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राजनीतिः महिला सशक्तीकरण की बाधित राह

हमारा संविधान लैंगिक समानता की बात करता है। उसकी नजर में स्त्री-पुरुष सब समान हैं और जब दोनों समान हैं तो फिर एक स्वामी-मालिक-परमेश्वर; पति और एक गुलाम-अधीनस्थ स्त्री पत्नी कैसे हो सकती है? यह एक अंतर्विरोध ही तो है कि जहां एक तरफ हमारा संविधान महिला-पुरुष को समानता का हक देता है, वहीं धर्म पति को पत्नी का मालिक-स्वामी मान कर गैर-बराबरी स्थापित करता है।

Author April 5, 2018 2:48 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

ज्योति सिडाना

दहला देने वाली इन कुछ घटनाओं पर नजर डालें। चार मार्च, 2018 को बिहार के भोजपुर में दुकान पर सामान लेने गई चार साल की बच्ची के साथ एक युवक ने दुष्कर्म कर उसे मारने की धमकी दी। सात मार्च को कोलकाता में कूड़ा बीनने वाली महिला की तीन साल की बच्ची से दुष्कर्म किया। एक और घटना में सात और दस साल की दो बहनें ट्यूशन से लौट कर घर के बाहर खेलने रुक गर्इं और एक मोटर साइकिल पर एक युवक आया और उन दोनों के सामने अपनी पैंट खोल कर खड़ा हो गया और बच्चियों को डराने लगा। इन घटनाओं को देखें तो एक बार मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस तरह की घटनाओं के बाद भी महिला दिवस जैसे विशिष्ट दिन का क्या कोई मतलब रह जाता है? जिन बच्चियों के साथ इस तरह की घटनाएं होती हैं, वे किस तरह के समाज की छवि लेकर बड़ी होंगी, यह गहन चिंतन का विषय है। जब दुष्कर्म की ऐसी घटनाओं के बारे में पढ़ने या सुनने वालों के ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं तो सोचा जा सकता है कि उन बच्चियों पर क्या गुजरती होगी जिन्होंने अभी समाज का मतलब भी नहीं जाना। अभी तो वे अपने जीवन को भी नहीं जान पार्इं, जिनकी दुनिया अभी परिवार, खेलकूद, स्कूल, दोस्त-सहेली, त्योहार मनाना, खुश होना, नाराज होना भर ही है। ये घटनाएं तो मात्र संकेत भर हैं। न जाने ऐसी कितनी घटनाएं रोज मूर्त रूप लेती हैं।

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हम श्रेष्ठ और तीव्र गति से विकसित होती अर्थव्यवस्था के नाम पर आए दिन अपनी पीठ थपथपाते नजर आते हैं। यह कैसा विकास है जहां जानवर और मानव में कोई अंतर नहीं रह गया है। इन छोटी मासूम बच्चियों में भी उन्हें सिर्फ शरीर नजर आता है। क्या इनकी खुद की बहन-बेटियां इनके साथ सुरक्षित हैं? आखिर कहां और कैसे रुकेगी यह हैवानियत, क्योंकि कोई भी कानून इन्हें नहीं रोक पा रहा, बल्कि दिन-प्रतिदिन ये खबरें सुर्खियों में बनी रहती हैं। समाज से इन वहशी दरिंदों का सफाया कैसे किया जाए, यह सबके समक्ष एक गंभीर सवाल है? कुछ कहते हैं कि लड़कियों की पोशाक इन घटनाओं को आमंत्रण देती है। पर क्या इन मासूमों के लिए भी यही तर्क दिया जा सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि ऐसे लोग मानसिक रूप से विकृत होते हैं, इसलिए ऐसे अपराध करते हैं। अगर यही कारण है तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि इन्हें खुला क्यों छोड़ रखा है, ऐसे लोगों को तो मानसिक चिकित्सालयों में रख जाना चाहिए। पर क्या ऐसे लोगों की कोई पहचान हो सकती है? ऐसे अनेक सवाल हैं जो हम सबको कहीं न कहीं झकझोरते जरूर हैं।

इस तरह की घटनाओं से निपटने के लिए महिलाओं को आगे आना होगा। उन्हें अपने बेटों को लड़कियों की इज्जत करना सिखाना होगा। यह सिखाना होगा कि लड़कियों से कैसे बात करनी चाहिए, घर के बाहर कैसे व्यवहार करना है। भाई-बहन में समानता का गुण विकसित करना होगा और समान अधिकार देने होंगे। खानपान, पहनावे, शिक्षा, करियर, विवाह आदि की दृष्टि से भी समानता लानी होगी। और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह कि लड़कियों के प्रति बोली जाने वाली भाषा और शब्दावली में सुधार को प्रोत्साहित करना होगा। लैंगिक पूर्वाग्रहों को समाप्त करना होगा। इसलिए ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ या लड़कियों की शिक्षा को अनिवार्य कर देना इस समस्या का हल नहीं है, बल्कि लड़कियों के सम्मान के लिए खड़ा होना होगा, तब कहीं जाकर शायद महिला दिवस मनाने को सार्थक कर पाएंगे।

