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संदर्भः असहमति और संवाद

लोकतंत्र असहमति के बीच संवाद ही नहीं, परस्पर सम्मान की व्यवस्था भी है।
Author April 16, 2017 03:00 am
रवींद्रनाथ ठाकुर और गांधी में समानताएं कम, असमानताएं ज्यादा हैं। इसका मूल कारण एक का कवि और दूसरे का राजनीतिक होना भी है। सबसे दिलचस्प बात है कि दोनों की पारस्परिकता में हमें परस्पर पूरकता के भी दर्शन होते हैं।

लोकतंत्र असहमति के बीच संवाद ही नहीं, परस्पर सम्मान की व्यवस्था भी है। पर संवाद विमुखता के आलम में सम्मान की कौन कहे, संवाद की भी गुंजाइश नहीं रह जाती। राष्ट्रीय जीवन और लोकतंत्र के भविष्य के लिए बेहद जरूरी है कि हम असहमति से संवाद करना सीखें और उसका सम्मान करें। यह तो सब जानते हैं कि रवींद्रनाथ ठाकुर और गांधी के बीच बहुत घनिष्ठ संबंध थे, लेकिन बहुतों को इस बात का इल्म नहीं कि दोनों के बीच गंभीर असहमतियां भी थीं। रवींद्रनाथ ठाकुर और गांधी के बीच हुए पत्राचार इसका पता देते हैं।
रवींद्रनाथ ठाकुर कवि थे और गांधी राजनीतिक व्यक्ति। दोनों की अंतरराष्ट्रीय पहचान थी। ठाकुर अपनी कविता में आत्मा की मुक्ति का गान गा रहे थे तो गांधी दक्षिण अफ्रीका में स्वाधीनता का अनोखा संघर्ष चला चुके थे। गांधी जब भारत की राष्ट्रीय राजनीति में आए, उस समय तक ठाकुर को नोबेल पुरस्कार मिल चुका था। इन दोनों को ही एक-दूसरे के महत्त्व का बोध था और उनके लिए पर्याप्त सम्मान भी। गांधी इसे अच्छी तरह महसूस कर रहे थे कि विश्व मानवता को भारत का जो संदेश है, ठाकुर अपनी कविता में उसका गान कर रहे हैं। इसी तरह ठाकुर गांधी को देश की नैतिक शक्ति के रूप में देखते और स्वीकार करते थे।

ठाकुर और गांधी के बीच हुए पत्राचार दोनों की आपसदारी पर पर्याप्त प्रकाश डालते है। रवींद्रनाथ ठाकुर मानते थे कि स्वाधीनता की महान भेंट जनता को दान में कभी नहीं मिल सकती। वे कहते हैं कि ‘हमको इसे उपलब्ध करने के लिए जीतना होगा और भारत को इसे जीतने का अवसर तब आएगा जब यह सिद्ध कर देगा कि चारित्रिक रूप से यह उन लोगों से श्रेष्ठतर है, जो विजेता होने के अधिकार से उस पर शासन करते हैं।’

ठाकुर राष्ट्रीय राजनीति में गांधी के आगमन का इसीलिए खुले मन से स्वागत करते हैं कि उन्हें इस बात पर पूरा भरोसा था कि उधार की कूटनीतिक बेईमानी में डूबी भारतीय राजनीति की कमजोरी को दूर करने में गांधी सक्षम सिद्ध होंगे।
जिस समय ठाकुर गांधी पर यह भरोसा कर रहे थे ठीक उसी समय उनके मन में कुछ आशंकाएं भी थीं, जिन्हें उन्होंने छिपाया नहीं। वे लिखते हैं- ‘इसी कारण मैं अत्यंत हार्दिक रूप से प्रार्थना करता हूं कि आपके मार्ग में कोई रोड़ा न अटके, जिससे हमारी आध्यात्मिक स्वाधीनता कमजोर पड़ जाए, ताकि (जिससे) सत्य के लिए की गई शहादत कभी मात्र शाब्दिक आग्रह का रूप लेकर पथ भ्रष्ट न हो जाय और पवित्र नामों की आड़ में धीरे-धीरे आत्म प्रवंचना में परिवर्तित न हो जाय।’
ठाकुर और गांधी के आपसी संबंध का इतिहास हमें बहुत कुछ सिखाता है। इन दोनों का संबंध हमें अंधश्रद्धा और अंध विरोध के दो ध्रुवांतों पर बने रहने की सरल (मूर्ख)ता से बचाता है। इस इतिहास से हम न केवल असहमति का सम्मान करना सीखते हैं, बल्कि असहमति से संवाद की तमीज भी सीखते हैं। असहमति से संवाद की तमीज का अर्थ है लोकतंत्र की बुनियादी प्रकृति को जानना और उसे बरतना।

