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राजनीतिः कब थमेंगे सड़क हादसे

दुनिया की कुल सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में भारत का हिस्सा दस प्रतिशत है। 2015 में भारतीय सड़कों पर हुए हादसों में करीब डेढ़ लाख लोग मारे गए, जिनमें बारह हजार से ज्यादा बच्चे थे। यह चौंकाने वाला तथ्य है कि दुनिया भर में जितने लोग हर साल आतंकवादी वारदातों में मारे जाते हैं, उससे कई गुना अधिक मौतें भारत में सड़क हादसे में होती हैं।
हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में एक स्कूल बस के खाई में गिर जाने से चौबीस स्कूली बच्चों की दर्दनाक मौत इस कटु सत्य को रेखांकित करने के लिए काफी है कि सड़क सुरक्षा से जुड़े जागरूकता कार्यक्रमों के बावजूद सड़क हादसे थमने का नाम नहीं ले रहे हैं।

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में एक स्कूल बस के खाई में गिर जाने से चौबीस स्कूली बच्चों की दर्दनाक मौत इस कटु सत्य को रेखांकित करने के लिए काफी है कि सड़क सुरक्षा से जुड़े जागरूकता कार्यक्रमों के बावजूद सड़क हादसे थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। यह तो जांच के बाद ही साफ हो पाएगा कि यह दर्दनाक हादसा ड्राइवर की लापरवाही से हुआ या फिर अन्य किसी कारण से। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि स्कूल बसों को चलाने वाले यातायात सुरक्षा नियमों का तनिक भी पालन नहीं कर रहे हैं, जिससे नौनिहालों की जिंदगी मौत की भेंट चढ़ रही है। स्कूल बसों के दुर्घटनाग्रस्त होने और बच्चों के जान गंवाने की यह कोई पहली घटना नहीं है। पिछले साल ही उत्तर प्रदेश के एटा जिले में स्कूल बस और ट्रक की भीषण टक्कर में बारह से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई थी। इसी तरह इसी राज्य के भदोही जिले में भी एक स्कूल वैन रेलगाड़ी से टकरा गई थी, जिसमें आठ बच्चों ने दम तोड़ दिया था। दोनों घटनाओं की जांच में पाया गया कि हादसा ड्राइवर की लापरवाही से ही हुआ। हर हादसे के बाद यह तथ्य बार-बार सामने आता है कि स्कूल बसों के मालिक तय नियमों का पालन नहीं करते। देखा जाता है कि जब कोई भीषण हादसा होता है तब जिला प्रशासन की कुंभकर्णी नींद टूटती है और वह स्कूली वाहनों की फिटनेस जांचने का अभियान शुरू करता है। जबकि वह आए दिन देखता है कि स्कूली वाहन किस तरह सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाते हैं।

उच्चतम न्यायालय ने स्कूली वाहनों के लिए कुछ दिशा-निर्देश दे रखे हैं, जिनका पालन करना आवश्यक है। लेकिन यह सच्चाई है कि स्कूल प्रबंधन और स्कूल से जुड़े वाहनों के मालिक उन नियमों का अनुपालन नहीं करते हैं। उच्चतम न्यायालय के मुताबिक स्कूल वाहनों की सीटें आरामदायक और एक तरफ हत्था होना चाहिए। लेकिन हकीकत यह है कि ज्यादातर स्कूलों में कबाड़ा बसों को ही स्कूली वाहन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है और यही एक बड़ा कारण है कि उनके दुर्घटनाग्रस्त होने की आशंका बनी रहती है। उच्चतम न्यायालय का आदेश है कि बसों में क्षमता से ज्यादा बच्चे नहीं बैठाए जाएं। जबकि हकीकत यह है कि बसों में क्षमता से अधिक बच्चे भरना तो आम बात है। इसी तरह वाहन पर चढ़ने के लिए पायदान के अतिरिक्त साथ में परिचालक या सहायक होना चाहिए। जबकि इसका भी पालन नहीं होता है। उच्चतम न्यायालय के मुताबिक बस का दरवाजा खोलने पर सायरन बजना चाहिए और प्रत्येक स्कूली वाहन में आपातकालीन निकास होना चाहिए। ड्राइवर के पास लाइसेंस, फिटनेस, परमिट और अनुभव प्रमाण पत्र होना चाहिए। लेकिन गौर करें तो इनमें से शायद ही कोई शर्तें पूरी की जाती हों। आज पूरे देश में करीब पांच लाख बसों से तकरीबन करीब पौने तीन करोड़ बच्चे रोजाना स्कूल आते-जाते हैं। इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी स्कूल प्रबंधन से लेकर बस मालिक की होती है। लेकिन निरंतर हो रहे हादसों से साफ है कि दोनों में से कोई भी अपनी जिम्मेदारी को लेकर संवेदनशील नहीं हैं।

