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राजनीतिः तापी परियोजना की संभावनाएं

हेरात के बाद जब कंधार इलाके में तापी गैस पाइप लाइन का काम शुरू होगा, तो इस पाइप लाइन को लेकर तमाम मुश्किलें आ सकती हैं। कंधार तालिबान का गढ़ है। अब भी यहां के बड़े हिस्से पर तालिबान का नियंत्रण है। तालिबान के लड़ाके तापी गैस पाइप लाइन में बाधा डालने की कोशिश करेंगे। अफगानिस्तान सरकार इससे कैसे निपटेगी, यह तो समय बताएगा।

तापी (तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत) गैस पाइप लाइन को लेकर अच्छी खबर आई है।

तापी (तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत) गैस पाइप लाइन को लेकर अच्छी खबर आई है। खुशी की बात है कि अफगानिस्तान खंड में तापी गैस पाइप लाइन निर्माण का कार्य शुरू हो गया है। इस मौके पर तुर्कमेनिस्तान और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहिद खान अब्बासी के साथ भारत के विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर भी मौजूद थे। यह अच्छा संकेत इसलिए माना जाना चाहिए कि यह पाइप लाइन भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को ठीक करने की उम्मीद तो जगाती है। इस खबर के साथ ही ये भी कयास लगाए जा रहे हैं कि ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन पर भी गंभीरता से भारत विचार करेगा। भारत सरकार दुबारा इस पाइप लाइन योजना में शामिल होने के लिए गंभीर है। बीते दिनों ईरान के राष्ट्रपति के भारत आगमन के समय यह स्पष्ट हो गया कि दक्षिण एशिया में बढ़ रहे ऊर्जा संकट को हल करने के लिए तमाम मुल्क गंभीर हैं। हालांकि इस ऊर्जा संकट को दूर करने में अब भी बाधाएं आएंगी क्योंकि इस इलाके में पश्चिमी ताकतों के भी अपने हित हैं। पश्चिम और मध्य-पूर्व एशिया में कई देशों के अमेरिका से अच्छे और बुरे संबंध इस इलाके की कूटनीति पर खासा असर डालते हैं। पहले भी प्रस्तावित ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन में अमेरिका ही मुख्य बाधा बना था।

हालांकि रास्ते अब भी आसान नहीं हैं। हेरात के बाद जब कंधार इलाके में तापी गैस पाइप लाइन का काम शुरू होगा, तो इस पाइप लाइन को लेकर तमाम मुश्किलें आ सकती हैं। कंधार तालिबान का गढ़ है। अभी भी यहां के बड़े हिस्से पर तालिबान का नियंत्रण है। तालिबान के लड़ाके तापी गैस पाइप लाइन में बाधा डालने की कोशिश करेंगे। अफगानिस्तान सरकार इससे कैसे निपटेगी, यह तो समय बताएगा। अफगानिस्तान से गैस पाइप लाइन पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में आएगी। बलूचिस्तान में जब काम शुरू होगा तो पाकिस्तानी सरकार को कई अलग-अलग आतंकी गुटों से निपटना होगा। इस इलाके में बलोची आतंकी गुट भी हैं। तालिबान भी सक्रिय है। यहां पर अफगान तालिबान और पाकिस्तानी तालिबान दोनों सक्रिय हैं। बताया जाता है कि चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के कामकाज में आतंकी गुटों ने खासी मुश्किलें पैदा की हैं। हाल ही में खबर आई है कि चीन बलोच आतंकी गुटों से बातचीत कर रहा है। बलूचिस्तान के बाद तापी गैस पाइप लाइन के निर्माण को लेकर असली परीक्षा पाकिस्तान सरकार की पंजाब प्रांत में होगी। क्योंकि यह गैस पाइप लाइन पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के उस इलाके से गुजरेगी जो भारत विरोधी आतंकी गुटों का गढ़ है। इसमें लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी गुट शामिल हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि तापी गैस पाइप लाइन के कार्यरूप में आने के बाद भारत को प्राथमिक लाभ ऊर्जा क्षेत्र में होगा। दूसरा लाभ आतंकवाद से बचाव में होगा। संभावना जताई जा रही है कि गैस पाइप लाइन शुरू हो जाने से पाकिस्तान में रोजगार के अवसर पैदा होंगे और इससे भारत में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी घटनाओं में कमी आएगी। वहीं पाकिस्तान को भी इस पाइप लाइन से कई लाभ होंगे। पाकिस्तान में ऊर्जा का भारी संकट है। तापी पाइप लाइन शुरू होने से यहां ऊर्जा संकट खत्म होगा। बंद पड़े उद्योग दुबारा शुरू होंगे। अभी हालत यह है कि शहरी उद्योगों को साल में पांच से छह महीने पंद्रह से अठारह घंटे बिजली कटौती का सामना करना पड़ता है। ऐसे में ऊर्जा संकट दूर होने से पाकिस्तान के शहरी इलाकों में रोजगार पैदा होंगे। इससे पाकिस्तान को सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि यहां सक्रिय आतंकी गुटों को बेरोजगार नौजवान मिलने बंद हो जाएंगे। पाकिस्तान में हुए अध्ययनों से पता चला है कि आतंकी संगठन बेरोजगार नौजवानों को लुभाने में कामयाब रहे हैं।

