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राजनीतिः राजनीति के हाशिये पर युवा

हमारे देश और प्रांतों में डिग्रियां बिक रही हैं, रोजगार नहीं। युवाओं पर नाज होने की घोषणाएं अकसर की जाती हैं, लेकिन मुख्यधारा की राजनीति में उनके लिए कोई जगह नहीं। दिखाने के लिए कुछ चेहरों को आगे कर दिया जाता है, लेकिन उसके पीछे वंशवाद का खेल छिपा लिया जाता है। इस रिवायत को बंद करना होगा।

Author November 29, 2017 3:34 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

महेश तिवारी

भारत युवाओं का विश्व में सबसे विशाल जनसंख्या वाला देश है। इसलिए भारत को अगर विकास की राह पर दूर तक ले जाना है तो हमें नौजवान आबादी को इसका इंजन बनाना होगा। देश की गाड़ी उसके हाथों में सौंपनी होगी। लेकिन वर्तमान में ऐसा होता कहीं से नजर नहीं आता। वह चाहे नीतियों और योजनाओं के निर्णय-स्थल यानी संसद की बात हो या फिर अन्य क्षेत्रों की, जरूरत के मुताबिक सही अनुपात में युवा वहां तक नहीं पहुंच पा रहे या फिर उसके लिए वह जगह खाली नहीं की जा रही। बेरोजगार युवाओं की फौज इधर-उधर भटक रही है। इन तमाम वजहों के साथ जीते युवाओं के विचारों में कुंठा और नकारात्मक भाव आना स्वाभाविक है।

समाज की बिगड़ती रूपरेखा में कहीं न कहीं जिम्मेदार यह प्रवृत्ति भी है, जिसका पता आंकड़ों में मिलता है। रोजगार न होने के संकट से जूझते देश की असली समस्या यह भी है कि केंद्र और राज्य सरकारों ने बहुत-से स्वीकृत पदों पर भी नियुक्ति अभी तक नहीं की है। एक आंकड़े के मुताबिक सरकारी नौकरियों में एक करोड़ से ज्यादा पद देश में खाली पड़े हैं। सवाल है कि जिन युवाओं का जिक्र हर क्षण किया जाता है, जिनके लिए चिंता जताई जाती है, उनके लिए रोजगार मुहैया क्यों नहीं करवाया जा रहा है? कुछ समय पहले राज्यसभा में सवाल उठा तो सरकार का जवाब था कि सरकारी नौकरियों के कुल 4, 20, 547 पद रिक्त पड़े हैं। समस्या की जड़ किसी एक स्तर पर नहीं है। समस्या बेहद जटिल रूप धारण करती जा रही है। जिस देश में युवा मतदाताओं की बड़ी तादाद होने की बात बार-बार कही जाती है, वहां युवाओं की तादाद संसद में उतनी ही सिमटी हुई है।

लेकिन इन सवालों का हल निकालने के बजाय आज के दौर में जाति और धर्म की राजनीति को देश में चुनाव जीतने का मंत्र मान लिया गया है। आज देश की बात हो या मध्यप्रदेश की, सबसे बड़ी समस्याओं में है शिक्षा का गिरता स्तर, बेरोजगारों की बढ़ती संख्या और सामाजिक असंतुलन की स्थिति। इन सबसे निजात पाने का कोई इलाज हमारे सियासतदानों के पास दिखता नहीं। मध्यप्रदेश में सबसे बड़ी तादाद आदिवासी समुदाय की है जो अपने जीवन जीने के अधिकार से भी वंचित दिखता है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक देश की वर्तमान संसद में वंशवादी सांसदों की संख्या में दो प्रतिशत और सरकार में ऐसे मंत्रियों की संख्या में बारह प्रतिशत की कमी आई है। पैट्रिक फ्रेंच ने 2012 में अपनी एक किताब में देश के बारे में लिखा था- ‘अगर वंशवाद की यही राजनीति चलती रही, तो भारत की दशा उन दिनों जैसी हो जाएगी, जब यहां राजा-महाराजाओं का शासन हुआ करता था।’ यों आंकड़े के लिहाज से इस गतिशील संसद में वंशवाद की राजनीति में कुछ फीसद का सुधार हुआ है। पिछली संसद में उनतीस फीसद लोग राजनीतिक घरानों से थे, वहीं इस बार यह आंकड़ा इक्कीस फीसद पर रुका है।

विडंबना यह है कि जिस देश की जनसंख्या में लगभग पैंसठ फीसद हिस्सेदारी युवाओं की हो, वहां वैसे सांसदों की संख्या अधिक है, जिनकी उम्र पचपन साल के ऊपर है। यह बेवजह नहीं है कि युवाओं के साथ इंसाफ किसी स्तर पर नहीं होता दिखता। हाल ही में मध्यप्रदेश में भाजपा ने उम्रदराज नेताओं के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं। इसे कैसे देखा जाए! क्या युवाओं में राजनीति की समझ नहीं? पंद्रहवीं लोकसभा में पचपन साल से अधिक उम्र के सांसदों की संख्या तैंतालीस प्रतिशत थी।

