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राजनीतिः बेरोजगारी का विकट विस्तार

आमतौर पर पच्चीस से तीस वर्ष के बीच पंचानबे प्रतिशत नौजवान अपनी पढ़ाई पूरी कर लेते हैं और फिर रोजगार की तलाश शुरू कर देते हैं। भारत में हर साल तकरीबन सवा करोड़ शिक्षित युवा तैयार होते हैं। ये नौजवान रोजगार के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र, सभी जगह अपनी किस्मत आजमाते हैं। लेकिन उनमें से सिर्फ सैंतीस प्रतिशत कामयाब होते हैं।

Author January 27, 2018 4:52 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अभिजीत मोहन

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि एक ओर देश में बेरोजगारी विकराल रूप धारण किए है, वहीं अकेले केंद्र सरकार के ही विभिन्न विभागों में चार लाख से अधिक पद रिक्त पड़े हैं। वित्त मंत्रालय की एक रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि एक मार्च 2016 की स्थिति के अनुसार केंद्र सरकार में असैन्य कर्मचारियों के कुल 36.34 लाख पद स्वीकृत हैं जिनमें से 32.21 लाख पद ही भरे हुए हैं। इस तरह केंद्र सरकार में 11.36 प्रतिशत पद खाली हैं। सवाल लाजिमी है कि जब करोड़ों युवा बेरोजगार हैं, तो भर्तियां क्यों नहीं हो रही हैं? कर्मचारियों की समयबद्ध नियुक्ति सुनिश्चित करने के लिए सरकार भर्ती-नियमों में सुधार क्यों नहीं कर रही है?

आश्चर्य है कि एक ओर केंद्र सरकार रोजगार सृजन को अपनी प्राथमिकताओं में शुमार बताती है वहीं दूसरी ओर उसने रिक्त पड़े पदों पर चुप्पी साध रखी है। जबकि वह अच्छी तरह अवगत है कि आयकर, रेलवे, शिक्षा, पुलिस आदि विभागों में रिक्त पदों की वजह से कार्य बाधित हो रहा है और विभिन्न तरह की समस्याएं खड़ी हो रही हैं। मसलन, रेलवे में कर्मचारियों की कमी की वजह से आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं। इसी तरह, देश में पुलिसकर्मियों की भारी कमी की वजह से कानून-व्यवस्था की स्थिति नाजुक है। गृह मंत्रालय के ही आंकड़ों पर गौर करें तो तकरीबन सभी राज्यों में पुलिसकर्मियों के कुल स्वीकृत पदों की संख्या 22 लाख 63 हजार से कुछ अधिक है, जबकि इनमें से करीब पांच लाख पद रिक्त हैं।
समझा जा सकता है कि जब केंद्र सरकार रिक्त पदों को भरने को तैयार नहीं है तो फिर राज्य सरकारों से कैसे उम्मीद किया जाए कि वे इस दिशा में सकारात्मक पहल करेंगी। वे पहले से ही संसाधनों की कमी की आड़ में पदों को भरने से मुंह फेरे हुए हैं। अगर केंद्र व राज्य सरकारें सकारात्मक रुख अपनाएं तो दस लाख से अधिक नौजवानों को तत्काल रोजगार मिल सकता है।

सरकार रोजगार सृजन के लिए ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्किल इंडिया’ जैसे कई अभियान चला रही है। इसके अलावा बेरोजगारी से निपटने के लिए पहले से भी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम, समन्वित विकास कार्यक्रम, जवाहर रोजगार योजना, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना, संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा) जैसे कार्यक्रम चल रहे हैं। लेकिन जिस तेजी से देश में बेरोजगारी बढ़ रही है उससे साफ है कि इन कार्यक्रमों का असर न के बराबर है। या यों कह सकते हैं कि देश में बेरोजगारी से निपटने का अभी तक कोई ठोस रोडमैप नहीं बना है।

गौरतलब है कि भारत सरकार ने नौजवानों को रोजगार प्रदान करने के लिए स्किल इंडिया के जरिए सन 2022 तक चालीस करोड़ लोगों को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा है। लेकिन राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के सर्वेक्षण पर विश्वास करें तो इस लक्ष्य को हासिल करना मुश्किल है। रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर दस युवाओं में से महज एक युवा को ही किसी तरह का कारोबारी प्रशिक्षण हासिल है। यानी 15 से 59 वर्ष के आयुवर्ग के सिर्फ 2.2 प्रतिशत लोगों ने औपचारिक और 8.6 प्रतिशत लोगों ने अनौपचारिक रूप से कारोबारी प्रशिक्षण हासिल किया है। अगर दोनों को जोड़ दें तो यह आंकड़ा 10.8 प्रतिशत ठहरता है।

लेकिन जिस गति से देश में बेरोजगारी बढ़ रही है उस हिसाब से कारोबारी प्रशिक्षण की यह उपलब्धि ऊंट के मुंह में जीरा है। इस समय देश में नौजवानों का रुझान मेडिकल और इंजीनियरिंग क्षेत्रों को लेकर ज्यादा है। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इन क्षेत्रों में भी रोजगार में कमी आई है। शिक्षा की निम्न गुणवत्ता की वजह से 2014 से 2016 के बीच परिसर से ही भर्ती (कैंपस रिक्रूटमेंट) में भी पैंतालीस प्रतिशत की गिरावट आई है। दरअसल, इसके लिए इंजीनियरिंग-शिक्षा के पाठ्यक्रम का पुराना होना भी एक महत्त्वपूर्ण कारण है, जिसे ताजातरीन किया जाना जरूरी है।

