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राजनीतिः इलाज को तरसते गांव

देश के अस्पतालों में चौदह लाख से ज्यादा डॉक्टरों की कमी है जबकि हर साल करीब साढ़े पांच हजार डॉक्टर ही मेडिकल कॉलेजों से तैयार हो पाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक डॉक्टर-मरीज का अनुपात मानक एक हजार तय है यानी हजार लोगों पर एक डॉक्टर। लेकिन हमारे यहां यह अनुपात बेमानी है। ग्रामीण क्षेत्र में तो यह आंकड़ा और भी कम हो जाता है।

Author Published on: August 7, 2019 3:23 AM
देश में अब भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और उप स्वास्थ्य केंद्रों की सिर्फ दस से बीस फीसद ग्रामीण आबादी तक पहुंच है। दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्रों में यह स्थिति और भी बदतर है। कमोबेश यही स्थिति रेफरल अस्पतालों की भी है।

मनीष वैध

स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से गांव इन दिनों सबसे ज्यादा घाटे में हैं। शहरों में तो फिर भी सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ लोगों को मिल जाता है, पर गांवों में स्थितियां बदतर हैं। सरकारी आंकड़े कुछ भी हों लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती है। ग्रामीणों को अपनी छोटी-छोटी बीमारियों के इलाज के लिए शहरों की ओर दौड़ना पड़ता है। इसमें उन्हें समय का तो नुकसान होता ही है, निजी अस्पतालों के महंगे इलाज का भी शिकार होना पड़ता है। इसी वजह से ग्रामीण क्षेत्रों में झोलाछाप डॉक्टरों का धंधा भी तेजी से फल-फूल रहा है। हमारे देश की सत्तर फीसद से ज्यादा आबादी गांव में रहती है लेकिन इलाज के लिए कई किलोमीटर दूर चल कर ग्रामीणों को अस्पताल जाना पड़ता है। कहीं-कहीं तो उन्हें पचास से सौ किलोमीटर तक का सफर तय करना पड़ता है। कई गांवों के बीच एक स्वास्थ्य केंद्र है भी तो जरूरी नहीं कि वहां इलाज हो ही जाएगा। ज्यादातर को इलाज की जगह निराशा ही हाथ लगती है।
केंद्र और राज्य सरकारें हर साल अपने बजट में स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए एक बड़ा हिस्सा रखती हैं पर इसका असर गांवों में नजर ही नहीं आता। कहीं भवन नहीं है तो कहीं डॉक्टर नहीं। कहीं दवाइयां नहीं तो कहीं सुविधाएं नहीं। सरकारों ने देश में बड़ी तादाद में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और उप स्वास्थ्य केंद्र खोले हैं। इनमें कर्मचारी भी तैनात किए हैं। फिर भी डॉक्टरों और मैदानी स्वास्थ्य अमले की कमी से ग्रामीणों का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। मजबूरन उन्हें झोलाछाप डॉक्टरों से इलाज करवाना पड़ता है।

देश में अब भी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और उप स्वास्थ्य केंद्रों की सिर्फ दस से बीस फीसद ग्रामीण आबादी तक पहुंच है। दूरस्थ और आदिवासी क्षेत्रों में यह स्थिति और भी बदतर है। कमोबेश यही स्थिति रेफरल अस्पतालों की भी है। फिलहाल करीब बारह सौ लोगों पर एक बिस्तर उपलब्ध है, जबकि मानक रूप से यह पांच सौ लोगों पर होना चाहिए। इनमें भी ज्यादातर शहरों या शहरों के आसपास ही हैं। अकेला केरल ऐसा राज्य है जहां अस्पतालों में पर्याप्त संख्या में बिस्तर उपलब्ध हैं, जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में अन्य राज्यों की तुलना में ये बहुत कम हैं।

ग्रामीण क्षेत्र के अस्पतालों में दवाइयों और उपकरणों की कमी भी इन सेवाओं को प्रभावित करने वाला एक बड़ा कारण है। स्वास्थ्य बजट का बड़ा हिस्सा डॉक्टरों और अमले के वेतन-भत्तों पर ही खर्च हो जाता है। वेतन-भत्तों में कभी कटौती नहीं की जा सकती, इसलिए कटौती दवाइयों और उपकरणों की खरीद, भवन और वाहनों में ही की जाती है। ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ नामक रिपोर्ट कहती है कि देश में स्वास्थ्य खर्च का अधिकांश हिस्सा शहरी आबादी के लिए हो जाता है और इससे समाज का बीस से तीस फीसद वर्ग ही लाभान्वित हो पाता है। एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र करीब एक लाख लोगों की स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करता है और प्रति केंद्र पचास हजार रुपए की दवाइयां सालाना भी खरीदी जाएं तो हर व्यक्ति को सालाना पचास पैसे की दवाई ही दी जा सकती है। यह इतनी कम रकम है कि किसी मरीज के लिए एक खुराक दवा भी संभव नहीं है। मुश्किल यह भी है कि हमने अब तक ग्रामीण इलाकों में तकनीकी के जरिए स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए न तो कोई पहल की है और न कोई गंभीर कदम उठाए हैं।

