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राजनीतिः सवालों के घेरे में आॅनलाइन परीक्षा

प्रतियोगी परीक्षा देने वाले छात्रों का यह तर्क गलत नहीं है कि जो तंत्र परीक्षा केंद्रों पर नकल रोकने के लिए उम्मीदवारों से घड़ी और जूते तक उतरवा लेता है, वह आखिर ऐसे तकनीकी इंतजामों में कैसे चूक जाता है जिससे पेपरलीक हो जाते हैं। यह जरूरी हो गया है कि आॅनलाइन शिक्षा और परीक्षा पद्धति को नई जरूरतों के अनुसार परखा जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि वे वास्तविक व योग्य उम्मीदवारों की राह में बाधक न बनें।

पेपर लीक होने के बाद छात्रों का प्रदर्शन (Express Photo/Abhinav Saha)

देश में अभी आॅनलाइन शिक्षा और आॅनलाइन परीक्षा का प्रयोग अपने शुरुआती चरण में है। पढ़ाई के आॅनलाइन इंतजामों ने निस्संदेह देश के दूरदराज के इलाकों में रहने वाले छात्रों को एक सहूलियत दी है क्योंकि अब उन्हें घर बैठे भी पढ़ाई और ट्रेनिंग का ऐसा विकल्प मिल गया है जिसमें वे आरंभिक ज्ञान से लेकर क्षमता बढ़ाने वाले कोर्स कर सकते हैं और कई मामलों में विशेषज्ञता भी हासिल कर सकते हैं। लेकिन परीक्षाओं के आॅनलाइन संचालन का मामला ऐसा गड़बड़ी भरा साबित हुआ है कि उससे इस व्यवस्था में फर्जीवाड़े की गुंजाइशों को ही ज्यादा जगह मिलती दिखी है। ताजा मामला कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) की परीक्षाओं का है, जिनमें 17 से 21 फरवरी के बीच हुई पेपरलीक की घटनाओं ने देश भर के छात्रों को इतना व्यथित कर दिया कि वे धरने-प्रदर्शन और आंदोलन के लिए मजबूर हो गए। दावा है कि हाल में देश के जिन 206 में से 204 केंद्रों पर की परीक्षा हुई थी, उस दौरान दो केंद्रों पर पर्चे लीक हुए और वे सोशल मीडिया पर वायरल हो गए।

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देश में परीक्षाओं को आॅनलाइन कराने का प्रबंध इन दावों के साथ किया गया था कि इससे परीक्षा में फर्जीवाडेÞ की आशंकाओं को रोका जा सकेगा और एक ही वक्त में सैकड़ों केंद्रों पर बेहद कुशलता के साथ परीक्षा संपन्न कराई जा सकेगी। उल्लेखनीय है कि करीब एक दशक पहले देश के सातों आइआइएम की संयुक्त परीक्षा यानी कैट एग्जाम आॅनलाइन कराने का एक प्रयोग किया गया था। 2009 में कैट परीक्षा के आयोजकों ने पेपर-पेंसिल के बजाय पहली बार आॅनलाइन परीक्षा आयोजित करने का प्रबंध यह कहते हुए अपने जिम्मे लिया था कि इससे इस अहम परीक्षा में 2003 जैसी पेपरलीक होने की घटना या कोई बड़ी तकनीकी खराबी नहीं आएगी। अमेरिकी कंपनी प्रोमेट्रिक को 32 शहरों के 105 केंद्रों पर आॅनलाइन परीक्षा संचालित करने का ठेका देकर यह भरोसा जताया गया था कि परीक्षा के सफल आयोजन की सारी तैयारी की गई है।

