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पर्यावरण की कसौटी पर

अमेरिका, दुनिया का नबंर एक प्रदूषक है, तो चीन नंबर दो। फिर भी भारत, उपभोगवादी चीन और अमेरिका जैसा बनना चाहता है। क्यों?

प्रतीकात्मक तस्वीर

पर्यावरणीय समृद्धि की चाहत, जीवन का विकास करती है, विकास की चाहत, सभ्यताओं का। सभ्यता को अग्रणी बनाना है, तो विकास कीजिए। जीवन का विकास करना है, तो पर्यावरण को समृद्ध रखिए। स्पष्ट है कि पर्यावरण और विकास, एक-दूसरे के पूरक होकर ही इंसान की सहायता कर सकते हैं; बावजूद इस सच के आज पर्यावरण और विकास की चाहत रखने वालों ने एक-दूसरे को परस्पर विरोधी मान लिया है।

सब जानते हैं कि बढ़ता तापमान और बढ़ता कचरा, पर्यावरण ही नहीं, विकास के लिहाज से भी सबसे बड़ी चुनौती हैं। वैज्ञानिक आकलन है कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, तो बर्फ पिघलने की रफ्तार बढ़ती जाएगी। समुद्र का जलस्तर बढेÞगा। नतीजे में कुछ छोटे देश व टापू डूब जाएंगे। समुद्र किनारे की कृषिभूमि कम होगी। लवणता बढेगी। समुद्री किनारों पर पेयजल का संकट गहराएगा। समुद्री खाद्य के रूप में उपलब्ध जीव कम होंगे। वातावरण में मौजूद जल की मात्रा में परिवर्तन होगा। परिणामस्वरूप, मौसम में और परिवर्तन होंगे। बदलता मौसम तूफान, सूखा और बाढ़ लाएगा।

हेमंत और बसंत ऋतु गायब हो जाएंगी। इससे मध्य एशिया के कुछ इलाकों में खाद्यान्न उत्पादन बढेÞगा, मगर दक्षिण एशिया में घटेगा। नहीं चेते, तो खाद्यान्न के मामले में स्वावलंबी भारत जैसे देश में भी खाद्यान्न आयात की स्थिति बनेगी। पानी का संकट बढेÞगा। जहां बाढ़ और सुखाड़ कभी नहीं आते थे, वे नए ‘सूखा क्षेत्र’ और ‘बाढ़ क्षेत्र’ के रूप में चिह्नित होंगे।

जाहिर है कि इन सभी कारणों से महंगाई बढेगी। दूसरी ओर मौसमी परिवर्तन के कारण पौधों और जीवों के स्वभाव में परिवर्तन आएगा। ठंडी प्रकृति वाले पंछी अपना ठिकाना बदलने को मजबूर होंगे। इससे उनके मूल स्थान पर उनका भोजन रहे जीवों की संख्या एकाएक बढ़ जाएगी। कई प्रजातियां लुप्त हो जाएंगी। मनुष्य भी लू, हैजा, जापानी बुखार जैसी बीमारियों और महामारियों का शिकार बनेगा। ये आकलन, जलवायु परिवर्तन पर गठित अंतर-सरकारी पैनल के हैं।

पर्यावरण कार्यकर्ता और अन्य आकलन भी इस सभी के लिए इंसान की अतिवादी गतिविधियों को जिम्मेदार मानते हैं। तापमान में बढ़ोतरी का नब्बे प्रतिशत जिम्मेवार तो अकेले ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को ही माना गया है। मूल कारण है, अतिवादी उपभोग। सारी दुनिया अगर अमेरिकी लोगों जैसी जीवन शैली जीने लग जाए, तो 3.9 अतिरिक्त पृथ्वी के बगैर हमारा गुजारा चलने वाला नहीं। अमेरिका, दुनिया का नबंर एक प्रदूषक है, तो चीन नंबर दो।

चेतावनी साफ है; फिर भी भारत, उपभोगवादी चीन और अमेरिका जैसा बनना चाहता है। क्यों? भारत भी अब कई खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की होड़ में शामिल होता देश है, जिसमें चीन और अमेरिका अभी भारत से क्रमश: पांच व साढेÞ सात गुना आगे हैं। वह भारतीय सभ्यता और संस्कार का भारत न होकर कुछ और हो जाने को बेताब है। क्या हम ऐसा करें? विकास, समग्र अच्छा है या सिर्फ भौतिक और आर्थिक?

