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राजनीतिः भीड़ प्रबंधन का तकाजा

बिहार सरकार का सरकारी पतंगोत्सव आयोजन हादसे में तब्दील हो गया। इसमें सीधे तौर पर आपदा कुप्रबंधन की नाकामी सामने आ रही है।

बिहार में आपदा कुप्रबंधन के चलते गंगा नदी में नौका के डूबने से कई लोगों की जलसमाधि बन गई। यह सब भीड़ प्रबंधन की नाकामी के चलते हुआ। (Express File Photo)

सभी को पता होता है कि धार्मिक स्थलों पर भारी भीड़ होगी। तो भीड़ प्रबंधन पर पहले ही विचार कर उचित रणनीति बना लेनी चाहिए। पर ऐसा नहीं किया जाता। सब भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। हादसों के बाद कुछ समय के लिए सर्तकता दिखती है, फिर जल्दी ही सब कुछ भुला दिया जाता है। भविष्य में ऐसे हादसे न हों, इसके लिए ठोस नीति बनाने की दरकार है। 

बिहार सरकार का सरकारी पतंगोत्सव आयोजन हादसे में तब्दील हो गया। इसमें सीधे तौर पर आपदा कुप्रबंधन की नाकामी सामने आ रही है। बिहार में आपदा कुप्रबंधन के चलते गंगा नदी में नौका के डूबने से कई लोगों की जलसमाधि बन गई। यह सब भीड़ प्रबंधन की नाकामी के चलते हुआ। पहला हादसा पटना में हुआ, वहीं कुछ घंटों के बाद दूसरा हादसा बंगाल के चौबीस परगना में हुआ जिसमें कई लोग भगदड़ में कुचल कर मर गए। फौरी तौर पर हमारी सरकारें आपदा प्रबंधन व भीड़ प्रबंधन को कितना भी दुरुस्त करने के दावे करती रहें, लेकिन ये अंतत: खोखले साबित होते हैं। इनकी तैयारियां सिर्फ कागजों में सरकर को दिखाने भर के लिए होती हैं।

उत्सव स्थलों पर हादसे होने का सिलसिला लगातार जारी है। पटना के एनआईटी घाट के पास चौदह जनवरी को लोगों से भरी एक नाव गंगा नदी में डूब गई। इसमें तकरीबन दो दर्जन से ज्यादा लोग डूबने से मारे गए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अब तक गंगा नदी से पच्चीस शव निकाले गए हैं। कई लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। हादसा तब हुआ जब मकर संक्रांति के मौके पर गंगा-पार पतंगबाजी हो रही थी। उसे देखने के लिए उत्सव में सैकड़ों लोगों ने भाग लिया था, जिस कारण वहां भारी भीड़ एकत्र हो गई। उत्सव स्थल तक पहुंचने का मुख्य साधन नौका थी। प्रशासन की ओर से किसी भी तरह की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। यहां तक कि वहां पुलिस की भी तैनाती नहीं की गई थी। नौका का संचालन भी कुछ निजी लोग कर रहे थे। सभी नावें जर्जर हालात में थीं। बावजूद इसके नाव वाले क्षमता से ज्यादा लोगों को बैठा रहे थे। उन्हें रोकने वाला प्रशासनिक अमला नहीं था।

भीड़ को नियंत्रित करने के लिए उपयुक्त व्यवस्था न होने की वजह से पूर्व में हुई इस तरह की घटनाओं की एक बार फिर पुनरावृत्ति हो गई। सभी हादसों की तरह इस बार भी मुआवजा देकर मामले को शांत कराया जा रहा है। खानापूर्ति हो रही है। सवाल उठता है कि क्या यह सब भविष्य में हादसों को रोक सकेगा? शायद नहीं। हादसों को रोकने की कोई कारगर नीति क्यों नहीं अपनाई जाती? पटना हादसे को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि नाव-हादसे में जो भी दोषी होंगे, सरकार उन्हें नहीं बख्शेगी। इस बाबत उन्होंने उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक भी की है। करीब दो-तीन घंटे तक चली बैठक में मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से पूछा कि प्रकाश पर्व और कालचक्र पूजा के सफल आयोजन के बाद मकर संक्रांति पर इस आयोजन में आखिर चूक कहां रह गई? इस पर किसी अधिकारी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सभी शांत बैठे थे। दरअसल, उनकी चुप्पी उनकी नाकामी बयां कर रही थी।

धार्मिक स्थलों को लेकर हमेशा एक सवाल उठता है कि किसी भी उत्सव पर एकत्र होने वाली भीड़ को हमारा प्रशासन क्यों संभाल नहीं पाता है। भीड़ प्रबंधन में हमेशा विफलता सामने आती है। रविवार को पश्चिम बंगाल के चौबीस परगना रोड के गंगासागर में भगदड़ मचने से करीब नौ तीर्थयात्रियों की मौत हो गई, जबकि तमाम लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। वहां भी प्रशासन की नााकामी सामने आई है। हादसा गंगासागर के कचुबेड़िया लॉन्च घाट पर हुआ। पांच नंबर जेटी पर शाम के करीब साढेÞ चार बजे लॉन्च का इंतजार कर रही भीड़ के सामने जैसे ही एक स्टीमर पहुंचा, उसमें सवार होने की जल्दबाजी में वहां भगदड़ मच गई। धक्का-मुक्की में कुछ लोग गिर गए और उनके ऊपर से लोग भागने लगे। जबकि वहां कुछ पुलिसकर्मी भी खड़े थे, पर वे रोकने के बजाय तमाशबीन बने हुए थे। शायद उनको इस बात का इल्म नहीं रहा होगा कि यह स्थिति कुछ देर में हादसे में तब्दील हो जाएगी।

