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राजनीतिः भूखे लोग और भोजन की बर्बादी

बीती इक्कीस फरवरी को जम्मू-कश्मीर सरकार ने अपने एक अपूर्व फैसले के तहत शादी समारोह में मेहमानों से लेकर व्यंजनों की संख्या तक सीमित कर दी है।

हमारे देश की मुख्य समस्याओं में से एक है भुखमरी। (Source: Reuters)

सवा अरब से भी ज्यादा आबादी वाले हमारे देश की मुख्य समस्याओं में से एक है भुखमरी। आंकड़े गवाह हैं कि रोटी नसीब न हो पाने के चलते अनगिनत लोग असमय काल का ग्रास बन जाते हैं। ऐसे में शादी-ब्याह, मुंडन-कर्णछेदन और जन्मदिन जैसे अवसरों पर दिए जाने वाले प्रीतिभोज में होने वाली भोजन की बरबादी हमें बरबस बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर करती है। 

बीती इक्कीस फरवरी को जम्मू-कश्मीर सरकार ने अपने एक अपूर्व फैसले के तहत शादी समारोह में मेहमानों से लेकर व्यंजनों की संख्या तक सीमित कर दी है। राज्य के खाद्य, जन-वितरण व उपभोक्ता मामलों के मंत्री जुल्फिकार अली के अनुसार, शादियों तथा अन्य सामाजिक समारोहों में खाद्य पदार्थों की बरबादी और दिखावा रोकने की गरज से किया गया यह फैसला एक अप्रैल से लागू होगा। राज्य में अब ऐसे समारोहों में डीजे और आतिशबाजी का इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। इसके अलावा निमंत्रण पत्र के साथ मिठाई-मेवे देने पर भी पाबंदी रहेगी। सरकार ने साफ कहा है कि लड़के की शादी में चार सौ और लड़की की शादी में पांच सौ से अधिक मेहमान शिरकत नहीं करेंगे। जन्मदिन अथवा अन्य छोटे कार्यक्रमों के लिए यह संख्या सौ रहेगी। मेहमानों को सिर्फ सात सब्जियां परोसी जा सकेंगी, वे चाहे शाकाहारी हों अथवा मांसाहारी। मीठे व्यंजनों की गिनती भी दो ही रहेगी। यही नहीं, अगर खाने-पीने के लिए प्लास्टिक सामग्री का इस्तेमाल होगा, तो समारोह के बाद उसका उचित निपटान करना होगा। सरकार ने फैसले को सख्ती से लागू कराने की जिम्मेदारी सभी जिलों के डिप्टी कमिश्नरों को सौंपी है। इस फैसले की अवहेलना करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। आगामी विधानसभा सत्र में सरकार इस बाबत एक विधेयक भी लाएगी, ताकि कानून बनाया जा सके।

सवा अरब से भी ज्यादा आबादी वाले हमारे देश की मुख्य समस्याओं में से एक है भुखमरी। आंकड़े गवाह हैं कि रोटी नसीब न हो पाने के चलते अनगिनत लोग असमय काल का ग्रास बन जाते हैं। ऐसे में शादी-ब्याह, मुंडन-कर्णछेदन और जन्मदिन जैसे अवसरों पर दिए जाने वाले प्रीतिभोज में होने वाली भोजन की बरबादी हमें बरबस बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर करती है। जम्मू-कश्मीर सरकार का ताजा फैसला इस दिशा में एक नई उम्मीद जगाता है। गौरतलब है कि साल 2016 में सांसद रंजीत रंजन ने भी लोकसभा में इस बाबत एक निजी विधेयक लाने का प्रस्ताव रखा था। पिछले दिनों विधि मंत्रालय ने उक्त विधेयक के प्रारूप को वैधानिक मानकों पर परखने के बाद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास मंजूरी के लिए भेजा है। रंजीत रंजन बिहार से कांग्रेस की लोकसभा सांसद हैं। अपने उक्त विधेयक में उन्होंने शादियों में भोजन की बरबादी रोकने के साथ-साथ विवाह का पंजीकरण कानूनी रूप से अनिवार्य करने की बात कही है। उक्त निजी विधेयक राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद लोकसभा में चर्चा के लिए आ सकता है और अगर यह पारित भी हो जाए, तब भी यह तब तक कानून की शक्ल अख्तियार नहीं कर सकेगा, जब तक सरकार स्वयं इस बाबत कोई विधेयक नहीं लाती। सनद रहे, साल 2011 में यूपीए-2 सरकार के खाद्यमंत्री केवी थॉमस ने भी ऐसे सामाजिक समारोहों में हजारों टन पका हुआ भोजन नष्ट होने को देखते हुए कानून बनाने की वकालत की थी।

विभिन्न सामाजिक-आर्थिक संगठनों का अनुमान है कि देश में होने वाली अधिकतर शादियों में कम से कम बीस फीसद भोजन बरबाद हो जाता है। आज से करीब पांच साल पहले बंगलुरुपहुंची भारत-अमेरिका के खाद्य एवं आर्थिक विशेषज्ञों की एक संयुक्त टीम ने भी शहरी इलाकों में होने वाली शादियों में भोजन की बरबादी संबंधी अपने अध्ययन के दौरान यही निष्कर्ष निकाला था। ऐसे सामाजिक समारोहों में दिए जाने वाले प्रीतिभोज मेजबान की जेब के साथ कितनी अ-प्रीति करते हैं, इसका अंदाजा आप स्वयं लगा सकते हैं। जब कोई अल्प-मध्यम वर्गीय परिवार किसी प्रीतिभोज का आयोजन करता है, तो आमतौर पर पांच-सात सौ मेहमान उसमें शिरकत करते हैं। और, प्रतिव्यक्ति एक प्लेट की कीमत आती है दो सौ से ढाई सौ रुपए। यानी पांच सौ मेहमानों को लंच अथवा डिनर देने के लिए सवा लाख से लेकर पौने दो लाख रुपए तक ढीले करने पड़ते हैं। मेन्यू अगर विस्तार पकड़े, तो प्रति प्लेट की कीमत तीन सौ से साढ़े तीन सौ रुपए तक पहुंच जाती है।

