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राजनीतिः महिला सुरक्षा और संवेदनहीनता

मध्यप्रदेश सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में दुष्कर्म पीड़ित महिलाओं को दिए गए मामूली मुआवजे पर अदालत ने हैरानी और नाराजगी जताते हुए कहा कि ‘वह हरेक पीड़ित को महज छह हजार से साढ़े छह हजार रुपए मुआवजा दे रही है। दुष्कर्म पीड़ितों को इतनी थोड़ी रकम के तौर पर क्या सरकार भीख दे रही है?’ अदालत ने इसे संवेदनहीनता करार देते हुए कहा कि ‘मध्यप्रदेश, निर्भया कोष के तहत केंद्र से सबसे ज्यादा राशि पाने वाले राज्यों में से एक है।’

Author March 15, 2018 02:57 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

जाहिद खान

महिला सुरक्षा और उनके सम्मान के बड़े-बड़े वादे और दावे करने वाली सरकारें महिलाओं के प्रति वाकई कितनी संवेदनशील और गंभीर हैं, इसका एहसास इस बात से होता है कि शीर्ष अदालत के आदेश के बाद भी देश के चौबीस राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों ने अपने राज्यों में दुष्कर्म पीड़ित महिलाओं को मुआवजे के मद में निर्भया फंड से कितना पैसा दिया, सरकारों ने इस बात का हलफनामा अदालत में दाखिल नहीं किया। न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता के पीठ ने हाल ही में इस मामले में इन सरकारों को फटकार लगाते हुए कहा, ‘हमारे आदेश के बावजूद हलफनामा दाखिल नहीं करना, यह दिखलाता है कि राज्य सरकारें महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित और गंभीर नहीं हैं।’ इस मामले में राज्य सरकारों के लापरवाह रवैए से अदालत इस कदर नाराज थी कि उसने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, ‘आप जितना चाहे समय लें और अपने राज्य में महिलाओं से कह दें कि आपको उनकी चिंता नहीं है।’

अदालत की यह नाराजगी वाजिब भी है। पिछले महीने नौ जनवरी को अदालत ने इस संबंध में देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से यह जानकारी मांगी थी, लेकिन इतनी छोटी-सी जानकारी राज्य सरकारें अदालत को नहीं दे पार्इं। जिन राज्यों ने इस बात का ब्योरा नहीं दिया उनमें असम, छत्तीसगढ़, गोवा, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, मणिपुर, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और लक्षद्वीप आदि शामिल हैं। बहरहाल जिन राज्यों ने हलफनामा दाखिल किया, अदालत उससे भी संतुष्ट नहीं थी। मध्यप्रदेश सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में दुष्कर्म पीड़ित महिलाओं को दिए गए मामूली मुआवजे पर अदालत ने हैरानी और नाराजगी जताते हुए कहा कि ‘वह हरेक दुष्कर्म पीड़ित को महज छह हजार से साढ़े छह हजार रुपए मुआवजा दे रही है। दुष्कर्म पीड़ितों को इतनी थोड़ी रकम के तौर पर क्या सरकार भीख दे रही है?’ अदालत ने इसे संवेदनहीनता करार देते हुए कहा कि ‘मध्यप्रदेश, निर्भया कोष के तहत केंद्र से सबसे ज्यादा राशि पाने वाले राज्यों में से एक है। लेकिन एक हजार नौ सौ इक्यावन पीड़ितों पर उसने सिर्फ एक करोड़ रुपए खर्च किए हैं। कोई राज्य ऐसा कैसे कर सकता है? राज्य सरकार की निगाह में दुष्कर्म का मूल्यांकन सिर्फ साढ़े छह हजार है। ये बहुत असंवेदनशीलता है।’