कंपनी प्रोमेट्रिक विश्व-स्तर पर जीमेट व जीआरई परीक्षाएं संचालित करती रही है, लेकिन कैट परीक्षा के पहले ही दिन ऐसे सारे दावों की कलई खुल गई। उस वक्त नौ शहरों के 11 केंद्रों पर परीक्षा रद््द करनी पड़ी और सैकड़ों परीक्षार्थियों को बिना परीक्षा दिए अपने घर लौटना पड़ा। कैट की पहली बार आयोजित आॅनलाइन परीक्षा में तकनीकी खराबी और सांगठनिक तालमेल के कारण परीक्षा में भाग लेने वाले लाखों परीक्षार्थियों और उनके अभिभावकों में आशंका व ऊहापोह की स्थिति पैदा हो गई थी। आॅनलाइन परीक्षा की विफलता सवाल उठा था कि आखिर मुकम्मल तैयारी किए बिना सूचना-प्रौद्योगिकी का ऐसा नया प्रयोग क्यों किया गया? यह सवाल भी उठा कि कैट और इसी तरह की अन्य प्रतियोगी और प्रवेश परीक्षाओं को आॅनलाइन कराने का क्या तुक है जब उनमें फर्जीवाड़े और चूक रोकने के इंतजाम कारगर साबित नहीं हो रहे हैं।

सामान्य ढंग से कागज-कलम के जरिए परीक्षा कराने के मुकाबले आॅनलाइन परीक्षा कराना आसान नहीं है। कोई बड़ी प्रवेश या नौकरी की प्रतियोगी परीक्षा हो, तो चुनौती और बड़ी हो जाती है, क्योंकि तब लाखों छात्रों-आवेदकों के लिए सैकड़ों-हजारों परीक्षा केंद्रों पर आॅनलाइन परीक्षा के संचालन के लिए बडेÞ पैमाने पर प्रबंध करने पड़ते हैं। सभी केंद्रों पर आॅनलाइन परीक्षा सुचारु रूप से संपन्न हो सके, इसलिए सभी केंद्रों के इंतजामों की जांच करने के लिए एक आॅडिट एजेंसी नियुक्त की जाती है। आॅडिट एजेंसी को सभी परीक्षा केंद्रों पर सॉफ्टवेयर की सुरक्षा जांचने के अलावा सभी केंद्रों पर सीसीटीवी निगरानी के प्रबंध, पॉवर बैकअप यानी बिजली जाने की सूरत में उसके वैकल्पिक इंतजाम, अतिरिक्त कंप्यूटरों की उपलब्धता, अतिरिक्त सर्वर, एअर कंडीशनिंग की सुविधा आदि तैयारियों का आकलन करते हुए सुनिश्चित करना होता है कि किसी भी स्तर पर भूलचूक और सेंधमारी की गुंजाइश न रहे।

हालांकि आरंभ में परीक्षाओं के आॅनलाइन प्रबंध की यह कहते हुए आलोचना की गई कि इसमें शहरी पृष्ठभूमि वाले और इंजीनियरिंग व कॉमर्स के छात्र-छात्राओं को बढ़त मिल जाती है क्योंकि वे तकनीकी प्रबंधों को लेकर सहज रहते हैं। यह बात वर्ष 2009 में आयोजित कैट परीक्षा में बैठे छात्रों की अकादमिक पृष्ठभूमि से समझी जा सकती है। उस परीक्षा में 65 फीसद इजीनियरिंग, 23 फीसदी कॉमर्स व अर्थशास्त्र, छह प्रतिशत विज्ञान और तीन प्रतिशत कला स्नातक शामिल हुए थे। इससे स्पष्ट पता चलता है कि आॅनलाइन होने वाली परीक्षाओं में इंजीनियरिंग डिग्रीधारियों का बोलबाला रहता है। इसके परिणाम और शीर्ष संस्थाओं में मेरिट में स्थान पाने वालों की सूची में इंजीनियरिंग और कॉमर्स के छात्र-छात्राओं का वर्चस्व रहता है। ठीक उसी तरह, जैसे सिविल सेवा परीक्षा में इंजीनियरिंग और विज्ञान के छात्रों के सफल होने का प्रतिशत ज्यादा रहता है। इससे यह चिंता उभरी थी कि आॅनलाइन परीक्षाओं का आयोजन करके कहीं देश में एक तरह का वर्ग-भेद पैदा करने की कोशिश सरकार के स्तर पर तो नहीं हो रही है।

