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राजनीतिः नेट निरपेक्षता और साइबर अपराध

दुनिया में साइबर अपराध के मामले में अमेरिका और चीन के बाद भारत तीसरे नंबर पर है। आज भारत की एक बड़ी आबादी डिजिटल सेवाओं पर निर्भर है। बहुत सारे लोग बैंक खाते से लेकर निजी गोपनीय जानकारी तक कंप्यूटर और मोबाइल फोन में रखने लगे हैं। इंटरनेट पर जितनी तेजी से निर्भरता बढ़ी है उतनी ही तेजी से खतरे भी बढ़े हैं।

Author January 4, 2018 2:53 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अरविंद कुमार सिंह

हाल में भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राइ) द्वारा अपने अनुशंसा-पत्र में यह सुनिश्चित किया जाना कि इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (आइएसपी) को अपने मुनाफे के लिए अथवा किसी खास वेब ट्रैफिक को रोकने, धीमा करने या उसकी गुणवत्ता को प्रभावित करने का हक नहीं है, एक तरह से इंटरनेट सेवा प्रदाताओं की मनमानी पर अंकुश लगाने वाला कदम है। ट्राइ ने इंटरनेट सेवा प्रदाताओं की मनमानी व चालबाजी को छल मानते हुए हिदायत दी है कि उन्हें केवल चुनिंदा वेबसाइटों या एप्स के जरिए लोगों तक इंटरनेट की पहुंच को सीमित करने का अधिकार नहीं है। उल्लेखनीय है कि इंटरनेट सेवा प्रदाताओं द्वारा कुछ ऐसा ही भेदभाव किया जा रहा है जिससे नाराज होकर ट्राइ ने कड़े कदम उठाने का मन बनाया है।

गौरतलब है कि ट्राइ ने नेट की आजादी पर अपनी बहुप्रतीक्षित सिफारिशों में एप, वेबसाइट और सेवाओं को अवरुद्ध कर ट्रैफिक में बाधा पहुंचाने और कई नेट सुविधाओं के लिए अलग-अलग कीमत वसूलने की इंटरनेट सेवा प्रदाताओं की मनमर्जी को अनुचित ठहराया है। इन सिफारिशों के जरिए ट्राइ ने नेट निरपेक्षता के इस सिद्धांत को सुनिश्चित किया है कि इंटरनेट सभी के लिए खुला मंच है और इसके उपयोगकर्ताओं के बीच किसी भी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता। ट्राइ ने सभी इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को चेताते हुए कहा है कि उनकी नैतिक जिम्मेदारी है कि वे सभी प्रकार के डाटा को एक समान करें। नेट निरपेक्षता का अर्थ है कि नेटवर्क उस विषय के लिए निष्पक्ष रुख अख्तियार करे जिसे उसके जरिए अतिरिक्त शुल्क दिया जा रहा है। नेटवर्क की यह जिम्मेदारी है कि वह अन्य किसी विषय को अन्य के मुकाबले प्राथमिकता न दे। अगर वह ऐसा करता है तो इसका सीधा तात्पर्य यह हुआ कि वह भेदभाव कर रहा है। न्याय का सिद्धांत यह है कि अगर उपभोक्ता डेटा की धनराशि का भुगतान कर रहा है तो उसका अधिकार है कि वह अपने मुताबिक उसका इस्तेमाल करे।

इंटरनेट सेवा प्रदाता को यह अधिकार नहीं है कि वह उपभोक्ता को सलाह दे या उसकी पसंद में टांग अड़ाए। हां, यह सही है कि दूरसंचार कंपनियों को सेवा की गुणवत्ता बरकरार रखने के लिए या नेटवर्क की सुरक्षा के लिए कुछ टूल्स के इस्तेमाल का अधिकार होना चाहिए। यह उचित भी है कि दूरसंचार कंपनियों को लाइन जाम होने या किसी दुर्घटना या साइबर हमले की स्थिति में नेटवर्क को बचाने के लिए ट्रैफिक मैनेजमेंट प्रैक्टिसेज यानी टीएमपी का इस्तेमाल करने की छूट मिलनी चाहिए। लेकिन उचित होगा कि यह अस्थायी और पारदर्शी हो, न कि इसकी आड़ में लाभ उठाया जाए।

यहां ध्यान देना होगा कि कुछ दूरसंचार कंपनियों के कंटेट डिलीवरी नेटवर्क के साथ गठजोड़ हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वे फिर नेट निरपेक्षता के नियमों का उल्लंघन नहीं करेंगी? उचित होगा कि दूरसंचार कंपनियां इस तरह के गठजोड़ का खुलासा करें और सुनिश्चित करें कि वे नेट निरपेक्षता के नियमों का उल्लंघन नहीं करेंगी। उल्लेखनीय है कि ट्राइ की ये सिफारिशें अमेरिका में संचार सेवाओं को नियंत्रित करने वाली संस्था इंटरनेट फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन यानी एफसीसी द्वारा नेट निरपेक्षता को खत्म करने के फैसले के बाद आई हैं। जानना जरूरी है कि 2015 में अमेरिका में जब यह बहस छिड़ी थी तो तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा ने नेट निरपेक्षता के पक्ष में अपना मत रखते हुए नियम गढ़े थे। लेकिन बीते दिनों वहां की दूरसंचार नियामक संस्था एफसीसी ने इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों के हित में फैसला सुना दिया।

