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राजनीतिः बट्टेखाते का तहखाना

बैंकिंग क्षेत्र कमजोर तबकों का सहारा बनने में नाकाम हो रहे हैं। जबकि यही बैंक धनी वर्ग की सुख-सुविधाएं बढ़ाने, औद्योगिक क्षेत्र के वित्तीय स्रोत खोलने और कुप्रबंधन के चलते डूबने वाली कंपनियों को उबारने का जरिया बने हुए हैं। पर इस कवायद में बैंकों का एनपीए इतना बढ़ गया है कि बैंक तो आर्थिक रूप से खस्ताहाल हुए ही, देश की समूची अर्थव्यवस्था भी डावांडोल है।

जब देश में काला धन पर अंकुश लगाने की दृष्टि से नोटबंदी की गई हो और विमुद्रीकरण की इस प्रक्रिया पर संसद में बहस चल रही हो, तब तिरसठ बड़े उद्योगपतियों के करीब 7016 करोड़ रुपए बट्टे खाते में डालना चौंकाने वाला वाकया है। ज्यादा हैरानी इस बात पर है कि सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक यानी स्टेट बैंक आॅफ इंडिया ने भगोड़े विजय माल्या का कर्ज भी बट््टे खाते में डाल दिया है। जबकि कुछ समय पहले माल्या ने प्रस्ताव रखा था कि यदि उन्हें ससम्मान भारत आने की अनुमति मिलती है तो वह करीब छह हजार करोड़ रुपए चुकाने को तैयार हैं, जो कि उनके मुताबिक उनका वास्तविक कर्ज है। लेकिन बैंकों ने इस शर्त को मानने से इनकार कर दिया था। इसके पहले 30 जून 2016 तक एसबीआई ने 48,000 करोड़ रुपए गैर-निष्पादित संपत्ति (एनपीए) मानते हुए कर्ज माफ कर दिए थे।

इतनी बड़ी धनराशियों को एकाएक डूबा हुआ कर्ज मान लेना सरकारी बैंकों की सेहत और अर्थव्यवस्था पर बड़ा कुठाराघात है। इस नई स्थिति के निर्माण से माल्या के भारत आने का रास्ता खुल सकता है, क्योंकि कर्ज-माफी के बाद वह डिफाल्टर नहीं रह जाएगा। उस पर अन्य बैंकों का जो कर्ज शेष है, उसे वह चुकाने का बहाना करके भारत आ सकता है। सर्वोच्च न्यायालय का शिकंजा कसने पर विजय माल्या जिस चालाकी से देश छोड़ कर नौ दो ग्यारह हुआ था, उसी से अंदाजा लग गया था कि सरकार चाहे किसी भी पार्टी या गठबंधन की रही हो, पूंजीपतियों के पक्ष में इनकी कार्य-संस्कृति एक जैसी है। शराब का कारोबार और फिर किंगफिशर एयरलाइंस शुरू करने वाले विजय माल्या एक समय भले ही व्यापारिक कामयाबी की मिसाल रहे हों, लेकिन बाद में उनकी भूमिका भोगी-विलासी और कर्ज के बड़े खिलाड़ी के रूप में ही सामने आई है। कर्ज वसूली की सख्ती के चलते राज्यसभा सदस्य होने के बावजूद माल्या विदेश भाग गए। उससे उनकी भगोड़े की भूमिका भी सामने आई है। माल्या पर धन-शोधन से जुड़े मामलों पर सुनवाई करने वाली विशेष अदालत के आदेश पर प्रर्वतन निदेशालय ने माल्या की महज 1620 करोड़ रुपए की संपत्तियां ही अब तक कुर्क की हैं। लेकिन कर्जमाफी के बाद अब इस तरह की कार्रवाइयां बंद हो जाएंगी। क्योंकि बैलेंस शीट में माल्या की राशि डूबंत खाते में चली गई है। लिहाजा, इसका भुगतान असंभव मान लिया जाएगा।