परीक्षाओं का आॅनलाइन इंतजाम ही चिंतित करने वाला नहीं माना गया, बल्कि पिछले कई वर्षों से इन प्रवेश परीक्षाओं की आलोचना इसके लिए भी होती रही है कि इनमें गणनात्मक योग्यता, तार्किकता, शाब्दिक योग्यता और अंग्रेजी के भाषा ज्ञान पर बहुत जोर दिया जाता है। ये परीक्षाएं छात्रों की विश्लेषण की योग्यता, टीम वर्क, ईमानदारी, मूल्यपरकता, संवेदनशीलता, समाज-सापेक्षता जैसे महत्त्वपूर्ण गुणों का परीक्षण करने में असमर्थ रही हैं। यही नहीं, हमारे देश में कृषि, डेयरी उद्योग, बागवानी, परिवहन, सूचना क्षेत्र, बैंकिंग, बीमा, पर्यटन, मनोरंजन और मीडिया जैसे क्षेत्रों के लिए ऐसे होनहार युवाओं की जरूरत है जो गांवों और शहरों की गलियों, बस्तियों और खेतों में काम करने वाले आम आदमी की जिंदगी में बदलाव ला सकें। इसलिए शिक्षा और परीक्षा में ऐसे बुनियादी बदलाव की जरूरत बताई जाती रही है जो उम्मीवारों की वास्तविक योग्यताओं की परख करे, न कि महज उनके कंप्यूटर ज्ञान की।

लेकिन हाल में जिस तरह एसएससी की आॅनलाइन परीक्षा में पेपरलीक जैसी घटनाएं सामने आईं, उनसे यह व्यवस्था भी बेमानी लगने लगी है। जिस तरह कई राजनीतिक दल चुनावों में वोटिंग की इलेक्ट्रॉनिक व्यवस्था यानी ईवीएम को संदिग्ध मानते हैं, उसी तरह नौकरी और प्रतियोगी परीक्षाओं के आॅनलाइन प्रबंध को लेकर युवाओं में अविश्वास पैदा हो गया है। एक तो रोजगार की कमी और सरकारी नौकरियों में कटौतियों के लगातार सिलसिले से नौजवान पहले से ही परेशान हैं, ऊपर से परीक्षाओं में पेपरलीक जैसे कांडों से चयन प्रक्रिया को लेकर पैदा हुए संदेहों ने उनके मन में इस अविश्वास को और गहरा दिया है कि कहीं आॅनलाइन परीक्षा के नाम पर सिस्टम में बैठे लोग मिलीभगत करके सिर्फ अपने लोगों या पैसा देने वालों का ही रास्ता तो साफ नहीं कर रहे हैं।

प्रतियोगी परीक्षा देने वाले छात्रों का यह तर्क गलत नहीं है कि जो तंत्र परीक्षा केंद्रों पर नकल रोकने के लिए उम्मीदवारों से घड़ी और जूते तक उतरवा लेता है, वह आखिर ऐसे तकनीकी इंतजामों में कैसे चूक जाता है जिससे पेपरलीक हो जाते हैं। आॅनलाइन परीक्षा प्रणाली पर उठे इस सवाल की अब अनदेखी नहीं हो सकती कि जिस तकनीक से परीक्षा ली जाती है, उससे किसी भी कंप्यूटर का रिमोट एक्सेस (कहीं से भी कंप्यूटर को कंट्रोल करना) आसानी से किया जा सकता है। ऐसे में जरूरी हो गया है कि आॅनलाइन शिक्षा और परीक्षा पद्धति को नई जरूरतों के अनुसार परखा जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि वे वास्तविक व योग्य उम्मीदवारों की राह में बाधक न बनें।

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