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बेबाक बोलः है डर- टूटता तिलिस्म

साम-दाम-दंड-भेद...। जिस गुजरात में 22 साल से आपका तिलिस्म चल रहा, वहां आपको ये चारों हथियार क्यों इस्तेमाल करने पड़ गए?

शिवसेना सांसद ने कहा कि मोदी की लहर फीकी पड़ गई है और राहुल गांधी देश की अगुआई करने के काबिल हैं।

आपने अपनी पहचान गुजरात से ही बनाई है और आपकी ही जमीन पर राहुल गांधी आपकी शैली में जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स कह कर तालियां बटोर जाते हैं। एक ही साथ जय माता दी और जय भीम पर समाजशास्त्री हंस सकते हैं लेकिन जनता की तालियां बता रही हैं कि राहुल का निशाना सही लग रहा है। हार्दिक पटेल और राहुल गांधी की मुलाकात से आपके खुफिया कैमरे क्यों परेशान हैं और उस कांग्रेस के एजंट से भला आपको क्या डर हो सकता है जिससे भारत को मुक्त करने का आपने दावा किया था। शिवसेना सांसद ने कहा कि मोदी की लहर फीकी पड़ गई है और राहुल गांधी देश की अगुआई करने के काबिल हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े संगठन भारतीय मजदूर संघ और स्वदेशी जागरण मंच को अहसास हो गया है कि अब चुप नहीं रहा जा सकता और वह ‘रामलीला’ मैदान में आपकी नीतियों पर हल्ला बोलने की तैयारी कर चुका है। तो क्या आपके चाणक्य का तिलिस्म चकनाचूर हो गया है? गुजरात में मोदी और शाह की बदली भाषा बता रही है कि अपने ही गढ़ में आपको है डर…। मोदी-शाह की जोड़ी के टूटते तिलिस्म पर बेबाक बोल।

साम-दाम-दंड-भेद…। जिस गुजरात में 22 साल से आपका तिलिस्म चल रहा, वहां आपको ये चारों हथियार क्यों इस्तेमाल करने पड़ गए?
पहले तो आपने गुजरात मॉडल से समानता की बात की थी कि पूरे भारत को गुजरात बना देंगे। लेकिन आज आप गुजरात में ही गुजरात की बात नहीं करना चाहते। गुजरात से शुरू हुए विकास को गुजरात में ही बौराने का खिताब क्यों मिल गया? दुनिया की बड़ी शक्ति माने जाने वाले चीन के राष्ट्रीय जब भारत आए थे, दिल्ली के बरक्स अमदाबाद खड़ा कर दिया गया था। साबरमती के तट वाले शहर में शानदार नक्काशी वाले झूले पर विकास की पींगे भरते और शाकाहारी गुजराती खाना खाते जिन पिंग के जरिए गुजरात के मॉडल को खींचा जा रहा था। आपके हर विदेशी दौरे में गुजरात ही गुजरात था। गुजरात का ऐसा तिलिस्म रचा गया था कि सब उसके आगे चकाचौंध थे।

दाम तो खैर कर्नाटक से लेकर आपके गृह-प्रदेश तक दिखा, इसी दाम देने की खातिर हिमाचल के साथ गुजरात में चुनावों की तारीखों का एलान नहीं किया गया और अपने गृह-प्रदेश में तोहफों की झड़ी लगा दी। एक महीने में माननीय प्रधानमंत्री का बार-बार अपने गृह प्रदेश जाना और छोटी-बड़ी परियोजनाओं का शिलान्यास करना। इसके पहले आपने बिहार में ‘खोटे डीएनए’ से मुक्ति दिलाने के लिए दाम देने की पेशकश की थी। पूछा था बिहार से कि कितना चाहिए…इसके पहले आपने कश्मीर को भी दाम दिया था। आपके तिलिस्म और दाम के आगे ‘खोटे डीएनए’ ने समर्पण कर आपसे हाथ मिलाया। ‘जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं’ कहने वाले लोहिया के शिष्य ने कहा कि अब तो प्रधानमंत्री पद का इंतजार ही नहीं करना। और, कोई करे भी न क्योंकि सुशासन बाबू का मानना है कि 2019 में मोदी को कोई हरा नहीं सकता।

