Opinion on demonetizaion Result - Jansatta
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तल्ख हकीकत से उठता पर्दा

अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने जब कहा था कि नोटबंदी का कदम न समझदारी भरा है और न मानवीय, तब नोटबंदी से कालाधान और भ्रष्टाचार मिटाने का राग आलापने वाले कुछ लोगों ने इसे महज मजाक बताया था।

अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने जब कहा था कि नोटबंदी का कदम न समझदारी भरा है और न मानवीय, तब नोटबंदी से कालाधान और भ्रष्टाचार मिटाने का राग आलापने वाले कुछ लोगों ने इसे महज मजाक बताया था।

अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने जब कहा था कि नोटबंदी का कदम न समझदारी भरा है और न मानवीय, तब नोटबंदी से कालाधान और भ्रष्टाचार मिटाने का राग आलापने वाले कुछ लोगों ने इसे महज मजाक बताया था। लेकिन अब जैसे-जैसे जमीनी हकीकत सामने आ रही है, वैसे-वैसे लोगों को समझ में आने लगा है कि बिना तैयारी के और महज हड़बड़ी में किए गए उस फैसले ने देश को कितनी दूर तक एक बड़ी समस्या में उलझा दिया है। हाल में मंदसौर में कई किसानों के मारे जाने की घटना सामने आई और अब भी मध्य प्रदेश से लेकर महाराष्टÑ जैसी जगहों पर चल रहा किसान आंदोलन अपने दायरे में बड़ा होता जा रहा है। वहां के किसानों ने कर्ज के बोझ और न्यूनतम समर्थन मूल्य के अपने मुद्दे के अलावा जो सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्या बताई, वह नोटबंदी के फैसले को आईना दिखाता है। क्या यह तथ्य सरकारी या गैरसरकारी अध्ययनों में कभी दर्ज नहीं हुआ था कि इस देश के ज्यादातर किसान अपनी फसलों की खरीद-बिक्री से लेकर अपने बाकी कामों के लिए किस तरह नकदी पर निर्भर हैं, कितने इंटरनेट शिक्षित हैं और ऐसे में नकदीरहित हो जाने के दावे की जमीन कितनी खोखली है? एक तरफ बाजार में पर्याप्त नकदी नहीं होने से ज्यादातर किसान अपनी फसल बेचने के लिए बाजार में नहीं ला रहे हैं और दूसरी ओर बहुत सारे किसानों के बैंक खाते न होने की हकीकत के बीच बैंकों से रुपए निकासी की सीमा तय कर दिए जाने के बाद कैसी समस्या खड़ी हुई होगी, क्या इसे समझना इतना मुश्किल है?

वहीं, पिछले कुछ महीनों के दौरान मनरेगा के तहत मिलने वाले रोजगार में तेईस फीसद कमी आने के तथ्य की अनदेखी करते हुए अगर यह कहा जाता है कि नोटबंदी कामयाब रही तो यह उन परिवारों के दुखों पर पर्दा डालना है जिनकी जीविका मनरेगा के भरोसे चल रही थी। खुद प्रमुख उद्योग संगठन एसोचैम सरकार को चेतावनी दे चुका है कि नोटबंदी की वजह से कई क्षेत्रों में नौकरियों का जाना बदस्तूर जारी है, किसान और मजदूर वर्ग इसके असर में बुरी तरह मारे जा रहे हैं। इसका सीधा असर सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों पर पड़ना तय है। और यह जीडीपी के हाल में आए आंकड़ों से भी जाहिर हुआ कि इसमें करीब दो फीसद की कमी आई। आखिर सरकार के पास इस सवाल का क्या जवाब है कि इतने बड़े नुकसान की वजह सिर्फ उसका एक हड़बड़ी भरा फैसला है?

