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राजनीतिः आसान नहीं शराबबंदी की राह

परिवार की आमदनी बढ़ने पर दूध की खपत बढ़ जाती थी, लेकिन आज आमदनी बढ़ने के साथ शराब की खपत बढ़ रही है। इसके लिए किसी एक कारण को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता। जैसा सामाजिक बदलाव आया है उसमें शराब को पहले जितना बुरा नहीं माना जाता। फिर, शराब की दुकानें सरकारों के लिए कमाऊ पूत बन चुकी हैं।

Author Published on: May 27, 2016 2:49 AM

विशाल मध्य वर्ग, बढ़ती आमदनी, युवाओं का अकेले रहना व उनमें खर्च करने की प्रवृत्ति, आधुनिक जीवन शैली, घटती सामाजिकता, बढ़ता शहरीकरण जैसे कारणों से भारत में मयखाना जाने वालों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। किसी जमाने में परिवार की आमदनी बढ़ने पर दूध की खपत बढ़ती थी, अब दूध की जगह शराब ने ले ली है। सबसे बड़ी चिंता की बात है कि देश का युवा तबका अब कम उम्र में ही मयखाने का दरवाजा तलाश रहा है। देश में बढ़ते सड़क हादसों की एक अहम वजह य भी है।

बिहार में पूर्ण शराबबंदी के बाद अब तमिलनाडु भी उसी राह पर चल पड़ा है। मुख्यमंत्री जयललिता ने दुबारा शपथ लेते ही चरणबद्ध तरीके से शराबबंदी लागू करने की घोषणा कर दी। इसके तहत पहले चरण में आठ सौ शराब की दुकानें बंद की जाएंगी। गौरतलब है कि बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान नीतीश कुमार ने अपने राज्य में चरणबद्ध तरीके से शराबबंदी लागू करने का वादा किया था। नीतीश कुमार को चुनाव में महिला मतदाताओं का भरपूर समर्थन मिलने के पीछे एक बड़ा कारण शराबबंदी का आश्वासन था। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने देसी शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया। इस प्रतिबंध को मिली व्यापक सकारात्मक प्रतिक्रिया से खुश होते हुए उन्होंने पांच दिन के भीतर ही सभी प्रकार की शराब की बिक्री व सेवन पर प्रतिबंध लगा दिया। इस प्रकार गुजरात, नगालैंड व मणिपुर के बाद पूर्ण शराबंदी लागू करने वाला बिहार चौथा राज्य बन गया है। अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शराबबंदी को बिहार से आगे ले जाना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने शराबबंदी के लिए अभियान छेड़ने की घोषणा की है और इसकी शुरुआत उन्होंने उत्तर प्रदेश से की है।

शराबबंदी को लेकर बिहार सरकार की हो रही तारीफ से प्रभावित होकर तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने चुनाव प्रचार के दौरान घोषणा की थी कि वे चुनाव जीतने पर चरणबद्ध तरीके से राज्य में शराबबंदी लागू करेंगी। अब वे अपने चुनावी घोषणापत्र को अमली जामा पहना रही हैं। इसका असर अन्य राज्यों पर पड़ना तय है। इसे देखते हुए कई लोग शराबमुक्त देश का ख्वाब देखने लगे हैं, लेकिन अतीत के अनुभवों को देखें तो शराबबंदी को लंबे समय तक जारी रखना चुनौतीपूर्ण कार्य है। कई व्यावहारिक कारण भी शराबबंदी की राह में अवरोध पैदा करते रहे हैं।

