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राजनीतिः रसातल में जाता भूजल

नीति आयोग का कहना है कि देश की बत्तीस फीसद आबादी का इलाका पानी की किल्लत से पीड़ित है, जबकि विश्व बैंक के मुताबिक अड़तालीस फीसद अंचलों में पानी की समस्या है जिनमें चौबीस फीसद का भूजल जहरीला हो चुका है। वर्षाजल संरक्षण और उचित जल प्रबंधन ही एकमात्र विकल्प है। इसके बगैर हमारा कोई भविष्य नहीं है।

Author September 23, 2016 02:36 am

देश में भूजल का गिरता स्तर स्पष्ट संकेत देने लगा है कि भविष्य में हालात और भी ज्यादा गंभीर हो सकते हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड के वर्ष 2016 में मानसून-पूर्व के अध्ययन के नतीजे न केवल चौंका रहे हैं, बल्कि चिंता में भी डाल रहे हैं। केवल यह कहना कि बारिश कम हुई है इसलिए ऐसा हो रहा है, कतई तर्कसंगत नहीं होगा। भूजल स्तर में हुई कमी के अन्य महत्त्वपूर्ण कारकों को भी समझना अति आवश्यक है। प्राकृतिक स्रोतों का सूखना और अनियोजित विकास भी कहीं न कहीं गिरते भूजल स्तर के लिए जिम्मेदार है। सालों पहले जो पानी जमीन के नीचे पहुंच कर भूजल के स्तर को बरकरार रखता था आज यों ही बेकार चला जाता है। रेनवाटर हार्वेस्टिंग पर अमल न होना भी भूजल स्तर में आ रही गिरावट की एक महत्त्वपूर्ण वजह है। फिर समस्या भूजल स्तर में आ रही कमी की ही नहीं है, पानी का जहरीला होना और भी चिंताजनक है। भूजल विकास और प्रबंधन पर जल संसाधन मंत्रालय की संसदीय सलाहकार समिति की पिछले दिनों हुई बैठक में पेश की गई रिपोर्ट ने यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है कि आने वाले दिनों में बूंद-बूंद पानी के लिए देश में हाहाकार मच सकता है। ‘वाटर एड’ के शोध पर आधारित रिपोर्ट ने इस बात की पुष्टि की है कि देश के साढ़े चार सौ से ज्यादा जिलों में भूजल बेहद प्रदूषित हो चुका है। इन जिलों में भूजल में फ्लोराइड, आर्सेनिक, आयरन, सीसा, नाइट्रेट, सोडियम और क्रोमियम जैसे घातक रसायन मिले पाए गए हैं।

विश्व के पैंतीस देशों में तीस करोड़ से अधिक की आबादी फ्लोराइड की गिरफ्त में है। अपने देश में तेलंगाना, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, केरल, बिहार, आंध्र प्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे राज्य भी फ्लोराइड और आर्सेनिक की चपेट में हैं। देश में करीब 4.9 करोड़ लोग हर साल प्रदूषित पानी पीने से बीमार पड़ रहे हैं। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान सहित पंद्रह राज्यों के भूजल में आर्सेनिक की मात्रा 0.06 मिलीग्राम प्रति लीटर से ज्यादा हो चुकी है। करीब पच्चीस राज्यों में फ्लोराइड की मात्रा 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक, आयरन की मात्रा 2 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक, नाइट्रेट 48 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक, सीसा 0.02 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक और क्रोमियम की मात्रा 0.05 मिलीग्राम प्रति लीटर से भी अधिक है। उत्तराखंड जो कि गंगा और यमुना का मायका है, यहां के सैंतालीस स्थानों पर भूजल रसातल में पहुंच चुका है जिनमें हरिद्वार, देहरादून और नैनीताल भी शामिल हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक भूजल गिरने के पीछे मूल रूप से बारिश की कमी, रेनवाटर हार्वेस्टिंग न करना, अनियोजित निर्माण से जल-स्रोतों का सूखना व भूजल में सुधार को लेकर सरकारी उदासीनता भी शामिल है।