विशिष्ट दिवसों पर महिलाओं को रोडवेज बसों में मुफ्त यात्रा का अवसर देना, ब्यूटी पार्लर में सस्ते ब्यूटी पैकेजों की पेशकश, बाजार में विभिन्न उत्पादों पर सेल उपलब्ध कराना, विभिन्न सामाजिक मंचों पर महिलाओं, विशेष रूप से अभिजात्य वर्ग की महिलाओं को उनके योगदान के लिए सम्मानित करना और अखबारों-पत्रिकाओं में महिला केंद्रित लेखों को छापना, सोशल मीडिया पर महिलाओं का सम्मान करने वाले वीडियो शेयर करना- ही क्या महिला सशक्तीकरण के स्वप्न को यथार्थ में बदल सकता है? क्या वर्ष में एक दिन यह सब करने से वर्ष भर उनके साथ होने वाली हिंसा, शोषण, अनैतिकता, बलात्कार, छेड़छाड़, दहेज हत्या जैसी सामजिक बुराई को नजरदांज किया जा सकता है? जवाब होगा- कभी नहीं।
महिला कोई देवी या परंपरा नहीं है जिसके प्रति समाज एक दिन का आयोजन या समारोह आयोजित कर उसके प्रति आभार व्यक्त करने का दिखावा करे। महिला को आज भी मनुष्य समझे जाने का इंतजार है। इसलिए विश्व भर में महिलाओं के एकजुट होने की आवश्यकता है। लेकिन एक तरफ बाजार अर्थव्यवस्था और तीव्र होता उपभोक्तावाद और दूसरी तरफ विविध प्रकार के रोजगारों में महिलाओं की बढ़ती सहभागिता और सफलता पुरुष को आक्रामक बना रही है, क्योंकि इसने पुरुष सत्तात्मक प्रणाली में संभावित विघटन को उत्पन्न किया है। इसी संदर्भ में हम ‘ग्लास सीलिंग’ की अवधारणा को समझ सकते हैं। ग्लास सीलिंग का अर्थ यहां उन अदृश्य बाधाओं से है जिनके फलस्वरूप महिलाओं और अल्पसंख्यकों को अपने करियर में आगे बढ़ने के अवसरों से वंचित किया जाता है, ताकि वे उच्च शीर्षस्थ पदों पर न पहुंच पाएं। गैर बराबरी वाले इस समाज में पूर्व स्थापित विचार स्त्रियों, अल्पसंख्यकों और अन्य वंचित लोगों को आगे बढ़ने में अवरोध पैदा करते हैं। इन अदृश्य बाधाओं या अप्रत्यक्ष पक्षपात को ‘ग्लास सीलिंग’ कहते हैं।

हमारा संविधान लैंगिक समानता की बात करता है। उसकी नजर में स्त्री-पुरुष सब समान हैं और जब दोनों समान हैं तो फिर एक स्वामी-मालिक-परमेश्वर; पति और एक गुलाम-अधीनस्थ स्त्री पत्नी कैसे हो सकती है? यह एक अंतर्विरोध ही तो है कि जहां एक तरफ हमारा संविधान महिला-पुरुष को समानता का हक देता है, वहीं धर्म पति को पत्नी का मालिक-स्वामी मान कर गैर-बराबरी स्थापित करता है।
सेव द चिल्ड्रन संस्था के अनुसार भारत में होने वाली कुल महिला हिंसा के आठ प्रतिशत मामले राजस्थान में होते हैं, जबकि बालिकाओं के प्रति हिंसा इकतालीस प्रतिशत है। पिछले सालों की तुलना में बच्चों के प्रति हिंसा में बढ़ोतरी हुई है। पोक्सो एक्ट के तहत राजस्थान में 2016 में एक हजार चार सौ से ज्यादा मामले दर्ज किए गए, जो गंभीर चिंता का विषय है। महिला अपराधों पर 2016 में आई एक रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं के विरुद्ध सर्वाधिक उनचास हजार दो सौ बासठ अपराध उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए। इसके बाद पश्चिम बंगाल में बत्तीस हजार पांच सौ तेरह, महाराष्ट्र में इकतीस हजार तीन सौ अट्ठासी, राजस्थान में सत्ताईस हजार चार सौ बाईस और मध्यप्रदेश में छब्बीस हजार छह सौ चार मामले दर्ज किए। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह उजागर हुआ कि महिलाओं से जुड़े ज्यादातर अपराध पति और निकट संबंधियों द्वारा किए गए।

जैसा कि मार्क्स ने कहा था कि ‘दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ, तुम्हारे पास खोने को जंजीरों के अलावा कुछ भी नहीं है और पाने को सारा समाज है’, उसी तर्ज पर आज जरूरत है यह कहने की कि दुनिया की महिलाओ एक हो जाओ, तुम्हारे पास अपनी अधीनस्थता और शोषण को खोने के अलावा कुछ भी नहीं है और पाने को सारा जहां है। साथ ही पुरुष सत्ता के इस पूर्वाग्रह को समाप्त करना होगा कि महिला ही महिला की दुश्मन होती है। यह एक तथ्य भी है कि पहले खुद महिला को महिला का सम्मान करना होगा, उसकी स्वतंत्रता और निजता की रक्षा करनी होगी। उसकी सुरक्षा और प्रतिष्ठा के लिए परिवार और परिवार के बाहर ढाल बन कर खड़ा होना होगा, तब कहीं जाकर पुरुष समाज में स्थापित पूर्वाग्रहों को चुनौती मिल पाएगी। हम अब तक ऐसा नहीं कर पाए हैं, इसलिए संभवत: पुरुषसत्ता पूर्व स्थापित पूर्वाग्रहों के आधार पर महिलाओं को अपने अधीन बनाए रखने में सफल होती आई है।

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