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राजनीतिः नशे में गर्क होते लोग

यह कैसा अंतर्विरोध है कि राज्य का एक विभाग (आबकारी) इससे राजस्व वसूली के लिए काम करता है और दूसरा (मद्यनिषेध विभाग) नशा मुक्ति अभियानों, विज्ञापनों पर खर्च करता है! सोचा जाना चाहिए कि राजस्व से होने वाला लाभ ज्यादा है या विज्ञापनों और अभियानों पर होने वाला खर्च?

Author Published on: March 30, 2017 2:17 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

ज्योति सिडाना

एक वाक्य सामान्यत: सब जगह लिखा पाया जाता है- ‘पहले मैं शराब पीता था अब शराब मुझे पीती है, पहले पीता था थोड़ी-थोड़ी अब तो बोतल भी थोड़ी लगती है।’ मादक पदार्थ व्यसन से अभिप्राय उन पदार्थों से है, जिनके सेवन से नशे का अनुभव होता है और लगातार सेवन से व्यक्ति उसका आदी बन जाता है। यह एक मनोविकार है, क्योंकि जिस नशे के सेवन की लत हो जाए उसके बिना जीवन की निरंतरता असंभव लगती है। आदत बदलना आसान हो सकता है, पर लत से पीछा छुड़ाना मुश्किल लगता है। चिकित्सक भी मानते हैं कि नशीले पदार्थों का सेवन अनेक बीमारियों की जड़ है। मादक पदार्थों के व्यसन को तीन तरह से समझा जा सकता है। पहला, फैशन के रूप में। कुछ जगह इनका सेवन प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया है, बच्चे या किशोर खुद को बड़ा दिखाना, जल्दी युवा होना चाहते हैं, इसलिए इनका सेवन शुरू कर देते हैं। दूसरा, कुछ लोग मित्रों के दबाव में आकर या घर के किसी सदस्य को नशा करते देख कर ये आदतें अपना लेते हैं। उनका कहना है कि इससे आनंद की प्राप्ति होती है, आत्मविश्वास बढ़ाने और ऊर्जा प्राप्त करने में मदद मिलती है। तीसरा है राजनीतिक-अर्थवाद के रूप में। इसके अनुसार नशीले पदार्थों के सेवन को दो नजरिए से देख सकते हैं: एक तात्कालिक और दूसरा दूरगामी संदर्भ। तात्कालिक संदर्भ के अनुसार नशीले पदार्थों के बाजार से राजस्व की प्राप्ति होती है, जो किसी भी समाज के विकास के लिए आवश्यक है, और दूरगामी संदर्भ में इसके सेवन से श्रमशक्ति कमजोर होती है, बेकार हो जाती है, मानव पूंजी नष्ट होती है, गैर-उत्पादक बन जाती है। इस प्रकार दूरगामी संदर्भ के सामने तात्कालिक संदर्भ की उपेक्षा की जा सकती है। मसलन, अगर सरकार को सौ रुपया राजस्व मिलता है, तो नशे के कारण होने वाली दुर्घटनाओं में मरने या घायल होने वालों को दी जाने वाली क्षतिपूर्ति एक हजार रुपया होती है। यहां यह सोचने की जरूरत है कि नुकसान किसमें ज्यादा है?

यह भी एक तथ्य है कि नशे का वैश्विक बाजार युवा शक्ति को निर्बल करने का अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र है। अगर शत्रु देश कमजोर है तो हमें हराने, हमारी अर्थव्यवस्था को नष्ट करने या समाज में बिखराव लाने के लिए ड्रग्स का बाजार विकसित करता है। इस संदर्भ में मुंबई और पंजाब का उदहारण लिया जा सकता है। एक अध्ययन के मुताबिक पंजाब में 75 फीसद युवा मादक पदार्थों की चपेट में हैं, 67 फीसद घरों में कम से कम एक व्यक्ति इनका सेवन करता है, और हर सात दिन में एक व्यक्ति की नशे से मौत होती है। प्रतिवर्ष धूम्रपान करने से दस लाख लोगों की मौत होती है, जो कुल मौतों का दस फीसद है। 15-29 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों में धूम्रपान की लत बढ़ी है, जहां ग्रामीण क्षेत्रों में यह वृद्धि छब्बीस फीसद है, वहीं शहरी क्षेत्रों में यह अड़सठ फीसद है। हाल ही में टोरंटो विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार भारत में अट्ठारह साल की उम्र में धूम्रपान करने वाले पुरुषों की संख्या में छत्तीस फीसद वृद्धि हुई है। मुंबई में भी ड्रग्स माफिया और राजनीतिक संरक्षण के कारण ड्रग्स का कारोबार बढ़ रहा है।

एक राष्ट्रीय दैनिक में छपी रिपोर्ट के अनुसार 2016 में भारत नशाखोरी में दुनिया में दूसरे स्थान पर है (10.80 करोड़ पुरुष और 1.1करोड़ महिलाएं), जो एक भयावय आंकड़ा है। पिछले दस साल में जहरीली शराब से मरने वालों की संख्या 11,032 है। रिपोर्ट का यह भी मानना है कि तमाम पियक्कड़ पुरुष पीने के बाद अपनी पत्नी और बच्चों के साथ हिंसा करते हैं, कई परिवार तबाह हो जाते हैं, तलाक की दर और सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि हुई है। शायद पंजाब भी नशे के चुंगल में आ जाने के कारण एक संपन्न से विपन्न राज्य की श्रेणी में आ गया है।