आमतौर पर पच्चीस से तीस वर्ष के बीच 95 प्रतिशत नौजवान अपनी पढ़ाई पूरी कर लेते हैं और फिर रोजगार की तलाश शुरू कर देते हैं। सीआईआई की इंडिया स्किल रिपोर्ट-2015 बताती है कि भारत में हर साल तकरीबन सवा करोड़ शिक्षित युवा तैयार होते हैं। ये नौजवान रोजगार के लिए सरकारी और निजी क्षेत्र, सभी जगह अपनी किस्मत आजमाते हैं। लेकिन उनमें से सिर्फ सैंतीस प्रतिशत कामयाब होते हैं। इसके दो प्रमुख कारण हैं। पहला कारण यह है कि सरकारी क्षेत्र में नौकरियां सिकुड़ रही हैं। या यों कहें कि सरकार रिक्त पदों को भरने को तैयार ही नहीं है। दूसरा कारण यह है कि निजी क्षेत्र में उन्हीं लोगों को रोजगार मिल रहा है जिन्हें कारोबारी प्रशिक्षण हासिल है।

यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि देश में सालाना सिर्फ पैंतीस लाख लोगों के लिए कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था है जबकि दूसरी ओर सवा करोड़ शिक्षित बेरोजगार युवा रोजगार की कतार में खड़े होते हैं। पिछले वर्ष योजना आयोग ने एलान किया था कि शिक्षित बेरोजगार युवाओं को रोजगार देने के लिए पचास लाख कौशल प्रशिक्षण केंद्र खोले जाएंगे। लेकिन अभी तक इस लक्ष्य को साधा नहीं जा सका है। सवाल लाजिमी है कि जब कौशल प्रशिक्षण केंद्रों की संख्या में वृद्धि नहीं होगी तो फिर रोजगार कैसे मिलेगा? उचित होगा कि सरकार रिक्त पड़े पदों को भरने के अलावा कौशल प्रशिक्षण केंद्रों की संख्या बढ़ाए।

अगर छोटे कस्बों में नए विकास केंद्र खोले जाएंगे तो निस्संदेह इससे औद्योगिक ढांचे का विकेंद्रीकरण होगा और अर्थव्यवस्था अधिक आत्मनिर्भर बनेगी। यह किसी से छिपा नहीं है कि अभी तक अनुदान और प्रोत्साहन सिर्फ उत्पादन के आधार पर दिए जाते हैं। बेहतर होगा कि इस आधार को बदला जाए और इसे रोजगार के अवसर प्रदान करने के आधार पर दिया जाए। गौर करें तो आज ग्रामीण बेरोजगारी सबसे अधिक है। लेकिन कुछ उपायों के जरिए इसे अवसर में बदला जा सकता है। उदाहरण के लिए, अगर नौजवानों को खेती, बागवानी, पशुपालन, वृक्षारोपण, कृषि यंत्रों की मरम्मत आदि के संबंध में आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण प्रदान किया जाए तो ग्रामीण बेरोजगारी से निपटने में मदद मिलेगी।

बेहतर होगा कि केंद्र व राज्य सरकारें ग्रामीण क्षेत्रों में कौशल केंद्रों का विस्तार करें। इससे बुनाई, मैकेनिक, आपरेटरी और हस्तशिल्प को बढ़ावा मिलेगा और रोजगार के अवसर सृजित होंगे। युवाओं को प्रशिक्षण दिया जाए तो स्वास्थ्य संबंधी देखरेख, रीयल एस्टेट, शिक्षा एवं प्रशिक्षण, आईटी, मैन्युफैक्चरिंग, बैंकिंग तथा वित्तीय क्षेत्रों में भी उनकी किस्मत का रास्ता खुल सकता है। लेकिन यह तभी संभव होगा जब सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में निवेश बढ़ेगा।

अगर सिर्फ बैंकिंग समूह ग्रामीण क्षेत्रों में अपना विस्तार करे तो लाखों युवाओं को रोजगार मिल सकता है। इसी तरह स्वास्थ्य क्षेत्र में भी सरकार निवेश को बढ़ावा देकर रोजगार सृजित कर सकती है। आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य केंद्रों की भारी कमी है। अगर सरकार इनका विस्तार करे तो न सिर्फ रोजगार का सृजन होगा बल्कि सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को स्वास्थ्य-लाभ भी मिलेगा। इसी तरह अगर सरकार आधारभूत और उपभोक्ता वस्तु उद्योगों में निवेश बढ़ाए तो न सिर्फ शिक्षित नौजवानों को रोजगार मिलेगा बल्कि वस्तुओं की आपूर्ति में भी वृद्धि होगी। रोजगार बढ़ाने के लिए छोटे उद्योगों का विकास सबसे ज्यादा जरूरी है। इसलिए कि छोटे उपक्रम बड़े उपक्रमों से अधिक लोगों रोजगार देते हैं। अर्थशास्त्रियों का भी कहना है कि लघु उद्योगों में उतनी ही पूंजी लगाने से लघु उद्योग, बड़े उद्योग की तुलना में पांच गुना अधिक लोगों को रोजगार देते हंै।

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