पटना के गंगातट पर आयोजित पतंग उड़ान कार्यक्रम के दौरान फैली अव्यवस्था में हुई मौतों व कई लोगों के घायल होने के लिए पूरी तरह प्रशासनिक व पुलिस व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। इसके लिए दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए। भीड़वाली जगहों पर इस तरह के मामले होते रहते हैं, फिर भी प्रशासनिक अमला कोई सबक क्यों नहीं लेता? हादसों में मरने वालों और घायलों को मुआवजा देकर मामले को ठंडा कर दिया जाता है। और जांच के नाम पर बस औपचारिकता पूरी की जाती है। बिहार में कुछ जगहों पर आज भी नौका द्वारा आवाजाही होती है। आवाजाही के लिए सुगमता की दरकार है। जब तक लोग आसानी से आ-जा नहीं सकेंगे, तब तक विकास के सारे दावे झूठे लगेंगे।

कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने भगदड़ से हुई घटनाओं को संज्ञान में लेकर भीड़ वाले मौकों पर हादसों को रोकने के लिए सभी राज्यों को दिशा-निर्देश जारी किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों से साफ कहा है कि उनको एक बात यह ठीक से समझ लेना चाहिए कि अगर किसी जगह बीस-पच्चीस हजार लोग जमा हों तो वहां भगदड़ या हादसे की आशंका लगातार बनी रहती है। वहां पहले से ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम कर लेना चाहिए। सवाल उठना लाजमी है कि सारे तथ्यों को जानने के बावजूद राज्य सरकारें भीड़ को नियंत्रित करने के इंतजाम में इतनी लापरवाही क्यों करती हैं? भारत के कई शहरों में विभिन्न अवसरों पर राजनीतिक दलों की सभाएं, रैलियां या फिर धार्मिक स्थलों पर आयोजनों में भगदड़ की घटनाएं होती रहती हैं। हर बार प्रशासनिक लापरवाही के नए-नए रूप सामने आते हैं।
पटना के गंगाघाट पर जहां हादसा हुआ है उस जगह शाम चार बजे के बाद नाव नहीं चलाने का आदेश है। इसके बावजूद नाव ले जाना जारी रहा है। सवाल उठता है कि नाव परिचालन चार बजे के बाद नहीं होगा, इसकी घोषणा हुई थी या नहीं, और अगर हुई तो किसके कहने पर। इसमें किस अफसर की भूमिका थी, उन्होंने उसका पालन किया या नहीं? घटना से पहले आयोजन को लेकर अधिकारियों व नाव मालिकों के बीच कोई तैयारी व साधवानी संबंधी बातचीत हुई थी या नहीं? ऐसे कई पहलू हैं जिनकी गहनता से जांच होनी चाहिए। नाव हादसे के लिए लालू यादव ने भी नीतीश सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। उनका कहना है कि इतने बड़े आयोजन के लिए संबंधित विभागों के अधिकारियों को समुचित व्यवस्था करनी चाहिए थी। पतंगोत्सव सरकार का आयोजन था तो इंतजाम भी उसी तरह का होना चाहिए था। उन्होंने दोषियों पर सख्त कार्रवाई करने की वकालत की है।

भगदड़ से दुर्घटनाओं के विभिन्न पहलुओं पर जब तक एहतियाती तैयारी व पर्याप्त सावधानी के कोण से विचार नहीं किया जाएगा, तब तक उन्हें पूरी तरह से रोका नहीं जा सकेगा। भारत में आबादी बढ़ने के साथ ही धार्मिक आडंबर व दिखावे का जोर भी बढ़ा है। धर्म के महिमामंडन में अक्सर उसकी मूल भावना को ही उपेक्षित कर दिया जाता है और धर्म के जरिए अन्य लाभ लेने की भावना बलवती दिखाई देती है। सरकार व प्रशासन सभी को पता होता है कि धार्मिक स्थलों पर भारी भीड़ होगी। तो भीड़ प्रबंधन पर पहले ही विचार कर उचित रणनीति बना लेनी चाहिए। पर ऐसा नहीं किया जाता। सब भगवान भरोसे छोड़ दिया जाता है। हादसों के बाद कुछ समय के लिए सर्तकता दिखती है, फिर जल्दी ही सब कुछ भुला दिया जाता है। भविष्य में ऐसे हादसे न हों, इसके लिए ठोस नीति बनाने की दरकार है। मुआवजा कोई समाधान नहीं है।

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