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राजनीतिः अवसाद की फैलती विशबेल

अवसाद नई महामारी की तरह फैल रहा है। नौकरी या प्रेम में असफलता जैसी चीजें पहले भी थीं, पर पहले युवा इतनी जल्दी जिंदगी से उकता नहीं जाते थे। ऐसा लग रहा है कि समाज में अब परस्पर वास्तविक संवाद के अवसर कम हो रहे हैं जिसमें लोग अपने मन की बातों को दूसरों से साझा करते थे और जिससे उनका तनाव कम होता था और उन्हें संबल मिलता था।

Author January 16, 2018 3:11 AM
(प्रतीकात्मक तस्वीर)

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2015 में एक रिपोर्ट जारी करके दुनिया को चेताया था कि डिप्रेशन यानी अवसाद दुनिया की सबसे बड़ी मानसिक बीमारी बनने जा रहा है। अकसर ऐसी स्वास्थ्य-रिपोर्टों और चेतावनियों पर हमारी नजर नहीं जाती, या वक्त के साथ हम उन्हें भूल जाते हैं, पर इनसे जुड़े हादसे साबित करते हैं कि इन चेतावनियों को याद रखना कितना जरूरी है। जैसे, दिल्ली के नजदीक हरियाणा के पलवल में छह लोगों की हत्या के आरोपी नरेश धनखड़ के वाकये ने हमारे समाज का ध्यान एक बार फिर उन मानसिक समस्याओं की तरफ खींचा है जिन्हें अव्वल तो कोई बीमारी नहीं माना जाता। अगर मान भी लिया जाए, तो उनके इलाज में वैसी गंभीरता नहीं दिखाई जाती जिससे कोई विकराल समस्या उठने की आशंकाओं को कम किया जा सके।

कानून की नजर से देखें तो अवसाद के भंवर में फंसा व्यक्ति तब तक कोई समस्या नहीं है जब तक कि वह समाज का कोई अहित या अपराध न कर रहा हो। हालांकि चिकित्सा और मनोविज्ञान की नजर से अवसाद एक बेहद गंभीर समस्या है, लेकिन कठिनाई यही है कि यह कैसे पता किया जाए कि किसी व्यक्ति के मन में क्या चल रहा है और कब वह शेष समाज के लिए कोई मुश्किल खड़ी करने वाला है। समाज के स्तर पर देखें तो बेरोजगारी जैसे कारण युवा पीढ़ी में बढ़ते अवसाद की एक वजह हैं। नौकरी में असंतुष्ट होना भी कई बार अवसाद और उससे जुड़ी घटनाओं का कारण बन जाता है। इधर जैसे-जैसे भूमंडलीकरण के दबावों में कंपनियों के लिए मुनाफा कमाना महत्त्वपूर्ण बन गया है, नौकरियों में लोगों पर काम का बोझ और अच्छे प्रदर्शन का दबाव भी बढ़ रहा है। परिवारों में कमाई को लेकर असंतुष्टि भी अवसाद पैदा करने की वजह बन जाती है।

वर्ष 2015 में तेलंगाना की एक घटना नौकरी में असंतोष से पैदा अवसाद का बड़ा उदाहरण बनी थी। वहां छब्बीस साल के एक सिख युवक बलविंदर ने तलवार से बाईस लोगों को घायल कर दिया था। उस पर काबू पाने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी, जिसमें वह मारा गया। पता चला कि तेलंगाना के करीमनगर कस्बे का निवासी बलविंदर पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। उसका वेतन डेढ़ लाख रुपए महीने था। पर इतना शानदार वेतन पाने के बावजूद वह इसलिए अवसादग्रस्त हो गया था कि सिविल सेवा परीक्षा में वह नाकाम हो गया था। उसका थोड़ा-बहुत इलाज भी चल रहा था, लेकिन आइएएस की असफलता ने उसके दिमाग पर इतना गहरा असर डाला कि वह काबू से बाहर हो गया। सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग की नौकरी में पड़ रहे दबाव से निजात पाने के लिए वह आइएएस में जाना चाहता था, लेकिन ऐसा हो न सका और वह अवसादग्रस्त हो गया। हालांकि नरेश धनखड़ के मामले में शुरुआती जांच-पड़ताल में नौकरी के बजाय पारिवारिक जीवन के तनाव को अवसाद की वजह माना जा रहा है।

भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए अवसाद एक बड़ी समस्या बन सकता है क्योंकि यहां बेरोजगारी की दर काफी अधिक है। बेरोजगारी की समस्या और नौकरी की अंदरूनी दिक्कतों के कारण जो समस्या पैदा हो रही है, उससे संबंधित एक आंकड़े का खुलासा कुछ वर्ष पूर्व तत्कालीन गृह राज्यमंत्री हरिभाई पारथीभाई चौधरी ने संसद में किया था। एक सवाल के लिखित जवाब में उन्होंने राज्यसभा को बताया कि वर्ष 2014 में रोजगार संबंधी समस्याओं के चलते रोजाना करीब तीन लोगों ने आत्महत्या की। हालांकि देश में कई अन्य कारणों से भी आत्महत्या करने वालों की तादाद बढ़ रही है। अवैध संबंधों के संदेह में या समाज में बदनामी के कारण और प्रेम प्रसंगों में मिली नाकामी की वजह से भी हर साल कई हजार युवा मौत को गले लगा रहे हैं। जैसे, वर्ष 2014 में 4,168 युवाओं ने प्रेम में असफल होने के बाद अपनी जान दे दी। पर रोजगाररत लोग भी आत्महत्या कर लें या अवसाद में दूसरों की जान लेने की हद तक चले जाएं, तो यह हमारे समाज के लिए चिंता की बात है।