अमेरिका में दुनिया की पांच प्रतिशत आबादी रहती है, पर प्रदूषण में उसकी हिस्सेदारी पच्चीस प्रतिशत है। कारण कि वहां तीस करोड़ की आबादी के पास पच्चीस करोड़ कारें हैं। बहुसंख्य लोगों के पास पैसा है, इसलिए ‘यूज ऐंड थ्रो’ की प्रवृत्ति भी है। उपभोग ज्यादा है, तो कचरा भी ज्यादा है और संसाधन की खपत भी। अमेरिका के थर्मल पॉवर संयंत्रों से बारह करोड़ टन कचरा छोड़ने का आंकड़ा है। परिणामस्वरूप, 2004 के बाद से अब तक अमेरिका के एक दर्जन बड़े बिजली संयंत्र या तो बंद हो गए हैं अथवा उत्पादन गिर जाने से बंद होने के कगार पर हैं। उसने अपने कई बड़े बांधों को तोड़ दिया है।

खबर यह भी है कि आठ राज्यों ने तो नए बिजली संयंत्र लगाने से ही इनकार कर दिया है। अमेरिका में पानी की कुल खपत का सबसे ज्यादा, इकतालीस प्रतिशत, ऊर्जा उत्पादन में खर्च होता है। पानी पर यह निर्भरता इस कमी के बावजूद है कि कम होती बारिश व सूखा मिल कर 2025 तक ली वेगास, साल्ट लेक, जार्जिया, टेनेसी जैसे इलाकों के पानी प्रबंधन पर लाल निशान लगा देंगे। चेतावनी यह भी है कि 2050 तक कोलरेडा जैसी कई प्रमुख नदी के प्रवाह में भी बीस प्रतिशत तक कमी आ जाएगी। एक ओर ताजे पानी की बढ़ती खपत, घटते जलस्रोत, और दूसरी तरफ किसान, उद्योग और शहर के बीच खपत व बंटवारे के बढ़ते विवाद। बड़ी आबादी उपभोग की अति कर रही है, तो करीब एक करोड़ अमेरिकी जीवन की न्यूनतम जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। विषमता का यह विष, सामाजिक विन्यास बिगाड़ रहा है।

नतीजा यह है कि अमेरिका समेत विकसित कहे जाने वाले कई देश अपनेसंसाधन, सेहत और आबोहवा को बचाने के लिए ज्यादा कचरा फेंकने वाले उद्योगों को दूसरे ऐसे देशों में ले जा रहे हैं, जहां प्रतिव्यक्ति आय कम है। वे मानते हैं कि कचरे से मौत होती है। कम आय वालों की मौत होने से कम नुकसान होगा। ज्यादातर विकसित देशों के संवेदनाहीन विकास का सच यही है। क्या यह किसी अर्थव्यवस्था के ऐसा होने का संकेत है कि उससे प्रेरित हुआ जा सके? क्या ऐसी मलीन अर्थव्यवस्था में तब्दील हो जाने की बेसब्री उचित है? क्या भारत को इससे बचना नहीं चाहिए?

आर्थिक विकास की असलियत बताते अन्य आंकड़े ये हैं कि प्रदूषित हवा की वजह से यूरोपीय देशों ने एक ही वर्ष में 1.6 खरब डॉलर और छह लाख जीवन खो दिए। एक अन्य आंकड़ा है कि वर्ष 2013 में प्राकृतिक आपदा की वजह से दुनिया ने 192 अरब डॉलर खो दिए। दुखद है कि दुनिया में चौहत्तर लाख लोगों को वह पानी मुहैया नहीं, जिसे किसी भी मुल्क के मानक पीने योग्य मानते हैं। दुनिया में चालीस प्रतिशत मौत पानी, मिट्टी और हवा में बढ़ आए प्रदूषण की वजह से हो रही है। हमें होने वाली अस्सी प्रतिशत बीमारियों की मूल वजह पानी का प्रदूषण ही बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि दिल्ली की हवा में बेजिंग की हवा से ज्यादा प्रदूषण है, जबकि एक समय बेजिंग इस मामले में दुनिया में पहले नंबर पर था।