क्या भारत दक्षिण और पश्चिम एशिया की कूटनीति में स्थानीय कारणों से अमेरिकी प्रभाव से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है? तापी गैस पाइप लाइन के कार्य में गति ऐसे संकेत दे रही है। बीते दिनों ईरान के राष्ट्रपति हसन रोहानी की भारत यात्रा व्यावहारिकता पर आधारित थी। दोनों मुल्कों की कुछ जरूरतें अमेरिकी दबाव के बावजूद दोनों को एक-दूसरे के नजदीक लाती हैं। ईरानी राष्ट्रपति के दौरे के दौरान भारत और ईरान के बीच कई समझौते हुए। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण समझौता ऊर्जा क्षेत्र से संबंधित था। चाबहार बंदरगाह के विकास को लेकर भारत की प्रतिबद्धता से स्पष्ट है कि वह भविष्य में एक अरब आबादी की ऊर्जा संबंधी जरूरतें पूरी करने के लिए गंभीर है। ऊर्जा क्षेत्र में ईरान भारत का महत्त्वपूर्ण सहयोगी है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हमेशा यह चर्चा होती है कि अंतराष्ट्रीय तेल और गैस क्षेत्र में भारतीय निवेश में अमेरिकी नीति बाधक बनती है। भारत के पास सूडान, सीरिया, ईरान, नाइजीरिया आदि मुल्कों के गैस और तेल क्षेत्र में निवेश की अपार संभावना है। पर कहीं न कहीं भारत के लिए समस्या इन मुल्कों से अमेरिका के खराब संबंध रहे हैं।

रोहानी की भारत यात्रा ऐसे वक्त में हुई है, जब ठीक पहले इजराइली प्रधानमंत्री भारत आए थे। कहीं न कहीं परदे के पीछे ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन पर चर्चा चल रही है। दरअसल, भारत और ईरान दोनों मुल्क इस समय पश्चिम, मध्य-पूर्व एशिया में शक्ति संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर इजराइल भारत के लिए रक्षा, कृषि और जल क्षेत्र में सहयोग के लिए महत्त्वपूर्ण है, तो ईरान ऊर्जा क्षेत्र में भारत के लिए महत्त्वपूर्ण है। ईरान, भारत के लिए सामरिक और व्यापारिक दृष्टिकोण से इसलिए भी अहमियत रखता है कि इसकी एक बड़ी सीमा अफगानिस्तान से लगती है। तापी गैस पाइप लाइन का रास्ता अफगानिस्तान के हेरात और कंधार राज्य हैं। कंधार और हेरात दोनों ईरानी सीमा पर हैं। इसलिए ईरान से अच्छे संबंध जरूरी हैं। यही नहीं, ईरान के रास्ते तुर्कमेनिस्तान में भी भारत की पहुंच आसान है।

भारत की कुल ऊर्जा जरूरतों में पेट्रोलियम की हिस्सेदारी तेईस प्रतिशत और गैस की हिस्सेदारी छह प्रतिशत है। प्रस्तावित तापी गैस पाइप लाइन से ऊर्जा जरूरतों में गैस की हिस्सेदारी बढ़ेगी। यह भारत के लिए खासा लाभदायक रहेगा। भारत की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए ही संसदीय समिति ने 2017 में ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन के लिए दुबारा प्रयास करने की सलाह दी थी। भारत की ऊर्जा संबंधी जरूरतों का बड़ा हिस्सा कोयले से पूरा होता है। अब भी ऊर्जा जरूरतों में कोयले की भागीदारी चवालीस प्रतिशत है। भारत को अगर अपनी ऊर्जा जरूरतों में कोयले की निर्भरता घटानी है तो प्राकृतिक गैस की भागीदारी बढ़ानी होगी। इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका तापी और ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन ही निभा सकती है। यह ध्यान में रखने वाली बात है कि 2015 में ईरान और छह पश्चिमी ताकतों के बीच परमाणु करार हो गया।

इसके बाद ईरान पर लगे प्रतिबंध हटे। ईरान ने कई आर्थिक करार दुनिया के दूसरे मुल्कों से किए। ऐसे में भारत को भी ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन की दिशा में प्रयास करना चाहिए। हालांकि बीते सत्रह सालों में भारत-ईरान संबंधों में कई उतार-चढ़ाव आए। प्रस्तावित ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन परियोजना भी इसका शिकार हुई। इसका मुख्य कारण ईरान को लेकर अमेरिकी नीति थी। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत प्रस्तावित ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइप लाइन से 2008 में अलग हो गया था। हालांकि पाकिस्तान ने अमेरिकी दबाव को नकार दिया और ईरान-पाकिस्तान गैस पाइप लाइन पर काम जारी रखा। हालांकि ईरान भी समय-समय पर भारत को झटका देता रहा। ईरान ने भारत को फरजाद गैस फील्ड की विकास परियोजना देने से मना कर दिया। ईरान इस बात से नाराज था कि भारत-ईरान संबंध अमेरिकी हितों पर निर्धारित होते हैं। फरजाद गैस क्षेत्र की खोज भारतीय कंपनी ओएनजीसी ने की थी। पर इसके विकास का काम ओएनजीसी को नहीं मिला। जबकि ओएनजीसी ने फरजाद गैस फील्ड में ग्यारह अरब डालर के निवेश का प्रस्ताव रखा था।

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