नशे की लत बढ़ने की कुछ वजहें साफ हैं: परिवार और अनौपचारिक समूहों के नियंत्रण का आभाव, ड्रग्स की सुलभ उपलब्धता, मित्र समूहों की भूमिका, अपरिचितता और एकाकीपन को समाप्त करने का माध्यम, तनाव, अस्थिरता, असुरक्षा, अलगाव, भय, विफलता, कुंठा, निर्धनता, शक्ति संकेंद्रण के प्रभाव, अपराध हेतु प्रोत्साहन, विद्यार्थियों का देर रात जाग कर पढ़ाई करने के लिए सिगरेट का सहारा लेना ताकि नींद भगा सकें, पार्टी और अन्य उत्सवों में सबके पीने और एक के न पीने पर व्यंग्य का हिस्सा बनना या प्रोटोकॉल का उल्लंघन माना जाना आदि अनेक कारण हो सकते हैं। शराब के सेवन को कुछ त्योहारों पर स्वीकृति भी प्राप्त है। हंड की एक रिपोर्ट के अनुसार 76 फीसद फिल्मों में तंबाकू और 72 फीसद फिल्मों में सिगरेट/ शराब का सेवन धड़ल्ले से दिखाया जाता है। 2005 में इस पर प्रतिबंध लगाया गया था, पर 2009 में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इसे हटा दिया गया। अब केवल चेतावनी लिखी जाती है। इसी तरह 2008 में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान, 2004 में स्कूलों से लगभग तीन सौ मीटर के दायरे में तंबाकू/ गुटखे की बिक्री और सेवन पर प्रतिबंध लगाया गया। इसके बाद भी नशाखोरी में हम विश्व में दूसरे स्थान पर हैं।

इसका प्रभाव केवल देश की अर्थव्यवस्था पर नहीं, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार, विवाह संबंधों, रोजगार, व्यक्तित्व विकास, नियम-कानून का उलंघन्न, अनुशासनहीनता आादि पर भी पड़ता है। व्यक्ति की नजर से देखे तो उसकी कार्यक्षमता में कमी आना, कुशलता में कमी, समय पर काम न कर पाना, कार्यक्षेत्र में अक्सर अनुपस्थित रहना, झगड़ा, दुर्घटना, गलत व्यवहार करना, तनाव, कुंठा, अनिद्रा का शिकार होना, स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव आदि देखे जाते हैं। दूसरी तरफ, व्यक्ति का अपने आर्थिक दायित्वों को पूरा न कर पाना, नशे के लिए घर के सामान बेचना, उधार लेना, आपराधिक गतिविधियों में संलग्न होना, सामाजिक मूल्यों और आत्मनियंत्रण में कमी आना, पारिवारिक संघर्षों, महिलाओं के विरुद्ध हिंसा में वृद्धि, सड़क दुर्घटनाएं, विभिन्न गुटों में तनाव, अपराधों में बढ़ोतरी, जुआ, वेश्यावृति, ऋणग्रस्तता आदि, पूरा परिवार अपने उस सदस्य की इन आदतों पर शर्म महसूस करता है, समाज में उसकी प्रतिष्ठा पर नकारात्मक असर पड़ता है। वैश्वीकरण ने शराब के सेवन को भी खुलापन दिया है और इसके लिए मारपीट करना आम घटनाएं हो गई हैं। सामान्यत: लोग शराब के सेवन को न्यायसंगत बता कर वैधता प्रदान करते हैं, जैसे कुछ लोग अपनी समस्याओं के तात्कालिक निदान के लिए शराब का सेवन करते हैं। उनका मानना है कि ऐसा करने से कुछ समय के लिए वे अपनी समस्याओं से छुटकारा पा लेते हैं।

यह कैसा अंतर्विरोध है कि राज्य का एक विभाग (आबकारी) इससे राजस्व वसूली के लिए काम करता है और दूसरा (मद्यनिषेध विभाग) नशा मुक्ति अभियानों, विज्ञापनों पर खर्च करता है! सोचा जाना चाहिए कि राजस्व से होने वाला लाभ ज्यादा है या विज्ञापनों और अभियानों पर होने वाला खर्च? भारत एक कल्याणकारी राज्य है और किसी भी राज्य का यह मूल दायित्व है कि वह अपने नागरिकों को एक शिष्ट, सुरक्षित, स्वस्थ और विकासोन्मुखी जीवन पद्धति प्रदान करे। इसलिए राजस्व की परवाह किए बिना नशे के विभिन्न साधनों पर नियंत्रण आवश्यक है।

यह भ्रम है कि मादक द्रव्यों का सेवन तनाव से मुक्त करता है। दरअसल, यह एक मनो-सामाजिक-चिकित्सकीय समस्या है, इसके समाधान के लिए संपूर्ण प्रयास की जरूरत है। एक स्वस्थ राष्ट्र का विकास उसके स्वस्थ नागरिकों पर ही निर्भर करता है। एक ऐसा देश, जो गरीबी और बेकारी का सामना कर रहा हो, उसमें विलासिता के नाम पर शराब या अन्य नशे पर व्यय एक अपराधिक कृत्य माना जाना चाहिए।

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