वह कर्ज ही क्या,जो ब्याज समेत न लौटे? लेकिन ब्याज तो ब्याज, उद्योग जगत के बड़े कर्जदार, बैंकों का मूलधन भी नहीं लौटा रहे हैं। अब उन्होंने कर्ज वसूली से बचने के दो उपाय सोच लिए हैं। एक, दिवालिया घोषित होकर कानून के शिकंजे से बचे रहें। दूसरे, विदेश जाकर कानून को ठेंगा दिखाते रहें। पहले ललित मोदी ने ऐसा किया और अब विजय माल्या इसी राह पर हैं। माल्या पर सत्रह बैंकों का 9000 करोड़ रुपए बकाया है। इनमें से अकेली किंगफिषर कंपनी पर 7800 करोड़ रुपए का कर्ज था। माल्या को जिस दरियादिली से बैंकों ने कर्ज दिया और जिस ढंग से उन्होंने देश छोड़ा है, उससे लगता है कि जनता की इस गाढ़ी कमाई के डूबने-डुबाने के खेल में राजनीति, अधिकारी, कारोबारी और बैंक प्रबंधकों का पूरा एक तंत्र शामिल है। सरकारें उद्योगपतियों को घाटे से उबारने के लिए कर्ज माफी और नया कर्ज मसलन बेलआउट देती हैं। माल्या ने भी इस सुविधा का दोनों हाथों से लाभ उठाया है।

इसी तरह 2015 में 40,000 करोड़ रुपए का ऋण बट्टे खाते में डाल दिया गया था। आरबीआई की वित्तीय-स्थिति रिपोर्ट के मुताबिक भी बैंकों का 4,43,691 करोड़ रुपए का कर्ज डूबने के कगार पर है। इसमें सत्तर फीसद हिस्सा कंपनियों को दिए गए कर्ज का है। बैंकों को सुचारुरूप से चलाने के लिए 1.80 लाख करोड़ रुपए की जरूरत होती है, जो बढ़ते एनपीए के चलते बैंकों के पास नहीं रही है। सरकार चाहे मनमोहन सिंह की रही हो या अब नरेंद्र मोदी की, दोनों ने औद्योगिक जगत के हितों का संरक्षण बढ़-चढ़ कर किया है। इस बात की पुष्टि हाल ही में आए नए बजट से भी होती है। सरकार ने सत्तर हजार करोड़ रुपए की योजना बैंकों को डूबने से बचाने के लिए तैयार की है। इस बजट में इसके लिए पच्चीस हजार करोड़ रुपए का प्रावधान कर भी दिया गया है। जबकि सरकार को जरूरत थी कि वह माल्या जैसे कर्ज के खिलाड़ियों से धन-वसूली करती।

इस तथ्य से सभी भलीभांति परिचित हैं कि बैंक और साहूकार की कमाई कर्ज दी गई धनराशि पर मिलने वाले सूद से होती है। यदि ऋणदाता ब्याज और मूलधन की किस्त दोनों ही चुकाना बंद कर दें तो बैंक के कारोबारी लक्ष्य कैसे पूरे होंगे? हालात इतने बदतर हो गए हैं कि चालीस सूचीबद्ध बैंकों का 4,43,691 करोड़ रुपए डूबंत खाते में आ गया है। ऐसी कंपनियों की संख्या लगभग 1100 है, जो वर्षों से किस्त नहीं चुका रही हैं। चूंकि सरकार और बैंक इस कर्ज को वसूलने के लिए सख्ती से पेश नहीं आ रहे हैं, इसलिए यह आशंका भी पनप रही है कि सरकार और बैंकों की साठगांठ के चलते आम जनता की गाढ़ी कमाई की पूंजी हड़पने के लिए क्या कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों ने यह खेल सुनियोजित ढंग से चला रखा है?

इस नजरिए से मध्यप्रदेश में निर्माणाधीन महेश्वर विद्युत परियोजना में इस सच का खुलासा भी हुआ है। इस परियोजना को 1994 में मध्यप्रदेश विद्युत मंडल से छीन कर निजी कंपनी एस कुमार को दे दिया गया था। मगर दो दशक बीत जाने के बावजूद काम तो पूरा हुआ नहीं, अलबत्ता प्रदेश सरकार ने फिर से अधूरी योजना को पूरी करने की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली। इस दौरान कंपनी के कई करोड़ रुपए माफ कर दिए गए, बावजूद इसके कि एस कुमार पर परियोजना के लिए सार्वजनिक बैंकों का चौबीस सौ करोड़ रुपए बकाया है। एनपीए की सूची में एस कुमार का नाम पांचवें स्थान पर है।
कर्ज में डूबी 1129 ऐसी कंपनियां हैं, जिन पर निरंतर कर्ज बढ़ रहा है। देश के बैंकों में जमा पूंजी करीब अस्सी लाख करोड़ है। इसमें पचहत्तर प्रतिशत राशि छोटे बचतकर्ताओं और आम जनता की है। जन धन योजना के तहत जो नए खाते खुले हैं, उनसे भी बैंकों में करीब पच्चीस हजार करोड़ रुपए जमा हुए हैं। कायदे से तो इस पूंजी पर नियंत्रण सरकार का होना चाहिए, जिससे जरूरतमंद किसानों, शिक्षित बेरोजगारों और लघु व मझोले उद्योगपतियों की पूंजीगत जरूरतें पूरी हो सकें। लेकिन दुर्भाग्य से यह राशि बड़े औद्योगिक घरानों के पास चली गई है और वे न उसे केवल दाबे बैठे हैं, बल्कि गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। जबकि फसल उत्पादककिसान आत्महत्या कर रहा है।