लेकिन साम और दाम के बाद भी शाह और साहेब की चमत्कारी दीवार की र्इंटें हिल रही थीं। कहीं कुछ गड़बड़ था। तो अब दंड को आजमाने का समय आया जो पहले भी आपकी रणनीति का हिस्सा रहा है। धमकी भी दे दी कि विकास विरोधी लोगों को केंद्र से एक पैसा नहीं मिलेगा। यानी हमारे बिना गुजरात का विकास कोई कर ही नहीं सकता है। यह धमकी गुजरात से दी गई थी। केंद्र का पैसा किसका है जनाब? दो लोगों के नियंत्रणवाली भाजपा का? और विकास की परिभाषा क्या होगी? जो आप बताएं वही विकास। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह जब केरल पहुंचे तो विकास की परिभाषा बदल चुकी थी। वैश्विक सूचकांकों में भारत की लाज बचाने वाले केरल को उत्तर प्रदेश से सीख लेने की सलाह दी जा रही थी। दक्षिण भारत की एक फिल्म को भी दंडित करवा दिया क्योंकि उसके एक संवाद में आपके विकास पर सवाल उठा दिया गया था। जो कोई आपके विरोधियों से मिला दूसरे दिन उसके घर आयकर या अन्य किसी केंद्रीय एजंसी के छापे पड़ गए।

राज्यसभा चुनाव के समय गुजरात से कांग्रेसी विधायक कर्नाटक लाए गए तो उस जगह पर छापा पड़ गया जहां कांग्रेसी विधायक रखे गए थे। अशोक गहलोत गुजरात के एक होटल में हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवाणी से मुलाकात भर क्या कर लेते हैं, उस होटल में भी जांच शुरू हो जाती है। आइबी, से लेकर सीबीआइ और आयकर विभाग जैसी एजंसियां एक खास दिशा में ही दंडित करने के लिए कदम उठाती हैं। आपकी ‘महारानी’ राजस्थान में लोकतंत्र को दंडित करने के लिए काला कानून लाना ही चाहती हैं, फिलहाल अपनों के ही विरोध के कारण ठंडे बस्ते में डालने पर मजबूर हुई हैं। लेकिन अब आपको महसूस हो रहा है कि गुजरात में यह दंड भी काम नहीं कर रहा। आप दोनों की रैली में खाली कुर्सियां और राहुल गांधी के भाषण में तालियां। 2014 में जिसका आपने ‘शहजादा’ कहकर सबसे ज्यादा मजाक उड़ाया था, जिससे आपने भारत को मुक्त करने की बात कही थी आज वह आपकी जमीन पर आपके बेटे का नाम लिए बिना कहते हैं कि ‘शाह-जादे’ पर बात नहीं करनी अदालत ने मना किया है।

और अंतिम बात भेद की। यह भेद तो दिल्ली और बिहार गंवाने के समय से हम देख रहे हैं। जब आपको पता था कि सामान्य लोकतांत्रिक तरीके से बिहार आपके हाथ नहीं आ रहा है तो आपके शाह कह जाते हैं कि अगर बिहार में भाजपा नहीं जीती तो पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे। उत्तर प्रदेश के पहले चरण में मनवांछित नतीजे न मिलते देख श्मशान और कब्रिस्तान का भेद ले आते हैं। दादरी में गोमांस रखने के आरोप में अखलाक मारा जाता है तो गोवा विधानसभा में कभी आपके ‘रक्षा मंत्री’ रहे मुख्यमंत्री कहते हैं कि गोवा में गोमांस की कमी नहीं होने दी जाएगी और मेघालय में भी आपको गोमांस से कोई परहेज नहीं है। लेकिन यह भेद आपको उस गुजरात में करना पड़ रहा है जिसे शाह का जादू कहा जाता है जो खास उनके साहेब के लिए रचा गया था।

हमने पिछली बार भी 21वीं सदी को प्लास्टिक के युग की संज्ञा दी थी। और, प्लास्टिक के इस लचीले समय में हम बहुत जल्दी किसी को भी दूसरा गांधी और चाणक्य की संज्ञा दे बैठते हैं। आम चुनावों और विधानसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश जीतने के बाद अमित शाह को आधुनिक समय के चाणक्य का भी खिताब मिल गया। लेकिन दूसरे गांधी की तरह यह चाणक्य भी प्लास्टिक के निकले। आपके ही राज्य में पाटीदार नेता दस लाख की गड्डी दिखाते हुए कहते हैं कि भाजपा वोट खरीदने वाली पार्टी है। उसके पहले गुजरात में ही राज्यसभा चुनावों में चाणक्य को चकनाचूर होते देख चुके हैं।
मोदी और शाह की जोड़ी ने शब्दों की व्याख्या की जो नर्सरीनुमा शब्दावली रची थी उसे भी उनके ही गुजरात में वह झपट लेता है जिसे आप नर्सरी का बच्चा करार देने में जुटे थे। राहुल गांधी आपकी ही तर्ज पर आपके गुजरात में जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बोलते हैं और जनता तालियां बजाती है। और राहुल के भाषण खत्म होने के पहले ही आपके मंत्री रविशंकर प्रसाद जिस तरह हल्ला बोलते हैं कि राहुल के भाषण की पटकथा कोई और लिखता है उससे तो यही लगता है कि आपके गढ़ में राहुल गांधी आपको डरा गए।

