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राजनीतिः हमारे पर्व और पर्यावरण

हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी, जो इकतीस अक्तूबर तक जारी रहेगी।
Author October 13, 2017 01:35 am
पटाखों पर बैन

रोहित कौशिक

यह विडंबना ही है कि लोक स्वास्थ्य के तकाजे को प्राथमिकता देने के बजाय कुछ लोग परंपरा की दुहाई देकर आतिशबाजी पर कोई नियंत्रण नहीं चाहते। लेकिन आतिशबाजी का चलन कितना पुराना है? क्या पटाखे बनने से पहले दीपावली नहीं मनाई जाती थी? आज सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरण संरक्षण की है। आगे इस तरह के कुछ और कदम उठाने पड़ सकते हैं।

हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी, जो इकतीस अक्तूबर तक जारी रहेगी। हालांकि न्यायालय ने कहा कि दिल्ली-एनसीआर में पटाखे की बिक्री की इजाजत देने वाला उसका बारह सितंबर का आदेश एक नवंबर से प्रभावी होगा। दरअसल, धार्मिक पर्वों से संबंधित आस्था हमारे अंदर एक नए आत्मविश्वास का संचार कर जिंदगी के सफर को बिना अवरोध के आगे बढ़ाने में सहायक होती है। लेकिन आस्था और समय के साथ जुड़ गए नए रिवाज में फर्क किया जाना चाहिए। पिछले दिनों जब केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने जल प्रदूषण रोकने के लिए गणेश और दुर्गा जी की मूर्तियों को नदियों में विसर्जित न करने के निर्देश दिए गए थे, तो कुछ लोगों ने इसे भारतीय जनमानस की आस्था पर हमला बताया था। लेकिन ये लोग यह क्यों नहीं समझ पा रहे कि प्रकृति की रक्षा न करके हम स्वयं अपनी आस्था पर हमला कर रहे हैं। प्रकृति की रक्षा की सीख हमारे शास्त्रों में दी गई है।

दीपावली दीपों का त्योहार है। हमें कोशिश करनी चाहिए कि यह पर्व हमारे जीवन में सच्चे अर्थों में प्रकाश लेकर आए। दरअसल, जब तक हम दीपों के साथ-साथ अपनी इच्छाशक्ति के प्रकाश से प्रदूषण रूपी अंधकार को मिटाने के लिए कृतसंकल्प नहीं होंगे तब तक हमें सच्ची खुशी नहीं मिल सकती। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम दीपावली के पावन पर्व पर पटाखों के धूम-धड़ाकों के बीच उस प्रदूषण रूपी अंधकार की आहट नहीं सुन पाते जो तेजी से हमारे जीवन को अपने शिकंजे में कसने के लिए चला आ रहा है। दीपावली पर आतिशबाजी से वायु और ध्वनि प्रदूषण बहुत अधिक बढ़ जाता है। इस दौरान वातावरण में कार्बन डाइआक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड और नाइट्रोजन आक्साइड जैसी गैसों की मात्रा आश्चर्यजनक रूप से बढ़ जाती है।

इसके अतिरिक्त विभिन्न जहरीले रसायन, फ्लोराइड्स और अनेक धातुओं की बढ़ोतरी भी वातावरण को प्रदूषित करती है। इस तरह दीपावली का यह प्रदूषण मनुष्य समाज, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं तथा प्राचीन ऐतिहासिक इमारतों पर भी अपना दुष्प्रभाव डालता है। वायु प्रदूषण के कारण मनुष्य को आंख, गले, चर्म व श्वसन तंत्र के अनेक रोग घेर लेते हैं। दीपावली पर सबसे अधिक परेशानी दमा, ब्रोंकाइटिस व दिल के मरीजों को होती है। इस दौरान जहां एक ओर दमे तथा ब्रोंकाइटिस के मरीजों की सांस उखड़ने लगती है वहीं दूसरी ओर दिल के मरीजों का रक्तचाप बढ़ जाता है। दीपावली पर वायु प्रदूषण से सिरदर्द और उल्टी के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।