आज जबकि गांव-गांव तक मोबाइल, कंप्यूटर और टीवी जैसी तकनीकी सुविधाएं पहुंच चुकी हैं तो इन्हीं की तरह स्वास्थ्य सुविधाएं भी तकनीक के जरिए गांव तक भेजी जा सकती हैं। विदेशों में भी इसके कई सफल प्रयोग हुए हैं। बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए सबसे अहम है कर्मचारियों और डॉक्टरों की तैनाती। ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य कार्यकर्ता, नर्स और महिला स्वास्थ्य कर्मी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। लेकिन उपलब्ध आंकड़ों पर गौर करें तो साफ है कि स्थिति भयावह है। हमारे यहां प्रशिक्षित अमले की भारी कमी है। भारतीय स्वास्थ्य सूचना तंत्र के आंकड़े कहते हैं कि हमारे यहां सत्तर से अस्सी फीसद डॉक्टर और करीब पिच्यासी से नब्बे प्रतिशत नर्स शहरी इलाकों में काम कार्यरत हैं जबकि अस्सी से नब्बे फीसद एएनएम देहाती इलाकों में तैनात हैं। अब ऐसी स्थिति में साफ है कि ग्रामीण क्षेत्रों में करीब साढ़े बारह हजार लोगों पर एक डॉक्टर मिल पाता है। इनमें भी आदिवासी तथा दलित इलाकों वाले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार जैसे राज्यों में स्थिति ज्यादा ही भयावह है। ये अपने पड़ोसी राज्यों से भी काफी पिछड़े हुए हैं।

मध्यप्रदेश विधानसभा में सरकार ने खुद स्वीकार किया है कि राज्य में सत्तर फीसद डॉक्टरों की कमी है। राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो देश के अस्पतालों में चौदह लाख से ज्यादा डॉक्टरों की कमी है जबकि हर साल करीब साढ़े पांच हजार डॉक्टर ही मेडिकल कॉलेजों से तैयार हो पाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक डॉक्टर-मरीज का अनुपात मानक एक हजार तय है यानी हजार लोगों पर एक डॉक्टर। लेकिन हमारे यहां यह अनुपात बेमानी है। ग्रामीण क्षेत्र में तो यह आंकड़ा और भी कम हो जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों के स्वास्थ्य केंद्रों में तैनात डॉक्टरों की संख्या वर्ष 2007 में 22608 थी जो वर्ष 2014 में बढ़ कर भी केवल 27355 हो सकी है।

शहरी क्षेत्रों में डॉक्टरों की तादाद पहले से ही ज्यादा है, उस पर नए डॉक्टर भी शहरों में ही काम करना पसंद करते हैं। ज्यादातर युवा डॉक्टर संपन्न परिवारों से आते हैं और गांवों को लेकर उनके मन में कई पूर्वाग्रह होते हैं। उनके लिए गांव बचपन से ही हेय दृष्टि लिए होता है। उन्हें अपने चमकदार कैरियर के लिए लगता है कि गांव में जाना भविष्य को खत्म कर देने जैसा है। गांव में उन्हें वह चमचमाती दुनिया नजर नहीं आती जिसके वे अभ्यस्त हो चुके होते हैं। हमारी चिकित्सा शिक्षा रोग होने के बाद उनके इलाज के लिए ही छात्रों को तैयार करती है। सामाजिक परिस्थितियों के अध्ययन पर कोई जोर नहीं दिया जाता, जिनमें ये रोग पनपते हैं, न ही रोगमुक्त वातावरण के निर्माण के लिए ध्यान दिया जाता है। छात्रों को इतना भर बताया जाता है कि लोह तत्त्व की गोलियां, सुई या विटामिन की गोलियों से इलाज किया जाए। इसी कारण वे जरूरी सवालों के जवाब ढूंढ़ने में कोई रुचि नहीं रखते जैसे लोग क्यों भरपेट खाना नहीं खा पाते हैं या समय रहते इलाज करवाने क्यों नहीं पहुंच पाते। हालांकि अब पाठ्यक्रम में सामाजिक व निवारक चिकित्सा को जोड़ दिया गया है पर इसे गंभीरता से लेने वाले छात्रों की संख्या कम ही है।

चिकित्सा शिक्षा छात्रों को ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों की स्थितियों में काम करने के लिए भी तैयार नहीं करती। शिक्षण के दौरान नवीनतम जांच उपकरणों का सहारा लिया जाता है। मरीज की बीमारी का इतिहास जानकर व शारीरिक जांच कर रोग निदान की क्षमता उनमें विकसित नहीं हो पाती। उपकरण न हों तो वे खुद को पूरी तरह असमर्थ पाते हैं। इसके अलावा उनके कौशल को बढ़ाने के बजाय मात्र जानकारी दी जाती है। परिणाम यह होता है कि एक औसत डॉक्टर सामान्य बाल रोग, शल्य क्रिया या प्रसव संबंधी समस्याओं से निपटने में खुद को असमर्थ पाता है। आम रोगों से निपटने के लिए भी चिकित्सा शिक्षा डॉक्टरों को पर्याप्त रूप से तैयार नहीं करती। गांवों में पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए अब नए सिरे से समाज, सरकार और स्वास्थ्य क्षेत्र में सक्रिय स्वयंसेवी संगठनों को मिल-बैठ कर प्रयास करने होंगे। उन कारकों पर भी पुनर्विचार की जरूरत है जो गांव तक इन सुविधाओं की पहुंच के रास्ते में रोड़ा बनते हैं।

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