नीति आयोग के मुताबिक, भूजल का अस्सी फीसद उपयोग कृषिक्षेत्र में किया जाता है। आजादी के समय देश में प्रतिव्यक्ति पानी की उपलब्धता सात हजार क्यूबिक मीटर थी। यह कम होकर वर्ष 2001 में दो हजार क्यूबिक मीटर रह गई। अब तो देश की आबादी सवा सौ करोड़ है। भूवैज्ञानिकों के मुताबिक, वर्ष 2025-26 में यह उपलब्धता घट कर बारह सौ क्यूबिक मीटर रह जाएगी। नीति आयोग का कहना है कि देश की बत्तीस फीसद आबादी का इलाका पानी की गहन समस्या से जूझ रहा है, जबकि विश्व बैंक का कहना है कि भारत में अड़तालीस फीसद अंचलों में पानी की समस्या है जिनमें चौबीस फीसद का पानी जहरीला हो चुका है। वर्षाजल संरक्षण और उचित जल प्रबंधन ही एकमात्र विकल्प है। इसके बगैर हमारा कोई भविष्य नहीं है। बोरिंग व ट्यूबवेल पर नियंत्रण लगना चाहिए। तभी जाकर पानी की बर्बादी को रोकना संभव हो पाएगा।

एक अध्ययन के मुताबिक, भूजल के अस्सी फीसद हिस्से का हम इस्तेमाल कर चुके हैं और उसके बाद भी उसका दोहन निरंतर करते जा रहे हैं। वर्ष 1922 में एक चेतावनी दी गई थी कि वर्ष 2025 में विश्व में पानी के लिए लड़ाइयां होंगी। काफी पहले दी गई इस चेतावनी के प्रति हम आज भी बेपरवाह बने हुए हैं। जल संरक्षण पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है। जहां कम वर्षा होती है वहां भी जल संरक्षण के माध्यम से पानी को बर्बाद होने से बचाया जा सकता है। एक पक्के मकान की छत्त, जिसका कुल क्षेत्र पैंतीस वर्ग मीटर है, यदि उस छत का पानी संग्रह किया जाए तो बारह लोगों के परिवार को ढाई सौ से ज्यादा दिनों तक भोजन पकाने व पीने की पानी की किल्लत नहीं होगी।