एक ओर देश में शराबबंदी की मांग बढ़ रही है तो दूसरी ओर शराब की खपत भी बढ़ रही है। आज भारत दुनिया के अग्रणी शराब निर्माता के रूप में अपनी जगह बना चुका है। हाल के वर्षों में अधिकांश शहरी इलाकों में बार व नाइट क्लब खुले हैं जहां शराब का खुलेआम सेवन किया जाता है। किसी जमाने में परिवार की आमदनी बढ़ने पर दूध की खपत बढ़ जाती थी लेकिन आज आमदनी के बढ़ने के साथ शराब की खपत बढ़ रही है। देखा जाए तो इसके लिए किसी एक कारण को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता। पिछली आधी सदी में अपने देश में आए सामाजिक बदलाव के कारण शराब के सेवन को पहले जितना बुरा नहीं माना जाता। फिर शराब की दुकानें राज्य सरकारों के लिए कमाऊ पूत बन चुकी हैं। शराब के ठेके हासिल करने के लिए नामी-गिरामी उद्योगपति कतार में खड़े रहते हैं। यह जानते हुए कि शराब का सेवन दिल, दिमाग, लीवर और किडनी की तमाम बीमारियों को न्योता देता है, लोग शराब के सेवन से संकोच नहीं कर रहे हैं। यही कारण है कि शराब की खपत दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रही है।

देश के किसी भी हाट-बाजार में चले जाइए, वहां बिजली-पानी के दर्शन भले न हों, शराब के ठेके जरूर मिल जाएंगे। पिछले साल प्रकाशित आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में पिछले बीस सालों में अल्कोहल की खपत में पचपन फीसद का इजाफा हुआ है। चालीस देशों की इस सूची में शराब की खपत के मामले में रूस और एस्टोनिया के बाद भारत तीसरे पायदान पर है। चिंता की बात यह है कि सबसे ज्यादा युवा मयखानों का रुख कर रहे हैं वहीं महिलाएं भी इस फेहरिस्त में अपनी जगह बनाती दिख रही हैं। आंकड़ों की बात करें तो पंद्रह साल से कम उम्र के लड़कों में कभी न पीने वालों का प्रतिशत चौवालीस से घट कर तीस और लड़कियों का प्रतिशत पचास से घट कर तीस रह गया है। टीवी चैनलों और अखबारों में शराब के लुभावने विज्ञापनों से आकर्षित होकर कम उम्र के किशोर भी शराब की बोतल को मुंह लगा रहे हैं।

उद्योग संगठन एसोचैम की रिपोर्ट के मुताबिक 2010 में देश में 670 करोड़ लीटर शराब की खपत हुई, जिसके इस साल अर्थात 2016 तक 1900 करोड़ लीटर तक पहुंच जाने का अनुमान है। रिपोर्ट में बताया गया है कि 2010 में बियर, वाइन और स्प्रिट का कुल कारोबार 50,700 करोड़ रुपए का रहा। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में शराब पीने की आदतों में अंतर पाया जाता है। इसलिए पूरे देश में शराब की औसत खपत का ठीक हिसाब निकालना कठिन है। केरल और पंजाब शराब के अग्रणी उपभोक्ता हैं जहां प्रति व्यक्ति सालाना खपत क्रमश: सोलह और चौदह लीटर है। शराब की खपत करने वाले अन्य अग्रणी राज्य हैं आंध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, राजस्थान और तमिलनाडु। दूसरी ओर कुछ इलाके ऐसे भी हैं जहां शराब की बहुत कम खपत होती है। शहरी भारत और गरीब वर्गों में कम उम्र में ही शराब के सेवन की प्रवृत्ति शुरू हो जाती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक शराब का बढ़ता सेवन समाज के हर तबके के लोगों को प्रभावित करता है। इतना ही नहीं, इससे उत्पादकता भी प्रभावित हो रही है। शराब पीकर आने वाले कर्मचारियों की वजह से भारत जैसे किसी भी विकासशील देश को सालाना उत्पादन में एक फीसद नुकसान होता है।