जाहिर है, अदालत ने जो कुछ भी कहा, उसमें उसका दर्द साफ झलक रहा था। कल्पना कीजिए उन महिलाओं के दिल पर क्या गुजर रही होगी, जिन्हें यह रकम दुष्कर्म के मुआवजे के तौर पर मिली। किसी महिला का इससे ज्यादा अपमान क्या हो सकता है कि उसकी आबरू की कीमत चंद हजार रुपए आंक दी जाए। दिल्ली में निर्भया कांड के बाद से ही सर्वोच्च न्यायालय में बलात्कार पीड़ितों को मुआवजा देने, उनके लिए पुनर्वास नीति और महिलाओं की सुरक्षा आदि से संबंधित छह अलग-अलग याचिकाओं की एक साथ सुनवाई चल रही है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि यौन उत्पीड़न और बलात्कार जैसे मामलों में पूरे देश में समान नीति होनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमित्र के तौर पर सहायता दे रहीं जानी-मानी वकील इंदिरा जयसिंह ने पिछली सुनवाई के दौरान अदालत से कहा था कि पीड़िता मुआवजा योजना का क्रियान्वयन चिंता का विषय है। देश के उनतीस राज्यों में से सिर्फ पच्चीस राज्यों ने इस योजना को अपने यहां अधिसूचित किया है। न्यायमित्र की इस दलील पर अदालत ने उस वक्त अपनी रजामंदी दिखलाते हुए कहा था कि ‘ऐसी योजनाओं में एकरूपता जरूरी है। इस संबंध में सरकार एक राष्ट्रीय नीति बनाए, ताकि बलात्कार पीड़ितों को उचित मुआवजा मिल सके। अदालत ने यौन उत्पीड़न की शिकार पीड़ितों के संबंध में सरकार की मुआवजा देने की नीति से जुड़े सवाल भी उठाए थे। मसलन, पीड़ित को मुआवजा देने की क्या योजना है? कानून के तहत कितनी पीड़ितों को मुआवजा मिला है? पीड़ित को कितना मुआवजा दिया गया? गवाहों की सुरक्षा को लेकर सरकार की क्या योजना है? ऐप आधारित टैक्सी के नियंत्रण के लिए क्या-क्या हो रहा है?’
जाहिर है, अदालत ने जो भी सवाल उठाए थे, उनका महिलाओं की सुरक्षा से सीधा-सीधा वास्ता है। यदि सरकार इन सवालों पर संजीदा हो, तो निश्चित तौर पर देश में महिलाओं के उत्पीड़न में कमी आएगी। लेकिन अफसोस इस बात का है कि सरकारों ने इस दिशा में अभी तक कोई तसल्ली भरा कदम नहीं उठाया है। उन्हें जरूरी नहीं लगता कि महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े इन कामों को अपने राज्यों में प्राथमिकता से करें।

निर्भया कांड के तुरंत बाद यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं की मदद के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर एक कोष बनाया था, जिसे ‘निर्भया कोष’ नाम दिया गया था। कोष में इस वक्त तकरीबन दो हजार करोड़ रुपए हैं। जहां तक इस कोष के इस्तेमाल की बात है, तो केंद्र सरकार ने पहले इस कोष को राज्य सरकारों और पीड़िताओं को देने के लिए वक्त लगाया। सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई में जब यह बात सामने आई, तो अदालत का कहना था कि सिर्फ कोष बना देने भर से काम नहीं होगा। कोष कैसे खर्च होगा, इसे लेकर भी योजना बनानी होगी। पीठ ने उस वक्त केंद्र सरकार से जवाब तलब किया था कि कोष को खर्च करने के बारे में सरकार क्या कर रही है? अदालत के आदेश और दिशा-निर्देशों के बाद सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आखिरकार इस मद में पैसा मिला। इसी तारतम्य में पिछले महीने नौ जनवरी को अदालत ने देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से यह जानकारी मांगी थी कि उनके राज्य में कुल कितनी महिलाएं यौन उत्पीड़न की शिकार हैं, निर्भया कोष के तहत उन्हें कितनी रकम मिली और पीड़िताओं को उन्होंने कितनी रकम बांटी?

देश में यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं के लिए समान मुआवजा नीति नहीं है। सभी राज्य अलग-अलग मुआवजा देते हैं। कहीं यह मुआवजा तर्कसंगत है, तो कहीं बहुत ही कम। मसलन, गोवा में सबसे ज्यादा दस लाख रुपए मुआवजा दिया जाता है, जबकि मध्यप्रदेश जैसे राज्य में दुष्कर्म पीड़ितों को महज छह हजार देकर टरका दिया गया। साल 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने बलात्कार की शिकार एक नेत्रहीन महिला के मामले में सुनाए अपने दीगर आदेश में सरकार को न सिर्फ उस महिला के पुनर्वास का आदेश दिया था, बल्कि पीड़ित को आजीवन आठ हजार रुपए प्रति महीना मुआवजा देने की भी बात कही थी। अपने इसी आदेश में अदालत ने सरकार से कहा था कि इस संबंध में देश में एक राष्ट्रीय मुआवजा नीति बनाई जाए। पर अफसोस है, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को तीन साल से ज्यादा होने को आए, लेकिन सरकार ने अभी भी इस संबंध में कोई स्पष्ट नीति बनाने की पहल नहीं की है।
देश में शायद ही कोई दिन ऐसा गुजरता है, जब महिलाओं से जुड़े अपराध सामने नहीं आते हों। जब भी कोई बड़ा मामला पेश आता है तो रस्मी तौर पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर संसद से लेकर सड़क तक बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं। लेकिन जैसे ही समय गुजरता है, तो सरकार यह भूल जाती है कि उसने जनता से क्या-क्या वादे किए थे? सरकार, महिलाओं की सुरक्षा को लेकर तो उदासीन है ही, पीड़ित महिलाओं के पुनर्वास के लिए भी कोई वाजिब कदम नहीं उठाए जाते। उत्पीड़न की शिकार महिला के पुनर्वास के लिए यदि उचित मुआवजे की नीति होगी, तो वह अपनी बाकी बची जिंदगी भी समाज में अच्छी तरह से गुजार सकेगी।

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