भू-वैज्ञानिक अध्ययन के मुताबिक कारगर जल संरक्षण का उपाय सोख्ता (सोखपिट्स) का निर्माण है। सामान्य आकार के तीन हजार सोख्ता का यदि निर्माण किया जाए तो तीस करोड़ लीटर पानी का संचयन किया जा सकता है। पंजाब, हरियाणा व महाराष्ट्र में भूजल स्तर पहहत्तर फीसद तक नीचे पहुंच चुका है। इन राज्यों में इस तरह की व्यवस्था शीघ्र शुरू की जानी चाहिए। भू-वैज्ञानिकों की मानें तो दक्षिणी हरियाणा में भूजल का स्तर एक हजार फुट से भी ज्यादा नीचे चला गया है। केवल भारत सरकार अकेले इस दिशा में कुछ खास नहीं कर सकती है। इसके लिए राज्यों को भी आगे आना होगा। पोखरों व तालाबों को चिह्नित करके उन्हें पुनर्जीवित करने का काम युद्धस्तर पर शुरू करना होगा। पूरे देश में छह से सात लाख पोखर, तालाब व प्राकृतिक जलस्रोत बर्बाद हो चुके हैं। यदि सभी को फिर से एक बार दुरुस्त किया जाए तो इससे करोड़ों लोगों को राहत मिलेगी।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भूजल मीठे पानी के स्रोत के रूप में एक प्राकृतिक संसाधन है। साथ ही, भूजल भी जल-चक्र का ही एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें पानी के आगमन और निर्गमन के स्रोत और मार्ग होते हैं। देश में बत्तीस फीसद ब्लाकों में भूजल दयनीय स्तर पर है।
भूवैज्ञानिकों के मुताबिक, वर्ष 2025-26 तक लगभग साठ फीसद ब्लाक चिंताजनक स्थिति में आ जाएंगे। छत्तीसगढ़ के रायपुर, बिलासपुर, कोरबा, राजनांदगांव और दुर्ग में तो भूजल का स्तर पांच से आठ मीटर तक नीचे जा चुका है। उत्तर प्रदेश, बिहार व मध्यप्रदेश में सरकारी मानकों के मुताबिक लगाए गए पंद्रह लाख हैंडपंपों में से बीते पांच सालों में आठ लाख हैंडपंप यों ही खराब पड़े हुए हैं। इसके पीछे भी खास वजह भूजल के स्तर में गिरावट होना ही पाया गया है। उत्तर प्रदेश में कई ऐसे शहर हैं जहां आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित मानकों से करीब तीस गुना ज्यादा पाई गई है। पूर्वांचल के कई ऐसे गांव हैं जहां पानी में प्रति लीटर 1.05 मिलीग्राम आर्सेनिक पाया गया है। आर्सेनिक एक विषैला तत्त्व है जिसकी अधिक मात्रा कैंसर को भी आमंत्रित कर सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पीने के पानी में आर्सेनिक की सुरक्षित मात्रा प्रति लीटर शून्य से एक मिलीग्राम तक तय की है, जबकि भारत सरकार ने शून्य से पांच मिलीग्राम तक आर्सेनिक की सुरक्षित मात्रा का निर्धारण किया है।
केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, देश के इक्यानबे बड़े जलाशयों में उनकी क्षमता का महज पच्चीस फीसद पानी बचा हुआ है। देश में सिंचाई का करीब सत्तर फीसद पानी और घरेलू जल खपत का अस्सी फीसद हिस्सा भूमिगत जल से ही पूरा होता है। उत्तर भारत में छोटे तालाबों और जलाशयों का एक प्राकृतिक सिस्टम मौजूद था, जिससे भूजल रिचार्ज हुआ करता था, लेकिन बीते दस सालों में इसमें काफी कमी आई है। भूगर्भीय वैज्ञानिकों के मुताबिक, सिंधु-गंगा बेसिन के भूमिगत जल में काफी गिरावट आई है। लेकिन इससे भी बड़ा खतरनाक पहलू भूमिगत जल का प्रदूषित होना है। जनवरी 1995 में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट आदेश दिया था कि बेहिसाब जल दोहन पर पाबंदी की रखवाली की जिम्मेदारी केंद्रीय भूजल प्राधिकरण की है। बावजूद होटल, भवन निर्माण उद्योग व बूचड़खानों में पानी की लूट हो रही है। प्राधिकरण निष्क्रिय है।

हरियाणा स्टेट माइनर इरिगेशन ट्यूबवेल कारपोरेशन और सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1996-97 में राज्य में 28,987 ट्यूबवेल थे लेकिन वर्ष 2000-02 में इनकी संख्या बढ़ कर 96,807 हो गई। यही स्थिति पंजाब की भी है। नासा के एक अध्ययन के मुताबिक हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में भूजल स्तर में पिछले आठ सालों में एक फुट प्रतिवर्ष गिरावट दर्ज की गई है। इसका मुख्य कारण सिंचाई में भूमिगत जल का खूब इस्तेमाल होना है। जिसे एक समय हरित क्रांति कहा गया, उसने अनाज उत्पादन में तो बढ़ोतरी की, पर साथ ही हमें एक ऐसी कृषि प्रणाली पर निर्भर बना दिया है जिसमें पानी की अत्यधिक जरूरत पड़ती है। भूजल स्तर लगातार गिरने से एक तरफ पानी की कमी हो रही है, दूसरी तरफ पानी में खारापन बढ़ रहा है। इससे पेट व किडनी की बीमारियां बढ़ने की आशंका है। भूजल बोर्ड के मुताबिक 2007 से 2011 के बीच औसतन दूषित पानी से एक करोड़ डायरिया के मामले, 7 लाख 80 हजार टाइफायड के मामले और 1 लाख 60 हजार वायरल हेपेटाइटिस के मामले सामने आए हैं।
हालांकि ऐसी बात नहीं कि सरकार गिरते भूजल स्तर को लेकर गंभीर नहीं है। भारत सरकार ने भूजल प्रबंधन पर छह हजार करोड़ रुपए खर्च करने का एलान किया है। लेकिन सरकार को चाहिए कि पूरी तरह योजनाबद्ध ढंग से इस राशि को खर्च करे ताकि इसका ज्यादा से ज्यादा लाभ मिल सके।

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