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राजनीतिः क्या ऐसे साफ होगी गंगा

यह विडंबना ही है कि भारत में नदियों से लोगों का आध्यात्मिक रिश्ता है लेकिन यह श्रद्धा नदियों को निर्मल और अविरल रखने का संकल्प पैदा नहीं कर पाती है। गंगा के संकट के पीछे थोड़े-बहुत प्राकृतिक कारण हो सकते हैं, पर मूलत: यह ऐसी मानवजनित समस्या है जिसमें आम लोगों से लेकर प्रशासनिक स्तर तक सभी ने योगदान दिया है।

श्रीशचंद्र मिश्र

डेढ़ हजार करोड़ रुपए की लागत से सात राज्यों में 231 परियोजनाओं के जरिए गंगा को निर्मल करने का एक और अभियान शुरू हो गया है। मोदी सरकार के महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम ‘नमामि गंगे’ के इस पहले चरण में पांच राज्यों के 104 स्थानों पर सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने के अलावा घाटों की मरम्मत और निर्माण किया जाएगा। परियोजना को सफल बनाने के लिए सात राज्यों की हिस्सेदारी तय की गई है। गंगा मां के बुलावे पर वाराणसी गए और वहां से चुनाव जीते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गंगा को साफ और अविरल करने का जो वादा किया था, उस पर दो साल में भाषणबाजी और कागजी योजनाएं बनाने की कवायद तो खूब हुई, जमीनी स्तर पर शुरुआत अब हुई है। इसे लेकर सवाल और आशंकाएं कई हैं। व्यापक समस्या के एक सूत्र को पकड़ कर शुरू किया गया अभियान कितना कारगर हो पाएगा, यह सवाल इसलिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि पहले भी गंगा को साफ करने की योजनाएं बनीं, अरबों रुपए खर्च हुए, पर हालत जस की तस बनी रही।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक गंगा की सफाई की विभिन्न परियोजनाओं पर बीस हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं। राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे, गंगा की सफाई के लिए 1700 करोड़ रुपए का एक्शन प्लान लाया गया। पहला एक्शन प्लान जून 1986 में शुरू हुआ और उप्र के छह, बिहार के चार और पश्चिम बंगाल के पंद्रह शहरों या कस्बों में सक्रिय होने के बाद मार्च 2000 में बंद घोषित कर दिया गया। इस पहले एक्शन प्लान के लिए 462 करोड़ चार लाख रुपए मंजूर किए गए थे। दूसरा एक्शन प्लान 1993 से 1996 के बीच कई चरणों में शुरू किया गया। लक्ष्य 95 शहरों या कस्बों में गंगा की प्रमुख सहायक नदियों की सफाई का रखा गया था। 2004 में संसदीय समिति ने गंगा सफाई परियोजना को पूरी तरह नाकाम बताया। वजह यह बताई गई कि उपयुक्त फंड मुहैया नहीं कराया गया और कामकाज पर निगाह रखने की उचित व्यवस्था विकसित नहीं की गई। यूपीए सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित कर दिया। सात हजार करोड़ रुपए की नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथारिटी (एनजीआरबीए) का गठन हुआ। विश्व बैंक समेत कई देशों से मदद मिली। विशेषज्ञों से विचार-विमर्श हुआ। ढेरों योजनाएं बनीं, लेकिन नतीजा सिफर रहा।

गंगा में प्रदूषण की भयावहता कितनी है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गंगा और उसकी सहायक नदियों में रोज सीवेज से उगली गई बारह अरब लीटर गंदगी बहाई जा रही है। यह दिल्ली के एक करोड़ अस्सी लाख लोगों को पाइप के जरिए पीने का जितना पानी सप्लाई किया जाता है उससे तीन गुना ज्यादा है। सीवेज से जो गंदगी गिरती है उसमें से 5.7 अरब लीटर परिष्कृत ही नहीं होता। गंगा में पचहत्तर फीसद प्रदूषण एक सौ चौवालीस बड़े नालों की वजह से है। गंगा के किनारे ऐसी सात सौ चौंसठ औद्योगिक इकाइयां हैं जो बेहद खतरनाक तत्त्व नदी में बहाती हैं। इसका असर गंगा के किनारे बसे लोगों पर भी पड़ रहा है। 2012 में नेशनल कैंसर रिजस्ट्री प्रोग्राम के अध्ययन में बताया गया था कि अन्य लोगों की तुलना में गंगा के किनारे रहने वाले उत्तर प्रदेश, बिहार व बंगाल के लोगों में कैंसर होने का खतरा ज्यादा है।