प्लेट से मतलब भी पूरे भोजन से हरगिज नहीं है। अगर मेहमान ने एक प्लेट में चावल-मटर पनीर खाया और फिर दूसरी प्लेट उठा कर कोई अन्य व्यंजन, तो प्लेट गिनी जाएंगी दो। आपने भी अक्सर देखा होगा कि बड़ी संख्या में मेहमान हर डिश के लिए एक नई प्लेट इस्तेमाल कर बैठते हैं। यह तो रहा भोजन का मामला। बैंक्वेट हॉल का किराया, सजावट और दीगर खर्च अलग से। मतलब यह कि अगर आपको बेटी के हाथ पीले करने हैं, तो सिर्फ इतने कामों के लिए कम से कम चार से पांच लाख रुपए की जरूरत पेश आएगी। यानी पूरी शादी का निपटान दस से बारह लाख रुपए अथवा उससे ज्यादा। मध्यम वर्ग की स्थिति रंजीत रंजन स्वयं बयान करती हैं कि दूसरे की देखादेखी के चक्कर में इस वर्ग के मेजबान के बीस से पचास लाख रुपए तक ढीले हो जाते हैं, जिसके चलते उसकी कमर टूट रही है। शादियों और ऐसे अन्य सामाजिक समारोहों में भोजन की बरबादी का दृश्य आप जूठे बर्तन रखने वाले टब में देख सकते हैं।

बफे सिस्टम ने मेहमानों को अपने हाथ से परोसने की आजादी तो दे दी, लेकिन भोजन की बरबादी के रास्ते खोल दिए। मेजबान भी यह सब कुछ अपनी आंखों से देखता है, लेकिन संकोचवश कुछ कह नहीं पाता। पंगत में अथवा मेज-कुर्सी पर बैठाकर भोजन परोसने वाले सिस्टम में मेहमान भोजन के प्रति अपेक्षित शालीनता बरतता था। वह उतना ही अपनी थाली में लेता था, जितना खा सकता था। तब ऐसे सामाजिक समारोहों में भोजन की बरबादी नाममात्र होती थी। शादियों और ऐसे अन्य समारोहों में परोसा जाने वाला भोजन साधारण भोजन की तुलना में कहीं ज्यादा कीमती होता है। उसकी बरबादी चिंतनीय और निंदनीय है। देश में आज भी एक बड़ी आबादी दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज है। कूड़ेदानों में भोजन तलाशते लोग अक्सर देखे जाते हैं। बच्चों की एक बड़ी तादाद कुपोषित है। बीती पंद्रह फरवरी को मुंबई उच्च न्यायालय ने विभिन्न जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान इस समस्या को लेकर गंभीर टिप्पणी की, कहा कि जब बच्चे कुपोषित हों तो विकास बेमानी हो जाता है। न्यायमूर्ति वीएम कनाडे व न्यायमूर्ति पीआर बोरा के खंडपीठ ने कहा कि जब ऐसी स्थिति है, तो समृद्धि और प्रगति कहां हुई है!

देश भर में चल रही मिड डे मील योजना के मूल में अशिक्षा के साथ-साथ भुखमरी और कुपोषण जैसी समस्याओं से भी किसी हद तक निजात पाने का मकसद है। लेकिन अफसोस, भ्रष्ट तत्त्वों ने बच्चों के भोजन पर भी अपनी गिद्ध दृष्टि गड़ा रखी है। पिछले दिनों दिल्ली के एक सरकारी विद्यालय में वितरित हुए मिड डे मील में मरे चूहे पाए गए, जिससे नौ बच्चे बीमार हो गए। सिर्फ दिल्ली नहीं, पूरे देश में इस योजना में गोलमाल चल रहा है, जिसकी खबरें आए दिन आती हैं। हाल में पत्रकारों की टीम चुनाव कवरेज करते समय बांदा (उत्तर प्रदेश) के एक प्राथमिक विद्यालय पहुंची, जहां उसने देखा कि बच्चों को मिड डे मील के तौर पर मोटे चावल और आलू की बेहद पनीली सब्जी का वितरण हो रहा था। टीम ने एक बच्चे से पूछा कि विद्यालय में मिलने वाला भोजन अच्छा लगता है? इस सवाल पर उस मासूम की बेबाक टिप्पणी थी, मजबूरी में खाना पड़ता है। जम्मू-कश्मीर सरकार और सांसद रंजीत रंजन द्वारा शादियों तथा अन्य सामाजिक समारोहों में होने वाली भोजन की बरबादी व दिखावा रोकने की दिशा में की गई पहल सराहनीय है। अब जरूरत इस बात की है कि संसद उक्त विधेयक को अपना समर्थन देते हुए केंद्र सरकार पर दबाव बनाए कि वह इस पहल को अंजाम तक पहुंचाए।

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