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राजनीतिः कैसी शिक्षा कैसे शिक्षक

जनजातीय तथा अनौपचारिक शिक्षा के विशेषज्ञ आचार्य नवल किशोर अम्बष्ट ने मुझे दो विवरण भेजे हैं।

Author June 16, 2017 2:29 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

जगमोहन सिंह राजपूत

कैसी विडंबना है कि इस देश में केवल विद्यार्थी फेल होते हैं, व्यवस्था से कोई फेल नहीं होता, किसी का वेतन नहीं रुकता, पदोन्नति नहीं रुकती, सजा नहीं मिलती! स्कूलों में अध्यापक नियुक्त नहीं होते हैं, सुविधाएं नहीं होती हैं, पुस्तकें समय पर या तो छपती नहीं हैं या वितरित नहीं हो पाती हैं, फिर भी संबंधित अधिकारी साफ बच जाते हैं,
बच्चे फेल हो जाते हैं!

जनजातीय तथा अनौपचारिक शिक्षा के विशेषज्ञ आचार्य नवल किशोर अम्बष्ट ने मुझे दो विवरण भेजे हैं। पहला दक्षिण अफ्रीका के एक विश्वविद्यालय के प्राध्यापक द्वारा विभाग के प्रवेशद्वार पर लगाया गया एक पोस्टर, जिसका रूपांतर कुछ इस प्रकार है: किसी भी देश के विघटन के लिए परमाणु बम या दूरगामी प्रक्षेपास्त्रों की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए वहां की शिक्षा की गुणवत्ता को गिराना और परीक्षाओं में नकल का सार्वजनीकरण करना ही पर्याप्त है! शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त कर किसी भी राष्ट्र को समाप्त किया जा सकता है। दूसरा प्रकरण जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल से संबंधित है। जर्मनी में सबसे अधिक वेतन पाने वाला वर्ग अध्यापकों का है। वहां के जजों, वकीलों, इंजीनियरों तथा अन्य पेशेवरों ने अपना वेतन अध्यापकों के समकक्ष लाने के लिए जब चांसलर के समक्ष प्रतिवेदन प्रस्तुत किया तो उन्होंने उत्तर दिया: मैं आपकी तुलना उनसे कैसे कर सकती हूं जिन्होंने आपको पढ़ाया है?

यह जानकर मेरे सामने सारे देश में फैले हुए उन लाखों अध्यापकों की तस्वीर उभरती है जो थोड़े-से मानदेय पर भारत के भविष्य की पीढ़ियों के अस्थायी तौर पर निर्माता नियुक्त किए गए हैं। उनके सिर पर अनिश्चितता की तलवार सदा लटकी रहती है। उन्हीं के साथ के नियमित अध्यापक उन्हें बराबरी की निगाह से नहीं देखते हैं। यही दृष्टिकोण पालकों और यहां तक कि विद्यार्थियों का भी हो जाता है। मुझे बिहार के स्कूल बोर्ड के परीक्षा परिणामों की पहले दिन की खबर कि इस वर्ष पैंतीस प्रतिशत परीक्षार्थी ही सफल हो पाए हैं, आश्चर्य में डाल गई थी। मगर दूसरे दिन जब इस वर्ष का भी एक टॉपर घोटाला सामने आया तो मन में विषाद ही नहीं, नैराश्य भी भर गया। क्या शिक्षा में नैतिक स्थिति इस कदर नीचे जा चुकी है कि सुधार संभव ही नहीं है?

वर्ष 1999 में बिहार में एक ‘बिहार बीएड घोटाला’ उजागर हुआ था। अपेक्षा थी कि उसका दीर्घकालीन प्रभाव पड़ेगा, मगर लगता है कि उसे पूरी तरह भुला दिया गया है। वैशाली में चार मंजिलों तक चढ़ कर अपने साथियों को नकल में सहायता करते नवयुवकों के चित्र कौन भूल सकता है! वैसे ही उस ‘टॉपर’ बालिका के कहे शब्द मुझे आज भी मर्मस्पर्शी लगते हैं: ‘मैं तो केवल सेकंड डिवीजन में पास होना चाहती थी, चाचा ने टॉप करा दिया!’ ग्यारह वर्ष तक एक क्षेत्रीय संस्थान का प्राचार्य रह कर मैंने जो भी सीखा उसके आधार पर मैं उस बालिका को कतई दोषी नहीं मानता। मीडिया ने उसका नाम और चित्र प्रसारित कर उसके साथ घोर अन्याय किया, जिसकी ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। सरकार का प्रयास सही दिशा में था, पर अपूर्ण था, अत: अपेक्षित परिणाम नहीं आ सके। कोई भी शिक्षाविद सरकार को आगाह कर सकता था कि केवल नकल रोकने से सबकुछ सुधर नहीं जाएगा। ऐसी समझ की अनुपस्थिति का परिणाम सामने है- पैंसठ प्रतिशत विद्यार्थी अयोग्य ठहरा दिए गए हैं!