गुजरात में शाह, साहेब और 2014 वाले ‘शहजादा’ तीनों की भाषा क्यों बदली हुई है। नोटबंदी से लेकर लक्षित सैन्य हमले और किसी भी परियोजना के उद्घाटन को प्रधानमंत्री को ही समर्पित किया जा रहा था। निगम से लेकर राज्यों तक की जीत नरेंद्र मोदी की जीत थी। मोदी नाम केवलम् वाले गुजरात में वे बोलते हैं कि जीएसटी मेरे अकेले का किया नहीं है। जिस जीएसटी को ऐतिहासिक बनाने के लिए आधी रात को संसद सत्र में घंटा बजाया गया उसी ‘एक देश, एक कर’ ने कारोबारियों का बाजा बजा दिया। आज भी यह आपका ही गुजरात था। लेकिन अब चाणक्य का तिलिस्म खत्म होता दिख रहा है। इसलिए अपने घर में घुसने से पहले आपको उस जीएसटी में रियायतों का एलान करना पड़ा जिसे आपने सबसे बड़ा कर सुधार करार दिया था। जहां 22 साल से आपका राज है वहां विकास कार्य रुके रहने के लिए आप कांग्रेस को कोस रहे हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री देश का प्रधानमंत्री बनने के लिए जिस भाषा में चुनाव लड़ रहे थे आज वहां अपना मुख्यमंत्री बनवाने के लिए भी वे उस भाषा का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। हम अच्छी तरह जानते हैं कि आप नहीं चाहते थे कि गुजरात के विकास मॉडल में गोरखपुर वाले योगी के प्रचार का तड़का लगाना पड़े। और आपके शाह आपकी यह इच्छा पूरी भी करना चाहते थे। लेकिन गुजरात से ही संघ की जमीनी रिपोर्ट यह अहसास करवा चुकी है कि शाह का तिलिस्म टूट चुका है और यह चुनाव ‘खुल जा सिमसिम’ जितना आसान नहीं रह गया है। आज गुजरात में ही मोदी के सामने योगी का आख्यान भी रच ही दिया गया।

गुजरात से शुरू हुई शाह की बात गुजरात में ही मात खा रही है। आप यहां विकास का ‘वि’ भी नहीं बोल पा रहे हैं। नोटबंदी के फायदों को तो आप दिल्ली दरबार में ही छोड़ कर गए थे और जीएसटी के लिए सभी पार्टियों को जिम्मेदार मान रहे हैं। लक्षित सैन्य हमला और सरहद यहां किसी काम का नहीं। और अब टिकट खिड़की पर ‘बाहुबली’ नहीं ‘मर्सल’ है। ‘मेरा वचन ही मेरा शासन है’ का संवाद पुराना पड़ चुका है। अब तो सिनेमा में सिंगापुर और भारत के जीएसटी की तुलना हो रही है। दक्षिण के सिनेमा में गोरखपुर के अस्पताल के चर्चे हैं, जहां आॅक्सीजन के बिना बच्चे मर गए। अमित शाह इस बार गुजरात पार कर भी लें, लेकिन तिलिस्म एक बार टूटता है तो वापस नहीं लौटता है। और तिलिस्म की नियति ही होती है टूटना। वह 22 साल चल सकता है लेकिन एक बार टूटने पर दुबारा सम्मोहित नहीं कर सकता है। आप चुनाव जीत भी सकते हैं और बंगाल में वाम मोर्चे की तरह अपना किला गंवा भी सकते हैं। लेकिन हांफते शाह और साहेब का तिलिस्म टूट चुका है यह बताने के लिए ऐन चुनावी तारीखों के एलान से पहले हुए किसी चुनावी सर्वेक्षण की जरूरत नहीं है। छड़ी दिखाते ही टोपी से खरगोश नहीं निकल रहा इसलिए जादूगर के मंच का पर्दा गिर रहा है। अब जादू नहीं मंच के पीछे का साम, दाम, दंड, भेद है।

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