दो साल पहले राष्ट्रीय हरित पंचाट ने केंद्र को निर्देश दिया था कि उसकी मंजूरी के बिना गोमुख से कानपुर तक गंगा की सफाई के लिए उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को फंड जारी नहीं किया जाए। दोनों राज्य तब तक उन स्थानों की पहचान ही नहीं कर पाए थे जहां गंगा सबसे ज्यादा प्रदूषित है। 2010 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के ‘गंगा लैब एंड रिवर इको सिस्टम एनवायरमेंट मैनेजमेंट एंड ट्रेनिंग सेंटर’ के अध्ययन से पता चला कि मूल गंगाजल की एक फीसद मात्रा ही वाराणसी में उपलब्ध है। इसकी कई वजह हैं। बांधों और बैराज ने गंगा की धारा को अवरुद्ध कर उसकी दिशा बदल दी है।

उत्तर प्रदेश से गुजरती गंगा में जहरीले रसायन डाले जाते हैं। वाराणसी तक पहुंचने से पहले के गंगा के रास्ते में बारह बांध और जलाशय हैं। हरिद्वार का भीमगौड़ा बराज 95 फीसद पानी को पश्चिमी और पूर्वी गंग नहर की तरफ मोड़ देता है। अगली रुकावट नरोरा में आती है जहां से सौ फीसद पानी निचली गंगा नगर में चला जाता है। इसके बाद गंगा में गंगाजल नाममात्र का रह जाता है और उसमें भूजल, नालों से गिरा कचरा और सहायक नदियों का पानी पैठ बना लेता है। कानपुर में चमड़े का सामान बनाने की चार सौ से ज्यादा फैक्टरियां बिना परिष्कृत किए अपना सारा कचरा गंगा में बहा देती हैं। यही पानी वाराणसी पहुंचता है जहां के घाट पूरे भारत में सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं। अस्सी घाट से वाराणसी में प्रवेश करते समय गंगा का एफसीसी (फेइसल कोलिफार्म काउंट) साठ हजार होता है जो शहर पार करते हुए पंद्रह लाख तक पहुंच जाता है।
एक तरफ बांध और बैराज ने गंगा का बहाव रोका है, दूसरी तरफ तट पर बेहताशा निर्माण ने उसकी समस्या बढ़ा दी है। नेशनल गंगा रिवर बेसिन अथारिटी (एनजीआरबीए) का गठन गंगा की दशा सुधारने के लिए योजना बनाने, संसाधन जुटाने, निगरानी रखने और केंद्र व संबंधित राज्यों के बीच बेहतर तालमेल बनाने के लिए किया गया था। फरवरी 2009 में अस्तित्व में आया एनजीआरबीए अभी तक सिर्फ एक अच्छी पहल कर पाया है। केंद्र व राज्यों से मंजूर की गई भागीरथी पर बनने वाली तेरह परियोजनाओं को रोका और गोमुख व उत्तरकाशी के बीच के एक सौ तीस किलोमीटर क्षेत्र को इको सेंसिटिव जोन घोषित किया। लेकिन गंगा का नैसर्गिक बहाव बहाल करने की दिशा में वह कोई ठोस कदम नहीं उठा पाया।
पिछले चार दशक से हर पंचवर्षीय योजना में गंगा एक्शन प्लान के लिए अच्छी-खासी रकम आबंटित की गई है। कई नामों से प्रोजेक्ट शुरू किए गए। लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड व बंगाल में गंगा को निर्मल करने के लिए तिरपन प्रोजेक्ट बने। इसके बावजूद कानपुर, इलाहाबाद, पटना और वाराणसी जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में जहां गंगा नीचे की तरफ बहती है, उसके पानी की गुणवत्ता या स्तर बेहद चिंताजनक है। दिक्कत यह है कि तमाम सरकारी कवायद के बावजूद समस्या की जड़ को खत्म करने की कोई कारगर रणनीति नहीं बन पाई है। राष्ट्रीय पंचाट ने गंगा की सफाई को क्षेत्रवार हिस्सों में बांटा है। चरणबद्ध तरीके से गोमुख से हरिद्वार, हरिद्वार से कानपुर, कानपुर से उत्तर प्रदेश की सीमा तक, उत्तर प्रदेश की सीमा से झारखंड की सीमा तक और वहां से बंगाल की खाड़ी तक अभियान चलाने की जरूरत उसने बताई है। सवाल वही है कि ऐसा होगा कैसे?
नदियों में गंगा का सबसे ज्यादा आध्यात्मिक महत्त्व है। जीवनदायिनी के साथ-साथ उसे मोक्षदायिनी भी मानने की पुरानी परंपरा रही है। लेकिन उसके पानी को गंदा करने और उसके नैसर्गिक प्रवाह क्षेत्र को बाधित करने का सिलसिला भी उतना ही पुराना है। गंगा से छेड़छाड़ कितनी भारी पड़ सकती है, यह 2013 में उत्तराखंड में हुई त्रासदी से समझ में आ जाना चाहिए। लेकिन लगता नहीं कि इससे जल्दी ही कोई सबक सीखने वाला है।
सालों से गंगा को स्वच्छ व निर्मल बनाने की तमाम योजनाएं औधे मुंह गिरती रही हैं। गंगा के पानी का स्तर दिन-ब-दिन बिगड़ता ही गया। कानपुर, इलाहाबाद, पटना और वाराणसी जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में जहां गंगा नीचे की तरफ बहती है, उसके पानी की गुणवत्ता या स्तर आम लोगों से लेकर पर्यावरणविदों तक के लिए गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। दरअसल, सरकारी योजनाओं की नाकामी की एक ही वजह है और वह यह है कि सरकार ने अभी तक समस्या के निदान के लिए इंजीनियरिंग केंद्रित नजरिया ही अपनाया है। नालों की सफाई के प्लांट लगाने पर बेवजह जोर दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि मंत्रालय को अपना नजरिया बदलना होगा। अब समय आ गया है कि इंजीनियरिंग केंद्रित नजरिए से समाज केंद्रित नजरिए का समावेश किया जाए। इसके तहत किनारे रहने वाले लोगों को गंगा साफ करने के अभियान में शामिल किया जाए।