दरअसल, यह हमारी समांतर राजनीति ही है, जिसने आपातकाल के बाद से देश की राजनीति में न छात्र राजनीति को ठीक से उभरने दिया और न ही किसी नेता को, क्योंकि अपनी झोली भरने के बाद सत्ता के रण में अपने ‘उत्पाद-रूपी’ भाई-भतीजावाद को जिंदा रखना है। सोलहवीं लोकसभा में आए मात्र इकहत्तर सांसदों की उम्र चालीस साल से कम है। फिर युवाओं पर नाज करते हुए किस बात को आधार बनाया जाता है! आंकड़ों की दृष्टि से संसद में भले वंशवाद का पलड़ा पहले से कुछ हलका हुआ है, लेकिन क्या सचमुच राजनीति ने युवाओं को स्वीकार करना और अहमियत देना शुरू कर दिया है? उससे बड़ी विडंबना यह है कि राजनीति के चाणक्य देश की युवा शक्ति पर कितना भी इठला लें, लेकिन आज देश की लगभग पैंसठ फीसद वही युवा आबादी अपने राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक अधिकारों के लिए कहीं न कहीं भटक रही है।

ऐसे में सवाल यह है कि जब दुनिया भर के देशों का अध्ययन-अनुसरण करके संविधान निर्माण किया गया तो अब देश के युवाओं को राजनीतिक हक दिलवाने के मामले में हम विदेशों से क्यों नहीं कुछ सीख लेते हैं? क्या राजनीति में आज के दौर में भी युवा कहलाने की प्रवृत्ति पैंतालीस वर्ष पहुंचने तक चलती रहेगी? विश्व में राजनीतिक दलों की औसत आयु तैंतालीस वर्ष है। लेकिन हमारे देश का युवा सड़कों पर डिग्री लेकर घूमने को विवश है। देश में सन 2014 में सिर्फ बारह सांसद तीस वर्ष से कम उम्र के चुने जाते हैं। फिर युवाओं की मानसिकता और उनकी सामाजिक समस्याओं से संसद कैसे रूबरू हो सकती है?
देश में युवाओं के सामने लोभ परोस कर उन्हें गुमराह करने के मसाले लगभग हर राजनीतिक दल के चुनावी प्रचार में मिल जाएंगे। वे विद्यार्थी संगठन आदि के रूप में अपने बीच युवा सवालों के प्रति फिक्र का भ्रम बनाए रखते हैं। लेकिन उन संगठनों से कितने युवा संसद की चौखट तक पहुंच पाते हैं, इसका जवाब राजनीतिक दलों की नुमाइंदगी में देखा जा सकता है। फिर ऐसे संगठनों का क्या अर्थ है? यह स्थिति एक ऐसा मीठा जहर है, जिसे युवा खाकर भी पछताता है और नहीं खाने पर भी।

दक्षिण यूरोपीय देश सर्बिया पांच सौ युवाओं का एक राजनीतिक नेता कार्यक्रम चलाता है, जिसके तहत देश में लोकतंत्र के पुनरुद्धार के लिए युवा नेताओं की खोज की जाती है। ऐसी कोई पहल हमारे देश के भीतर क्यों नहीं होती? इक्वाडोर, अल साल्वाडोर, सेनेगल, युगांडा जैसे छोटे देशों में युवाओं को राजनीति में अवसर उपलब्ध कराने के लिए हर स्तर की विधायिका में उम्मीदवारी की न्यूतम उम्र घटा कर अठारह वर्ष निर्धारित की गई है। लेकिन हमारे देश में यह न्यूनतम सीमा पच्चीस साल है। बोस्निया जैसे देश में चुनाव में किसी दल को बहुमत न मिलने की दशा में चुनाव कानून की धारा 13.7 के तहत सबसे युवा उम्मीदवार को वह सीट मिल जाती है।

हमारे देश और प्रांतों में डिग्रियां बिक रही हैं, रोजगार नहीं। युवाओं पर नाज होने की घोषणाएं अकसर की जाती हैं, लेकिन मुख्यधारा की राजनीति में उनके लिए कोई जगह नहीं। दिखाने के लिए कुछ चेहरों को आगे कर दिया जाता है, लेकिन उसके पीछे वंशवाद का खेल छिपा लिया जाता है। अब इस रिवायत को बंद करना होगा। युवाओं की समस्या युवा नेता अच्छे से समझ सकते हैं। इसलिए युवाओं को राजनीति में मौका मिलना चाहिए। राजनीति ही नीति-निर्धारण का क्षेत्र है। इसलिए युवाओं की समस्याओं को राजनीति के एजेंडे पर लाना है तो राजनीति में उनकी भागीदारी बढ़ानी होगी। इससे बड़ा सवाल यह है कि जब छात्र राजनीति राजनीतिक दलों के लिए कोई बड़ा नेता उपलब्ध करवाने की प्रयोगशाला साबित नहीं हो पा रही है तो फिर छात्र संगठनों के चुनावों का क्या अर्थ रह जाता है। इस मसले पर राजनीतिक दलों को गंभीरता से सोचना होगा।

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