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राजनीतिः लोकतंत्र के नाजुक पहलु

वर्तमान निर्वाचन प्रणाली का सारा आधार वैयक्तिक मतदाताओं की मतगणना है, जिसकी विधि प्रचलित पद्धति के अनुसार कहीं कम, कहीं अधिक जटिल होती है। इसका अनिवार्य परिणाम यह होता है कि प्रत्याशियों को चुनाव जीतने के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा की कीमत पर भी तरह-तरह के हथकंडे अपनाने पड़ते हैं।

Author January 26, 2017 2:04 AM
सुप्रीम कोर्ट

लोकतंत्र को ‘जनता द्वारा जनता का शासन’ या ‘जनप्रतिनिधि द्वारा राष्ट्र का शासन’ कहा गया है। कहने में ये बहुत आकर्षक बातें हैं, जिनसे जनमन में उत्साह का संचार होता है, पर आज तक जनता कहीं भी अपने को शासित नहीं कर सकी और न यह संभव है। सरकारों का संचालन सदा थोड़े से विशिष्ट अभिजात कुलों के हाथ में रहा है, जिसका साफ मतलब है कि बहुतों पर थोड़ों का शासन यानी कुलीन तंत्रात्मक शासन व्यवस्था। संसदीय लोकतंत्र में जनता से लिए गए विशिष्ट व्यक्तियों का चयन राजनीतिक दल करते हैं, जिन्हें चुनाव में जनता अपना मत देकर संसद या विधानसभाओं के लिए चुनती है। कहीं-कहीं कुछ निर्दल उम्मीदवार भी जीत जाते हैं, पर अधिसंख्य उम्मीदवार राजनीतिक दलों के विजयी होते हैं और उनकी या दलों के गठबंधन की ही सरकार बनती है। पर संसदीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा मौलिक दोष है कि यह वैयक्तिक मतदान पर आधारित है। समाज का बिखरा स्वरूप ही इस प्रकार की राजनीतिक प्रणाली का जनक है। पर इससे इस बात में कोई अंतर नहीं पड़ता कि यह प्रणाली मिथ्या धारणाओं पर अवलंबित है- राज्य व्यक्तियों का योगात्मक स्वरूप नहीं हो सकता। जनता, राष्ट्र या समुदाय को वैयक्तिक मतदाताओं के समकक्ष नहीं रखा जा सकता।