हमारी नदियों में इतना कचरा है कि हमारी एक भी महानगरीय नदी ऐसी नहीं, जिसका पानी सीधे पीया जा सके। भारत, भूजल में आर्सेनिक, नाइट्रेट, फ्लोराइड तथा भारी धातु वाली अशुद्धियों की तेजी से बढ़ोतरी वाला देश बन गया है। भारत में हर रोज औसतन करीब 1.60 लाख मीट्रिक टन कचरा निकलता है। हर भारतीय, एक साल में पॉलीथीन झिल्ली के रूप में औसतन आधा किलोग्राम कचरा बढाता है। …तो हम क्या करें? क्या आदिम युग का जीवन जीएं? क्या गरीब के गरीब ही बने रहें? आप यह प्रश्न कर सकते हैं। ढांचागत और आर्थिक विकास के पक्षधर भी यही प्रश्न कर रहे हैं।

जवाब है कि भारत सबसे पहले अपने से प्रश्न करें कि यह खोना है कि पाना? सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को विकास का सबसे अच्छा संकेतक मानने से पहले सोचना होगा कि जिन वर्षों में जीडीपी दर सर्वोच्च रही, उन्हीं वर्षों में किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े ज्यादा क्यों रहे? इस समय की सीख और समझदारी यही है कि सभी देश विकास की ऐसी रूपरेखा को अंजाम दें जिसमें कुदरत भी बचे और हमारी आर्थिक, सामाजिक व निजी खुशियां भी। वरना याद रखें कि प्रकृति, सेहत, खेती और रोजगार पर संकट अकेले नहीं आते, अनैतिकता और अपराध को ये साथ लाते हैं।

फिक्की द्वारा कराए एक सर्वेक्षण में शामिल भारतीय उद्योग जगत के साठ प्रतिशत उत्तरदाताओं ने माना कि कि पानी की कमी या प्रदूषण के कारण उनके उद्योग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। क्या करें? नैतिक और कानूनी… दोनों स्तरों पर यह सुनिश्चित करें कि जो उद्योग जितना पानी खर्च करे, वह उसी क्षेत्र में कम से कम उतने पानी के संचयन का इंतजाम करे। प्राकृतिक संसाधन के दोहन, कचरे के निष्पादन, शोध और पुन: उपयोग को लेकर उद्योगों को अपनी क्षमता और ईमानदारी, व्यवहार में दिखानी होगी। सरकार को भी चाहिए कि वह पानी-पर्यावरण की चिंता करने वाले कार्यकर्ताओं को विकास-विरोधी बताने के बजाय, समझे कि पानी बचेगा, तो ही उद्योग बचेंगे।

पर्यावरण को लेकर बढ़ते विवाद, बढ़ती राजनीति, बढ़ता बाजार, बढ़ते बीमार, बढ़ती प्यास और घटती उपलब्धता को देखते हुए इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि पर्यावरण, विकास को प्रभावित करने वाला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता जितनी घटती जाएगी, विकास के सभी पैमाने हासिल करने की चीख-पुकार उतनी बढ़ती जाएगी। अत: चाहे नमामि गंगे का संकल्प सिद्ध करना हो या स्वस्थ, स्वच्छ, सक्षम और डिजिटल भारत का, स्वच्छ… प्रकृति निर्मित ढांचों और मानव निर्मित ढांचों के बीच संतुलन साधना ही इसका समाधान है। उपभोग घटाएं, सदुपयोग बढ़ाएं और प्राकृतिक संसाधनों की समृद्धि भी। वक्त की मांग यही है।

याद रहे कि संपूर्ण विकास, कभी एकांगी या परजीवी नहीं होता। वह हमेशा सर्वजीवी, सर्वोदयी, समग्र और कालजयी होता है। आर्थिक, भौतिक, सामुदायिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, लोकतांत्रिक, मानसिक, प्राकृतिक आदि का समावेश उसे समग्र बनाता है। सबका साथ सबका विकास के नारे में समग्र विकास की यह परिभाषा स्वत: निहित है। नारा चुनौतीपूर्ण है तथा इसे व्यवहार में उतारना और भी चुनौतीपूर्ण। पर इस नारे को व्यवहार में उतारे बगैर, न विकास का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है और न पर्यावरणीय लक्ष्य।

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