यह विडंबना ही है कि भारत में नदियों से लोगों का आध्यात्मिक रिश्ता है लेकिन यह श्रद्धा नदियों को निर्मल और अविरल रखने का संकल्प पैदा नहीं कर पाती है। गंगा के संकट के पीछे थोड़े-बहुत प्राकृतिक कारण हो सकते हैं, पर मूलत: यह ऐसी मानवजनित समस्या है जिसमें आम लोगों से लेकर प्रशासनिक स्तर तक सभी ने भरपूर योगदान दिया है। समस्या की मूल वजह यह है कि अनियंत्रित औद्योगीकरण होने और स्थानीय निकायों की लापरवाही से गंगा में गंदा पानी और औद्योगिक कचरा बिना परिष्कृत किए लगातार बहाया जाता रहा है। गंगा को साफ करने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि नदियों में नालों का पानी और औद्योगिक कचरा कतई न आने दिया जाए। इसके लिए सभी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को सक्रिय किया जाना जरूरी है। नया अभियान इस दिशा में कितनी कारगर पहल कर पाता है, इसी पर निर्भर होगा कि गंगा की सूरत बदल पाती है या नहीं। बरसों पुरानी समस्या का रातोंरात समाधान नहीं हो सकता। जरूरत इस बात की है कि पिछली गलतियों से सबक लेकर नई शुरुआत को सतर्कता और जवाबदेही से आगे बढ़ाया जाए।

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