नौकरियों में जिस तरह का दबाव और तनाव बढ़ा है उसमें लोगों का कोई अतिवादी कदम उठा लेना आश्चर्यजनक होने के बावजूद अस्वाभाविक नहीं लगता। इसी तनाव और काम के दबाव के कारण युवा या तो तेजी से नौकरियां बदलते हैं या उसकी कोशिश करते रहते हैं। इसमें जब वे सफल नहीं होते, तो आत्महत्या करने या मानसिक रोगी बनकर अवसाद झेलने जैसे विकल्प उनके पास बचते हैं। देश में आत्महत्या के जो आंकड़े खुद सरकारी एजेंसियां जारी करती हैं, वे इसलिए ज्यादा चौंकाते हैं कि अब महिलाओं के मुकाबले पुरुष ज्यादा बड़ी तादाद में खुदकुशी कर रहे हैं और इनमें भी बेरोजगारी झेल रहे युवाओं का प्रतिशत सबसे ज्यादा है। फिर, एक विडंबना यह भी है कि आत्महत्या का प्रतिशत पंजाब और हरियाणा जैसे अपेक्षया संपन्न राज्यों में देश के औसत से कहीं ज्यादा है। ऐसा संभवत: इसलिए है कि इन राज्यों में लोगों को अपना जीवन-स्तर बेहतर करने के लिए ज्यादा आर्थिक दबाव झेलने पड़ रहे हैं।

देश में जो आर्थिक नीतियां पिछले तीन दशक से चल रही हैं उनसे युवाओं के रोजगार संबंधी लक्ष्य पूरे नहीं हो रहे हैं। यों कुछ युवाओं को अच्छा वेतन मिल रहा है, पर इसके बदले में उन्हें जानलेवा तनाव और बेतहाशा काम के दबाव से गुजरना पड़ रहा है। समाजशास्त्री मानते हैं कि युवाओं की हताशा का एक कारण यह भी है कि वे अपनी महत्त्वाकांक्षाओं और कठोर यथार्थ में सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे हैं। आधुनिक जीवनशैली और नई संस्कृति की चमक-दमक उन्हें लुभाती है लेकिन उसके लिए संसाधन जुटा पाने का मौका उन्हें हमारी व्यवस्था में सहज ढंग से नहीं मिल पाता है।

अवसाद देश में नई महामारी की तरह फैल रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर बीसवां व्यक्ति इसका शिकार है। साल 2015 में देश में अवसाद के 3.35 करोड़ नए मरीजों ने पर्चे कटवाए थे, जबकि 2016 में इस संख्या में 11 लाख यानी 14 फीसद नए मरीजों का इजाफा हुआ। ये आंकड़े बेंगलुरु के नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरॉसाइंसेज के सर्वे में भारत में अवसाद की स्थिति को लेकर जारी रिपोर्ट के हैं। अवसाद के मरीजों की संख्या इससे कहीं ज्यादा हो सकती है, क्योंकि इसमें वही लोग दर्ज हो पाए हैं जिनका मनोचिकित्सकों ने दवा का पर्चा काटा। वर्ष 2014 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने आत्महत्या के वैश्विक परिदृश्य पर जो रिपोर्ट प्रकाशित की थी उसका भी यही निष्कर्ष था कि इस समय दुनिया में सबसे ज्यादा आत्महत्याएं अवसाद के कारण हो रही हैं। इनमें 15 से 29 साल के किशोरों-युवाओं की आत्महत्या के आंकड़े सबसे ज्यादा हैं, जबकि यह उम्र रोजगार पाने और जीवन के नए आरंभ की होती है।

नौकरी या प्रेम में असफलता जैसी चीजें पहले भी थीं, पर पहले युवा इतनी जल्दी जिंदगी से उकता नहीं जाते थे। ऐसा लग रहा है कि समाज में अब परस्पर वास्तविक संवाद के अवसर कम हो रहे हैं जिसमें लोग अपने मन की बातों को दूसरों से साझा करते थे और जिससे उनका तनाव कम होता था और सामाजिक रूप से उन्हें संबल मिलता था। दोस्त, रिश्तेदार और सामाजिक संस्थाएं भी उनकी इसमें कोई मदद नहीं कर पा रही हैं। पारंपरिक रूप से परिवार को अहमियत देने वाले भारतीय समाज में अकेले पड़ते युवाओं का यह संकट असल में हमारी सामाजिक व्यवस्था के खोखलेपन को जाहिर कर रहा है।

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