ठाकुर और गांधी के बीच समानताएं कम, असमानताएं ज्यादा हैं। इसका मूल कारण एक का कवि और दूसरे का राजनीतिक होना भी है। सबसे दिलचस्प बात है कि दोनों की पारस्परिकता में हमें परस्पर पूरकता के भी दर्शन होते हैं। इस तथ्य को गांधी ने अपने एक पत्र में स्वीकार किया है- ‘मैं संपूर्ण नम्रता के साथ इतना कह दूं कि हमारे कार्य और व्यापार एक-दूसरे के पूरक हैं।’ यह बात गांधी ने तब कही जब दोनों मनीषियों में स्वराज्य, असहयोग और चरखा जैसे मुद्दों पर बहस चल रही थी। ठाकुर चरखा को बाह्य उपादान मानते थे और उन्हें लगता था कि इससे आत्मिक स्वतंत्रता हासिल करने में बाधा आएगी। ठाकुर यहां तक कह देते हैं कि ‘चरखा घुमाने से मनुष्य चरखे का ही अंग बन जाता है, यानी वही करता है, जो मशीन से भी किया जा सकता है। वह अपनी जीवंत ऊर्जा को पहिया घुमाने में निर्जीव कर देता है।… वह मशीन बन जाता है- एकाकी और संगी-साथी विहीन।’ ठाकुर का तर्क है कि ‘कोई भी बाहरी अनुष्ठान चित्त की दीनता से ऊपर उठ कर स्वराज्य की स्थापना नहीं कर सकता।’ जबकि गांधी के लिए चरखा भारत के मन को बदलने का साधन था। वे चरखा के माध्यम से मैनचेस्टर को चुनौती दे रहे थे। तभी तो उन्होंने कवि को भी रोज आधे घंटे चरखा चलाने का सुझाव दिया- ‘यदि कवि भी इस प्रकार रोजाना आधा घंटा कातें तो उनकी कविता और निखरेगी। कारण, तब उनकी कविता में गरीबों के दुख-दर्दों का आज की अपेक्षा कहीं अधिक सशक्त चित्रण होगा।’

ठाकुर और गांधी के बीच यह बहस कवि और राजनीतिक के विश्वविदृष्टियों के बीच की बहस है। ठाकुर समग्र स्वराज्य की बात करते हैं और गांधी का जोर स्वराज्य के व्यावहारिक रूप पर ज्यादा है। इस संवाद क्रम में ठाकुर कहते हैं कि ‘महात्मा के महान नैतिक व्यक्तित्व से अधिक चमत्कारपूर्ण मेरे लिए अन्य कुछ नहीं है। उनके रूप में विधाता ने हमें शक्ति की विद्युत ज्वाला दी है। मेरी प्रार्थना है कि ईश्वर इस शक्ति से भारत को सामर्थ्य दे, न कि इसे अभिभूत करें।’ जबकि गांधी ‘कवि को एक प्रहरी के रूप में मानते हैं, जो धर्मांधता, अकर्मण्यता, असहिष्णुता नामक आने वाले शत्रुओं के विरुद्ध हमें सचेत कर रहे हैं।’ तीखी असहमतियों के बीच परस्पर विश्वास और समझदारी का यह अनूठा रिश्ता विरोध के साथ संवाद के लिए काफी कुछ सिखाता है।

कवि और महात्मा भारत की परंपरा में गहरे धंसे हुए हैं। संवाद और बहस, तर्कशीलता और तथ्यपरकता भारतीय परंपरा का अनिवार्य अंग हैं। मजे की बात यह है कि दोनों शख्शियतें न केवल आपस में, बल्कि विश्व मानवता से संवाद करते हुए परंपरा की ठोस जमीन पर खड़ी करती हैं।
दोनों ऋषियों की वाणी और कर्म में मध्यकाल के संत कवियों के बताए आदर्श गंूज रहे हैं। दोनों के सत्य अर्जित सत्य हैं। इसीलिए दोनों अपनी-अपनी जगह दृढ़ता से खड़े हैं। गांधी कहते हैं कि ‘जब युद्ध चल रहा हो तो कवि अपनी वीणा उठा कर रख देता है- युद्ध कि समाप्ति पर ही कवि की वीणा से सच्चे स्वर निकलेंगे।’ लेकिन ठाकुर बिल्कुल दूसरे ध्रुव पर खड़े होकर कहते हैं- ‘कवि को अपनी वीणा किसी भी समय उठा कर नहीं रखनी चाहिए।’
सच पूछिए तो दोनों मनीषियों के प्राणों में प्रभात काल के सूर्य की किरणें समाई हुई थीं, जिनके आलोक में दोनों प्राणों के साधन से भारत वर्ष के तीर्थ को सजा संवार रहे थे। ईमानदार असहमतियां दोनों की शक्ति बनीं। गांधी सही थे कि दोनों के कार्य और व्यापार एक-दूसरे के पूरक थे। गांधी और ठाकुर के इस पत्राचार से, ईमानदार असहमति से संवाद का सलीका और उसके लिए सम्मान सीखा जा सकता है। यह सीख लोकतंत्र को मजबूती देगी, साथ ही हमारे अंत:करण के आयतन का विस्तार करेगी।

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