पटाखों के शोर-शराबे से जीव-जंतुओं तथा मनुष्यों की जैविक क्रियाएं भी प्रभावित होती हंै। इस वायु प्रदूषण से पेड़-पौधों की पत्तियों में स्थित स्टोमेटा बंद हो जाते हैं, जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है; साथ ही साथ पत्तियों का क्यूटिकल नामक आवरण भी नष्ट हो जाता है। गौरतलब है कि क्यूटिकल पत्तियों के माध्यम से होने वाली अत्यधिक जल-क्षति को रोकता है। यह वायु प्रदूषण विभिन्न प्रकार की धातुओं, चमडेÞ, पेंट, पेपर, मार्बल आदि सामानों की क्षय-दर को बढ़ाता है। पिछले साल दीपावली पर हुई बेलगाम आतिशबाजी ने दिल्ली-एनसीआर के वातावरण को कैसा जहरीला बना दिया था इसे लोग भूले नहीं होगा। त्योहार के बाद कई दिनों तक भारी धुंध छाई रही, यातायात व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई थी और आखों में जलन के अलावा सांस लेने में तकलीफ और घुटन महसूस हो रही थी।

दीपावली के दौरान होने वाले वायु प्रदूषण से वातावरण में हानिकारक गैसों व तत्त्वों की मात्रा आश्चर्यजनक रूप से इस कदर बढ़ जाती है कि दीपावली के कई दिनों बाद तक वातावरण में इनकी मौजूदगी बनी रहती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सस्ते होने के कारण चीन में निर्मित पटाखों ने भारतीय बाजार पर अपना कब्जा जमा लिया है। हालांकि कुछ जगहों पर चीन में निर्मित पटाखे प्रतिबंधित कर दिए गए हैं लेकिन इसके बावजूद ये पटाखे बिक रहे हैं। इन पटाखों में सल्फर की मात्रा अधिक होती है। यही कारण है कि इन पटाखों के जलने पर वातावरण में सल्फर डाइआक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है। सल्फर डाइआक्साइड की अधिकता आंखों में जलन, सिरदर्द, श्वसन संबंधी रोग, कैंसर और हृदय रोग उत्पन्न करती है।

दरअसल हमारे देश में पटाखों की गुणवत्ता जांचने के लिए कोई ठोस नीति नहीं है। हालांकि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी (नई दिल्ली) पटाखों की ध्वनि का परीक्षण करके प्रमाणपत्र अवश्य प्रदान करती है, लेकिन आयातित पटाखों की गुणवत्ता जांचने के लिए कोई अधिकृत एजेंसी हमारे देश में फिलहाल नहीं है। हमारे देश में निर्मित पटाखे भी गुणवत्ता की दृष्टि से बहुत अच्छे नहीं होते और बड़ी मात्रा में वायु तथा ध्वनि प्रदूषण उत्पन्न करते हैं। दीपावली के दौरान वातावरण में सस्पैंडिड परटिकुलेट मैटर (एसपीएम) तथा रेस्पाइरेबल परटिकुलेट मैटर (आरपीएम) की मात्रा बढ़ने से अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। एसपीएम से दमा, कैंसर, फेफड़ों के रोग तथा आरपीएम से श्वसन संबंधी रोग व हृदय रोग होने की आशंका बढ़ जाती है।

पटाखों के कारण होने वाला ध्वनि प्रदूषण भी हमारे लिए हानिकारक सिद्ध हो रहा है। ध्वनि प्रदूषण के कारण सिरदर्द, बहरापन, अवसाद, अनिद्रा, दिल व तंत्रिका तंत्र के विभिन्न रोग पैदा हो रहे हैं। नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी, नई दिल्ली द्वारा किए गए एक शोध के अनुसार दीपावली के दौरान बाजार में बिकने वाले अधिकांश पटाखे 125 डेसिबल के ध्वनि-स्तर से अधिक आवाज करते हैं। संशोधित पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के अनुसार ध्वनि का स्तर 125 डेसिबल से अधिक नहीं होना चाहिए। दीपावली के दौरान ध्वनि प्रदूषण से दिल के मरीजों के अलावा पशु-पक्षी भी सहम जाते हैं और उनकी जैविक क्रियाएं मंद पड़ जाती हंै।

