोजन के लिए विदेशों में ट्रेनिंग का लगातार अवसर दिया जाता है जहां वे अपनी कला में निरंतर सुधार करते हैं। इसी ट्रेनिंग कार्यक्रम का यह परिणाम है कि यहां एक-एक वजन में कई पहलवान तैयार हो रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर की कई बड़ी प्रतियोगिताएं इस बात की साक्षी रही हैं जहां किसी वजन के शीर्ष पहलवान के फिट न होने पर एक अन्य पहलवान को मौका दिया गया और वह उस मुकाबले में पदक जीत कर लौटा।

फेडरेशन ने राष्ट्रीय चैंपियनशिप में अच्छे स्तर के पहलवानों की संख्या को बढ़ाने के लिए भी कई प्रयोग किए जो कारगर रहे। इस प्रतियोगिता में कुश्ती की तीनों श्रेणियों में पहले तीन स्थान पर रहने वाली टीमों को अपनी दो टीमें उतारने का अवसर दिया जाता है। जाहिर है कि जो टीमें अच्छी हैं, वहां से काफी संख्या में प्रतिभाएं भी निकलती हैं। वहां दूसरे या तीसरे दर्जे के पहलवान भी अक्सर कई राज्यों के पहलवानों पर भारी पड़ते हैं। ऐसा भी देखा गया है कि ऐसे पहलवान कई मौकों पर राष्ट्रीय चैंपियन बने और फिर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उन्होंने देश का नाम रोशन किया। अगर एक राज्य से एक वजन में एक प्रविष्टि के घिसे-पिटे फॉर्मूले पर ही चला जाता तो ऐसी प्रतिभाएं सामने न आ पातीं।
कुछ साल पहले कुश्ती कुछ चुनिंदा राज्यों और वहां भी किसी खास अखाड़े के पहलवानों तक सीमित थी, लेकिन आज यह मिथ टूटता दिखाई दे रहा है। फेडरेशन क्षेत्रीय स्तर पर प्रतियोगिताएं आयोजित करने जा रहा है जिससे ओलंपिक जैसे बड़े आयोजन के लिए पहलवानों की संख्या में इजाफा होने का यह सिलसिला चलता रहे। अगर लंदन ओलंपिक में पांच पहलवानों ने क्वॉलीफाइ किया तो इस बार तीन पहलवानों की संख्या और बढ़ गई। महिलाओं की संख्या में तो तीन गुना की वृद्धि हुई। लक्ष्य यही है कि भारतीय पहलवान ओलंपिक के सभी वजनों के लिए क्वॉलीफाइ करें जिससे भारत के ओलंपिक में पदक जीतने की संभावनाएं और भी बढ़ जाएं।

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