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बाबर की गलती पर जुम्मन का घर क्यों जले?

समाज में सामूहिकता पर जब स्वार्थपरक व्यक्तिवादिता हावी होने लगे, लोकतंत्र भीड़तंत्र में परिवर्तित होने लगे और व्यक्ति से अधिक उसकी जाति एवं धर्म अहम हो जाए तब प्रश्न उठता है कि क्या समय का पहिया उलटी दिशा में घूमने लगा है?

Author Published on: July 8, 2017 1:18 AM

समाज में सामूहिकता पर जब स्वार्थपरक व्यक्तिवादिता हावी होने लगे, लोकतंत्र भीड़तंत्र में परिवर्तित होने लगे और व्यक्ति से अधिक उसकी जाति एवं धर्म अहम हो जाए तब प्रश्न उठता है कि क्या समय का पहिया उलटी दिशा में घूमने लगा है? क्यों स्वयं को सभ्य कहने वाला समाज आज मध्ययुगीन बर्बरता को कहीं करीब लगने लगा है?
और, इन प्रश्नों के उत्तर भी हमारे-आपके परिवेश में दफन मिलते हैं। जिनपर जमी मिट्टी झाड़ने की जहमत आज कोई नहीं करना चाहता। हाल में भीड़ द्वारा की गई हत्याओं एवं अपराधों को कुछ लोग अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए नए निजाम के उदय से जोड़ते हैं।

वस्तुत: भीड़तंत्र की यह प्रवृत्ति आज की देन नहीं है। चाहे 80-90 के दशक में बंगाल में हुर्इं सैकड़ों हत्याएं हों या उत्तर-पूर्व एवं बिहार में पिछले दशकों में भीड़ द्वारा किए गए जघन्य अपराध, इस समस्या की जड़ समाज में गहरे पैठ बना चुकी है। इसका एक प्रमुख कारण कानून-प्रशासन की कमजोरी है। जो पुलिस की सक्षम कार्रवाई में असमर्थता, भ्रष्टाचार, समानांतर व्यवस्था की मौजूदगी या स्वयं पुलिस की मूक सहमति आदि से पैदा हो सकती है। लेकिन स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब कश्मीर में अयूब पंडित एवं उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में जिया उल हक जैसे पुलिस अफसरों को ही भीड़ ने मौत के घाट उतार दिया। ऐसी स्थिति न आने पाए इसलिए पहले से ही सख्त कदम उठाए जाने चाहिए।

भीड़ के इस पागलपन का कारण समाज से सामूहिकता जैसे मूल्यों का पतन भी है। जिसमें प्रमुख हाथ भूमंडलीकरण एवं आधुनिक आत्मकेंद्रित भौतिकतावादी जीवनशैली का है। इसके अलावा आज भारत का जननांकीय लाभांश रोजगार के अभाव में विनाशकारी सिद्ध हो रहा है। यह बेरोजगार युवाशक्ति ही है जो कभी गाय के नाम पर खून बहाती है तो कभी जाति एवं धर्म के नाम पर। इसलिए राष्टÑ के समक्ष सर्वोपरि लक्ष्य इस शक्ति का रचनात्मक उपयोग होना चाहिए।

अंत में भीड़ के इस उन्माद का सर्वप्रमुख कारण धर्म एवं जाति के नाम पर विभाजनकारी राजनीति भी है। जो लोगों को इंसान से हैवान में बदलने से भी गुरेज नहीं करती। इस संदर्भ में अदम गोंडवी की पंक्तिया प्रासंगिक हैं, ‘हिंदू या मुसलिम के अहसासात को मत छेड़िए/अपनी कुर्सी के लिए जज्बात को मत छेड़िए/ गर गलतियां बाबर की थी/जुम्मन का घर फिर क्यों जले/ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िए’।
-विकल्प सिंह, (इलाहाबाद विश्वविद्यालय)

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