हालांकि भारत शराब के विरुद्ध आवाज उठाने वाला दुनिया का पहला देश है लेकिन आज तक वह एक कारगर शराब नीति नहीं बना सका है। 2007 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने शराब की बिक्री पर कठोर प्रतिबंध, फिल्मों में शराब के दृश्य दिखाने पर पाबंदी आदि का प्रस्ताव तैयार किया था लेकिन उसे अमली जामा नहीं पहनाया जा सका। अब स्वास्थ्य मंत्रालय ने शराब-विरोधी नीति बनाने का काम सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के जिम्मे छोड़ दिया है। जैसे-जैसे शराब की पाबंदी पर सरकार की उदासीनता बढ़ रही है वैसे-वैसे शराब की खपत बढ़ती जा रही है। अब तो शराब पीने की औसत आयु भी तेजी से घट रही है। 1990 में देश में शराब पीने की औसत उम्र अट्ठाईस साल थी, जिसके अब महज पंद्रह साल रह जाने का अनुमान है।

शराब की बढ़ती खपत का एक पहलू अवैध शराब या कच्ची शराब के बढ़ते कारोबार से भी जुड़ा है। देश के कई पहाड़ी और आदिवासी इलाकों में अनाज, फलों, जड़ी-बूटियों आदि से शराब तैयार करने की परंपरा रही है। यदि इन इलाकों को छोड़ दिया जाए तो आबकारी कानून के मुताबिक कच्ची शराब बनाने और बेचने पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद पूरे देश में जहरीली शराब का धंधा बदस्तूर जारी है तो इसकी जड़ में भ्रष्टाचार का बोलबाला ही है। शराब माफिया पुलिस व आबकारी विभाग से लेकर राजनीतिकों तक कोनजराना पहुंचाते रहते हैं। यही कारण है कि शराब का अवैध कारोबार बेरोकटोक चलता रहता है।

दरअसल, भारी करों के कारण अंग्रेजी शराब और ठेकों पर मिलने वाली देसी शराब जहां महंगी होती है वहीं कच्ची शराब सस्ती होने के साथ-साथ आसानी से मिल जाती है। इसीलिए गरीब व दिहाड़ी मजदूर अपने शारीरिक श्रम की थकान मिटाने के नाम पर आसपास में उपलब्ध सस्ती अवैध शराब का सेवन करने लगते हैं। फिर ज्यादा मुनाफा, कम पूंजी की जरूरत, कच्चे माल की आसान उपलब्धता, आबकारी व पुलिस विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार और इनमामलों की अदालतों में लंबी सुनवाई के कारण इस धंधे में जोखिम भी कम रहता है। आरोप है कि शराब माफिया राजनीतिक दलों को मोटा चंदा पहुंचाते हैं जिससे उन पर कार्रवाई करना उतना आसान नहीं रहता। सरकारों के लिए भी जहरीली शराब से हुई मौत महज आंकड़ा होती है इसीलिए वे हादसों से कोई सबक सीख कर उनकी पुनरावृत्ति रोकने के उपाय नहीं करते।

विशाल मध्य वर्ग, लोगों की बढ़ती आमदनी, आधुनिक जीवन शैली, तनाव, एकाकीपन, युवा आबादी के कामकाज के सिलसिले में घर से बाहर निकलने, घटती सामाजिकता और बढ़ता शहरीकरण शराब की खपत बढ़ाने में खाद-पानी का काम कर रहे हैं। राजस्व घटने के डर से राज्य सरकारें भी शराब की खपत को हतोत्साहित करने में रुचि नहीं दिखाती हैं। व्यापक जनांदोलन के बाद आंध्र प्रदेश, हरियाणा जैसे कई राज्यों ने शराबबंदी लागू की थी लेकिन राजस्व में कमी के बाद उन्होंने प्रतिबंध हटा लिया। 2006 में उच्चतम न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा था कि समय की मांग है कि केंद्र और राज्यों की सरकारें संविधान के सैंतालीसवें अनुच्छेद पर अमल करें जिसके अनुसार शराब की खपत को धीरे-धीरे घटाना सरकार का कर्तव्य है। लेकिन किसी भी सरकार ने शीर्ष अदालत के इस फैसले पर अभी तक ध्यान नहीं दिया है। इसी का नतीजा है कि आज भारत दुनिया का अग्रणी शराब निर्माता देश बन चुका है। इसे देखते हुए शराब-मुक्त भारत का ख्वाब हकीकत में बदल पाएगा इसमें संदेह है।

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