इसी लापरवाही का नतीजा है कि पिछले एक दशक में अनगिनत स्कूली वाहन दुर्घटनाग्रस्त हुए हैं और सैकड़ों बच्चों की जान गई है। एक अध्ययन के मुताबिक देश में यातायात नियमों का पालन न होने के कारण पिछले एक दशक में तेरह लाख से अधिक लोग सड़क हादसों में मारे गए हैं। इन हादसों में पचास लाख से ज्यादा लोग अपंगता के शिकार हुए हैं। दुनिया की कुल सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में भारत का हिस्सा दस प्रतिशत है। 2015 में भारतीय सड़कों पर हुए हादसों में करीब डेढ़ लाख लोग मारे गए, जिनमें बारह हजार से ज्यादा बच्चे थे। यह चौंकाने वाला तथ्य है कि दुनिया भर में जितने लोग हर साल आतंकवादी वारदातों में मारे जाते हैं, उससे कई गुना अधिक मौतें भारत में सड़क हादसे में होती हैं। 2016 में आतंकवादी हमलों में पच्चीस हजार लोग मारे गए थे, जबकि डेढ़ लाख लोगों की जान सड़क हादसों में गई। दुर्भाग्यपूर्ण तय यह भी है कि सड़क हादसे में जान गंवाने वाले लोगों में सर्वाधिक तादाद युवाओं की होती है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की मानें तो विश्व भर में किशोरवय के लड़के-लड़कियों की मौत का सबसे बड़ा कारण दुर्घटनाओं में उनका घायल होना है। डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के मुताबिक सड़क हादसे में हर साल करीब दस लाख किशोर मौत के मुंह में चले जाते हैं। वर्ष 2015 में इनमें से दो तिहाई मौतें अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के निचले और मध्यम आय वाले देशों में हुई हैं। पिछले चार दशकों में सड़क हादसों में पचास फीसद से ज्यादा का इजाफा हुआ है।
सड़क हादसों के लिए एक हद तक सड़कों के डिजाइन भी जिम्मेदार हैं। सड़क यातायात मंत्रालय के मुताबिक देश में ऐसी पांच सौ जगहें हैं जिन्हें ‘ब्लैक स्पॉट’ के रूप में चिह्नित किया गया है और जिनकी वजह से भयंकर हादसे होते हैं। ‘ग्लोबल स्टेट्स रिपोर्ट आॅन रोड सेफ्टी-2015’ के अनुसार सड़क हादसों में मारे जाने वालों की संख्या के आधार पर भारत दुनिया में शीर्ष पर है। यहां हर मिनट सड़क हादसे होते हैं और प्रत्येक चार मिनट में एक व्यक्ति की जान जाती है। वर्ष 2007 में सर्वाधिक सड़क हादसों वाले देश के रूप में भारत ने चीन को पीछे छोड़ दिया था। विधि आयोग की मानें तो सड़क हादसों में होने वाली कम से कम पचास प्रतिशत मौतें रोकी जा सकती है, बशर्ते पीड़ितों को हादसे से पहले एक घंटे के भीतर चिकित्सा सुविधा मिल जाए। वर्ष 2006 में इंडियन जर्नल आॅफ सर्जरी के एक शोध में बताया गया है कि देश में हादसे के अस्सी प्रतिशत पीड़ितों को घंटे के भीतर आपात चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती है। हर घटना पर सरकारी मदद पहुंचने की बात तो दूर, वहां मौजूद आम लोग भी पीड़ित को तत्काल अस्पताल पहुंचाने में हिचकिचाते हैं। लोग पुलिस और अदालत के समक्ष बार-बार पेश होने से बचने के लिए ऐसा करते हैं।

सड़क हादसों में सिर्फ मौत नहीं होती है, बल्कि बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान भी होता है। एक अनुमान के मुताबिक सड़क हादसों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को तकरीबन तीन फीसद सालाना चपत लगती है। संयुक्त राष्ट्र की मानें तो सड़क हादसों में हर वर्ष भारत को अट्ठावन अरब डॉलर यानी तकरीबन चार लाख करोड़ रुपए का नुकसान होता है। आर्थिक विशेषज्ञोें की मानें तो अगर देश की सड़कें सुरक्षित हो जाएं और एक भी दुर्घटना न हो तो भारत का जीडीपी दहाई के अंक को छू लेगा। हालांकि वैश्विक परिदृश्य पर नजर दौड़ाएं तो साल 2007 से दुनिया में सड़क हादसों से होने वाली मौतें एक तरह से स्थिर हैं, लेकिन भारत में इनमें तेजी से इजाफा हुआ है। दुनिया भर में सड़क हादसों में मारे जाने वाले कुल लोगों में सड़क पर चलने वाले पैदल यात्रियों, साइकिल सवारों, मोटरसाइकिल चालकों की आधी हिस्सेदारी होती है। भारत में सड़क पर होने वाली मौतों में सर्वाधिक जोखिम वाले इस वर्ग की हिस्सेदारी पैंतीस फीसद है। लेकिन इनकी सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है। जबकि वियतनाम जैसे विकासशील देश ने सड़क सुरक्षा को लेकर खास कदम उठाए हैं। नए कानून में पहले वहां केवल चालीस प्रतिशत मोटरसाइकिल सवार ही हेलमेट का इस्तेमाल करते थे, लेकिन 2007 में नया हेलमेट कानून लागू होने के बाद 2009 तक हेलमेट इस्तेमाल करने वालों की तादाद पिंच्यानवे प्रतिशत तक हो गई। भारत का मोटर वाहन कानून-1988 अब पुराना पड़ चुका है। यह आज की चुनौतियों से निपट पाने में पूर्णत: असमर्थ है। बेहतर होगा कि भारत सरकार सड़क यातायात नियमों के सख्ती से पालन के लिए कड़े कानून बनाए और राज्य सरकारें उसके अमल में सहयोग दें।

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