अब हालत यह है कि विभिन्न संस्थानों, शोध समूहों और खुद रिजर्व बैंक ने नोटबंदी की वजह से अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव की बात मानी है। नोटबंदी के शुरुआती दौर में विशेषज्ञ माने जाने वाले जो कुछ लोग इसका समर्थन कर रहे थे, उन्होंने अब साफतौर पर ‘मिया कल्पा’ या गलती मानने का समय बताना शुरू कर दिया है। अगर ऐसे लोग यह कहें कि नोटबंदी वह आखिरी कदम था, जिसने किसानों की कमर तोड़ दी और उसके बाद ही किसानों के विरोधों का सिलसिला या कर्ज माफी की मांग उठनी शुरू हो गई तो समझा जा सकता है कि नोटबंदी के सतही फैसले के नीचे कितनी परतें ढकी गई थीं। सच यह है कि लगातार पड़े सूखे के दो दौर ने भी नोटबंदी जितना नुकसान नहीं पहुंचाया था।
आमतौर पर अर्थव्यवस्था के मसले पर एक देश द्वारा दूसरे देशों की स्थिति पर तंज कसने के हालात कम देखे गए हैं। लेकिन हाल में जब जीडीपी में बड़ी गिरावट के आंकड़े आए तो भारत के प्रतिद्वंद्वी चीन में लोगों को यह तक कहने का मौका मिला कि भारत की अर्थव्यवस्था में मौजूदा गिरावट नोटबंदी के फैसले की वजह से आई है। ग्लोबल टाइम्स की एक रिपोर्ट में कहा गया कि ‘हाथी बनाम ड्रैगन’ की लड़ाई में भारत को शायद गहरा झटका लगा। नोटबंदी की वजह से भारत की अर्थव्यवस्था काफी नीचे गई और इसने पहली तिमाही में चीन को सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था बनने में मदद की।

हालांकि, नोटबंदी के फैसले के कुछ समय बाद ही इस बात के आकलन आने शुरू हो गए थे कि इसकी वजह से लघु उद्योगों से लेकर दूसरे तमाम क्षेत्रों में रोजगारों पर बुरा असर पड़ना तय है। संगठित क्षेत्र में रोजगार में कटौती के सही-गलत आंकड़े आ जाते हैं, लेकिन नोटबंदी के बाद ठप हुए निर्माण क्षेत्र में लगे कितने दिहाड़ी मजदूर काम के लिए मारे-मारे फिरने लगे, कितने मजदूरों को काम के अभाव में अपने गांव लौटना पड़ा, इसका आंकड़ा कहीं सामने नहीं आ पाता है। बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के ग्रामीण इलाकों में शहरों से लौटे मजदूरों की व्यथा अर्थशास्त्रीय भाषा में जाहिर नहीं होगी, लेकिन उनकी तकलीफ का अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। उनके बेरोजगार हो जाने की हालत में बेशक प्रत्यक्ष समस्याओं का सामना उन्हें करना पड़ा। लेकिन अगर पैसे की किल्लत की हालत में कोई मजदूर या फिर कोई भी व्यक्ति बाजार में खरीदारी करने में कटौती करता है तो उसका आखिरी नुकसान किसे उठाना पड़ेगा?

खरीद-बिक्री में अचानक इतनी बड़ी गिरावट के बाद देश की अर्थव्यवस्था की क्या हालत होगी, क्या इसका अंदाजा लगाना इतना मुश्किल था?
नकदीरहित अर्थव्यवस्था के दावों की हकीकत इतने ही दिनों में सामने आ चुकी है कि बिना बुनियादी ढांचा खड़ा किए अगर ऐसे दावे किए जाते हैं तो उसका नतीजा कितना हास्यास्पद हो सकता है। आखिर क्या वजह है कि दबाव के तहत नकदीरहित लेन-देन के एक छोटे दौर में ही इसका उपयोग करने वाले लोग भी निराश हो रहे हैं? क्यों ऐसे आकलन सामने आने लगे हैं कि 2008 की वैश्विक मंदी के दौर में भारत अगर बचा रह गया तो इसलिए कि यहां ज्यादातर लोग नकदी आधारित अर्थव्यवस्था के हिस्से रहे?
अब अगर सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक स्टेट बैंक आॅफ इंडिया ने यह आशंका जताई है कि नोटबंदी के कारण अर्थव्यवस्था पर न केवल मंदी का असर अभी जारी रहेगा, बल्कि इससे बैंकों के कारोबार पर भी विपरीत असर पड़ेगा, तो इसकी सफाई में क्या बच जाता है।

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