बहरहाल, भारत में अगर ट्राइ की सिफारिशें जमीनी आकार लेती हैं तो फिर इंटरनेट सेवा प्रदाताओं के लिए उपयोगकर्ताओं के बीच भेदभाव करना कठिन होगा और लोग अपनी मर्जी से जिस वेब सेवा, सामग्री या साइट का इस्तेमाल करना चाहेंगे, स्वतंत्रतापूर्वक कर सकेंगे। यह किसी से छिपा नहीं है कि भारत में ही इंटरनेट सेवा प्रदाता अपनी विशेष तकनीक के जरिए किसी वेबसाइट के खुलने की रफ्तार को प्रभावित करते हैं। यहां तक कि कई वीडियो साइट को भी बंद कर देते हैं। दरअसल, इस कारस्तानी के पीछे इंटरनेट सेवा प्रदाताओं की मुनाफाखोरी होती है। वे नहीं चाहते हैं कि उनके उपभोक्ताओं को कोई विशेष साइट आसानी से उपलब्ध हो। लेकिन विचार करें तो यह कुप्रवृत्ति नेट निरपेक्षता की भावना का अनादर और उपभोक्ताओं के साथ छल है। इसलिए कि कंपनियों को अलग-अलग वेबसाइट, प्लेटफार्म या संचार के माध्यम के आधार पर उपभोक्ताओं से अलग-अलग शुल्क लेने का अधिकार नहीं है। एक बार भुगतान किए जाने के बाद उपभोक्ताओं को यह अधिकार होता है कि वे जैसा चाहें उसका इस्तेमाल करें। लेकिन विडंबना है कि भारत में इंटरनेट सेवा प्रदाता कुछ कंपनियां नेट निरपेक्षता के पक्ष में नहीं हैं। उलटे वे इसे खत्म करने के पक्ष में हैं।

फिलहाल ट्राइ की नई सिफारिशें नेट निरपेक्षता पर भ्रम की सभी गुंजाइशों को खत्म कर करने वाली हैं। ये सिफारिशें इस अर्थ में ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं कि आज दुनिया के तमाम देश नेट निरपेक्षता बनाए रखने के पक्षधर हैं और अब भारत भी इस कतार में खड़ा हो गया है। अगर भारत नेट निरपेक्षता की राह पर आगे बढ़ता है तो नेट उपभोक्ताओं की स्वतंत्रता का विस्तार होगा।
दुनिया में साइबर अपराध के मामले में अमेरिका और चीन के बाद भारत तीसरे नंबर पर है। आज भारत की एक बड़ी आबादी डिजिटल सेवाओं पर निर्भर है। बहुत सारे लोग बैंक खाते से लेकर निजी गोपनीय जानकारी तक कंप्यूटर और मोबाइल फोन में रखने लगे हैं। इंटरनेट उपयोग करने के मामले में दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है। इंटरनेट पर जितनी तेजी से निर्भरता बढ़ी है उतनी ही तेजी से खतरे भी बढ़े हैं। भारत में अनेक देशी-विदेशी कंपनियां इंटरनेट आधारित कारोबार व सेवाएं प्रदान कर रही हैं। उचित होगा कि भारत सरकार ऐसी कंपनियों पर निगरानी रखने के लिए एक ऐसा निगरानी तंत्र विकसित करे जो इन कंपनियों की कार्यप्रणाली पर कड़ी नजर रखे।

ऐसी कंपनियों का लाइसेंस निरस्त किया जाए जो साइबर सुरक्षा से संबंधित नियमों का पालन करने में कोताही बरतती हैं। इसके अलावा देश में अनेक ऐसी विदेशी कंपनियां सेवाएं दे रही हैं जिनका सर्वर अपने देश में नहीं है। ऐसी कंपनियों को निगरानी की जद में रखना एक बड़ी चुनौती है। ऐसा नहीं कि भारत में साइबर अपराध रोकने के लिए कानून नहीं है। भारत में साइबर अपराध को तीन मुख्य अधिनियमों के अंतर्गत रखा गया है। ये अधिनियम हैं- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, भारतीय दंड संहिता और राज्य स्तरीय कानून। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के अंतर्गत आने वाले प्रमुख मामलों में कंप्यूटर स्रोत एवं दस्तावेजों से छेड़छाड, कंप्यूटर सिस्टम की हैकिंग तथा आंकड़ों में परिवर्तन, अश्लील सूचनाओं का प्रकाशन, गोपनीयता को भंग करना, आदि।

भारत में साइबर अपराध के मामलों में सूचना तकनीक कानून, 2000 और सूचना तकनीक संशोधन कानून, 2008 लागू होते हैं। पर इसी श्रेणी के कई मामलों में भारतीय दंड संहिता, कॉपीराइट कानून 1957, कंपनी कानून, सरकारी गोपनीयता कानून और जरूरत पड़ने पर आतंकवाद निरोधक कानून के तहत भी कार्रवाई हो सकती है। सच कहें तो साइबर अपराध के बदलते तरीकों और घटनाओं ने भीषण समस्या का रूप ग्रहण कर लिया है। साइबर अपराधी आए दिन साइबर तकनीक के जरिए जहरीला माहौल निर्मित कर रहे हैं और सरकार चाह कर भी उस पर रोक लगा पाने में विफल है। यह जरूरी है कि सरकार और इंटरनेट सेवा प्रदाता इंटरनेट की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के साथ ही साइबर अपराध रोकने की दिशा में ठोस कदम उठाएं।

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