कैसी विडंबना है कि इस देश में केवल विद्यार्थी फेल होते हैं, व्यवस्था से कोई फेल नहीं होता, किसी का वेतन नहीं रुकता, पदोन्नति नहीं रुकती, सजा नहीं मिलती! यही नहीं, स्कूलों में अध्यापक नियुक्त नहीं होते हैं, सुविधाएं नहीं होती हैं, पुस्तकें समय पर या तो छपती नहीं हैं या वितरित नहीं हो पाती हैं, फिर भी संबंधित अधिकारी साफ बच जाते हैं, बच्चे फेल हो जाते हैं! यदि बिहार ने शैक्षिक नेतृत्व को आगे बढ़ने का मौका दिया होता, उनसे पूछा होता कि स्थिति में सुधार कैसे हो तो केवल नकल रोक कर लक्ष्य प्राप्त करने की संस्तुति कभी नहीं आती। नकल रोकना आवश्यक है, मगर केवल नकल रोक कर शैक्षिक सुधार करने या शिक्षा व्यवस्था में नैतिक आधार मजबूत करने में सफलता नहीं मिल सकती है।
पैंसठ प्रतिशत बच्चों को असफल घोषित कर व्यवस्था केवल शर्मसार हो सकती है। जनसामान्य इस प्रयास को उपलब्धि का तमगा तो नहीं दे सकेगा। युवाशक्ति का क्षरण रोकना भी राष्ट्र का उत्तरदायित्व है। बिहार में इस क्षरण का मुख्य कारण सरकारी स्कूलों का नियमित रूप से न चलना और वहां नियमित तथा प्रशिक्षित अध्यापकों का न होना- या उनका स्कूलों में न पहुंचना- ही है। यह अन्य राज्यों में भी खुलेआम देखा जा सकता है। देखते वे भी हैं जो इसमें सुधार करने के अधिकार रखते हैं, बार-बार उसके लिए वायदे करते हैं; मगर उन्हें याद नहीं रखते हैं।

ऐसा लगता है कि नकल और नकल माफिया को लेकर बिहार और उत्तर प्रदेश में एक अलिखित प्रतिस्पर्धा चल रही है कि कौन एक-दूसरे से अधिक प्रभावशाली है! परीक्षा में नकल रोकने का कार्य परंपरागत व्यवस्था में तो अध्यापकों की उपस्थिति की गरिमा के कारण ही होता रहा है। केवल पुलिस प्रबंधन के द्वारा उसे रोक जा सकता है मगर उसका प्रभाव अस्थायी ही होगा। बिहार में दो वर्ष से लगातार टापर-घोटाला सारे देश में चर्चित रहा मगर उत्तर प्रदेश में इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा! इस वर्ष फतेहपुर जिले से एक ही स्कूल से कई टॉपर सफल हो गए हैं। लोग विस्मय में हैं, चर्चा कर रहे हैं कि कैसे इस दिशा में किसी प्रकार की जांच को रोकने के प्रयास ‘गहन-गंभीर’ ढंग से हो रहे हैं जिनमें कहा जा रहा है कि जिले की बदनामी न हो अत: इसे यों ही दबा दिया जाए! जाहिर है, नकल माफिया की ताकत बिहार में ही नहीं, उत्तर प्रदेश में भी लगातार बढ़ी है। चूंकि इनके तार व्यवस्था के अंदर के लोगों से ही जुड़े होते हैं, अत: ये किसी भी प्रकार की सरकारी कार्रवाई से विचलित नहीं होते हैं। यह तथ्य स्वीकार करना ही होगा कि इनके सरपरस्त हर स्तर पर मौजूद हैं।

मई 2016 तक देश में अधिकृत शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों की संख्या 23219 थी। इनमें केवल 1,543 सरकारी थे और 21,676 निजी संथाओं द्वारा खोले गए हैं। स्पष्ट है कि सरकारों ने हाथ खींच लिए हैं। अधिकांश निजी संस्थान उत्साही ‘निवेशकों’ द्वारा ही खोले गए हैं जिनका मुख्य लक्ष्य केवल लाभांश प्राप्त करना होता है- भले ही सरकारी तथा नियामक संस्था के नियम कुछ भी निर्धारित करें! कई बार वस्तुस्थिति से आंख मूंदना कितना घातक हो सकता है इसका भी एक बहुत बड़ा उदाहरण है हमारी शिक्षा व्यवस्था। सरकारी नियमों और न्यायालयों के निर्णयों के अनुसार शैक्षिक संस्थान चला कर कोई लाभ नहीं कमाया जा सकता है, मगर जो हो रहा है उसकी जानकारी सरकारों या न्यायालयों को न हो ऐसा मानना तो सामान्य मानव-चेतना का उपहास करना ही होगा। यह वैश्वीकरण के अंतर्गत प्रस्फुटित नवबाजारवाद का वह आकर्षक स्वरूप है जिससे बच पाना लगभग असंभव है। ऐसे में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्रों को आधुनिक युग का उद्यमी और व्यापारी कैसे छोड़ सकता है? वह इन दोनों क्षेत्रों में पूरी ताकत के साथ उपस्थित हो गया है। सरकारें उसकी उपस्थिति से प्रसन्न हैं, स्वयं अपने संस्थानों को पीछे धकेल रही हैं- कारण सभी जानते हैं! हताशा लगातार बढ़ रही है। यह मेरे जैसों की समझ से परे है कि शिक्षा व्यवस्था का पुनर्निर्माण देश की पहली प्राथमिकता क्यों नहीं है? शिक्षकों को समुचित प्रशिक्षण और उपयुक्त कार्यकारी वातावरण की व्यवस्था की अनुपस्थिति में देश प्रगति और विकास की राह पर चलने के लिए नई पीढ़ी को समर्थ कैसे बना सकता है? समाधान एक ही है: अध्यापकों का मनोबल और आत्मविश्वास बढ़ा कर ही देश को पूरी तरह सक्षम, समर्थ और सक्रिय बनाया जा सकता है।

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