साल-दर-साल दीपावली की आतिशबाजी से होने वाली दुर्घटनाओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। पटाखा उद्योग में लगे कारीगरों तथा मजदूरों के साथ-साथ आतिशबाजी करने वाले बच्चे और बड़े भी इन दुर्घटनाओं के शिकार होते हैं। हाल ही में कुछ जगहों पर पटाखा उद्योग में हुई दुर्घटनाओं के कारण अनेक लोग मारे गए। कुल मिलाकर दीपावली की आतिशबाजी हमारे लिए परेशानी का सबब बनती गई है। इसलिए अब समय आ गया है कि हम परंपरा के नाम आतिशबाजी को अनिवार्य ठहराने के बजाय इसे मर्यादित करने तथा इससे पूरी तरह निजात पाने के भी कदम उठाएं।

निश्चित रूप से शुरू में ऐसे कदम की आलोचना होगी, जो कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर कुछ लोगों की नाराजगी भरी प्रतिक्रियाओं से भी जाहिर है। लेकिन आतिशबाजी से होने वाले नुकसान के बरक्स इस आलोचना की परवाह नहीं की जानी चाहिए। ऐसा कदम उठाते हुए हमें ध्यान रखना होगा कि पटाखा उद्योग में लगे मजदूरों का अहित न हो; इनकी रोजी-रोटी के लिए सरकार को इन्हें किसी दूसरे उद्योग में समायोजित करने की पहल करनी होगी।
बहरहाल, अब सरकार को आतिशबाजी को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित करने के बारे में गंभीरता से सोचना होगा, नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब दिवाली के कारण पर्यावरण का दिवाला निकल जाएगा। यह विडंबना ही है कि लोक स्वास्थ्य के तकाजे को प्राथमिकता देने के बजाय कुछ लोग परंपरा की दुहाई देकर आतिशबाजी पर कोई नियंत्रण नहीं चाहते। लेकिन आतिशबाजी का चलन कितना पुराना है? क्या पटाखे बनने से पहले दीपावली नहीं मनाई जाती थी? आज सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरण संरक्षण की है। इसलिए अभी देश के एक छोटे-से क्षेत्र में ही सही, दिवाली के अवसर पर पटाखों पर पाबंदी स्वागत-योग्य है। आगे इस तरह के कुछ और कदम उठाने पड़ सकते हैं।

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  1. K
    Kailash Ray
    Oct 13, 2017 at 4:08 pm
    आपकी बात ी है, परन्तु क्या यही नियम सारे धर्म पर.लागू नहीं किया जाना चाहिए..। आज भी जब कोई पार्टी चुनाव जीतती है त़ो जमकर आतिशबाजी होती है, किसी भी तरह के खेल में जीतने पर आतिशबाजी होती है..। याद है जब इसी दिल्ली में राष्ट्रमँडल खेल का आयोजन किया गया था तो उदघाटन समारोह मे कितनी आतिशबाजी हुई थी और पुरा का पुरा मिडिया इसे रँगारँग कार्यक्रम बता रहा था.। दीवाली के साथ साथ इसे क्रिसमस और नया साल में क्यों नहीं बैन किया गया तब यह पटाखे क्या आक्सीजन छोड़ेँगे.। जल्लीकट्टू पर जानवरों के साथ अत्याचार के नाम पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है पर बकरीद पर धर्म के नाम पर सब जायज है.। कोर्ट का फैसला ी है पर समय और नीयत गलत..।
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