देश में औद्योगिक घरानों को आसानी से हजारों करोड़ का कर्ज मिल जाता है, जबकि छोटे कर्जदारों को बैंकों के कई-कई चक्कर लगाने होते हैं। विसंगति यह भी है कि उद्योगों के लिए कम ब्याज दर पर कर्ज मिलता है। इन बाधाओं की वजह से नए उद्यमियों व नवोन्मेषियों को अपना कारोबार शुरू करना ही मुश्किल होता है। घर के लिए कर्ज लेना भी कठिन होता है। यही वजह है कि आम आदमी सूदखोर महाजनों के चगुंल में फंसता जा रहा है। ऐसी विषम कठिनाइयों के चलते माइक्रो फाइनेंस का धंधा पूरे देश में फला-फूला है। जबकि ये तीस फीसद की ऊंची सालाना ब्याज दर पर गरीब और मध्यवर्ग के लोगों को कर्ज देते हैं। लेकिन यह कर्ज का ऐसा दुश्चक्र है, जिसमें फंस कर व्यक्ति उबर नहीं पाता। यहां तक कि कई कर्जदार आत्मघाती कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं।
इस हकीकत से पता चलता है कि बैंकिंग क्षेत्र कमजोर तबकों का सहारा बनने में नाकाम हो रहे हैं। जबकि इसके विपरीत यही बैंक धनी वर्ग की सुख-सुविधाएं बढ़ाने, औद्योगिक क्षेत्र के वित्तीय स्रोत खोलने और कुप्रबंधन के चलते डूबने वाली कंपनियों को उबारने का जरिया बने हुए हैं। पर इस कवायद में बैंकों का एनपीए इतना बढ़ गया है कि बैंक तो आर्थिक रूप से खस्ताहाल हुए ही, देश की समूची अर्थव्यवस्था भी डावांडोल है। इसी डूबती अर्थव्यस्था को बचाने के लिए नोटबंदी की गई है।

कर्ज को सूद समेत नहीं लौटने का असर नई और अधूरी परियोजनाओं पर पड़ रहा है। दरअसल, कर्ज के रूप में दी गई धनराशि के लौटने से ही उसका फिर से निवेश संभव है। लेकिन एनपीए की समस्या को नीतिगत स्तर पर भी देखने की जरूरत है। भारत में किसी कंपनी को दिवालिया घोषित करने और उसकी संपत्ति की नीलामी की प्रक्रिया पूरी करने में लंबा समय लगता है। यह सच्चाई किंगफिशर के मामले में सामने भी आ चुकी है। नियमों में शिथिलता के चलते ही देश की अदालतों में दिवालिया घोषित करने और संपत्ति की कुर्की से जुड़े साठ हजार प्रकरण विचाराधीन हैं। लिहाजा, इन लचर नियमों को ‘चैक बाउंस’ से संबंधित मामलों की तरह चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत है। इस दृष्टि से बैंक द्वारा एक ही कंपनी और कंपनी समूह को कर्ज देने की सीमा भी निर्धारित करना जरूरी है। फिलहाल कोई बैंक अपनी कुल पूंजी का पच्चीस प्रतिशत तक सिर्फ एक कंपनी को और पचपन फीसद तक किसी एक कंपनी समूह को कर्ज दे सकता है। यह लोच बैंक अधिकारियों को उदारता से ऋण मंजूर करने का अधिकार देता है। बैंकों में कदाचरण भी ऐसे ही झोलों के चलते पनपा है।

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